उत्तरकाशी टनल: विशेषज्ञ बोले- हिमालय के नाज़ुक पहाड़ों में अवैज्ञानिक निर्माण से हो रहे हादसे - प्रेस रिव्यू

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उत्तराखंड के उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सुरंग का हिस्सा ढहने से फँसे 41 श्रमिकों को कब तक सुरक्षित निकाला जा सकेगा, इसे लेकर अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं है.
उन्हें निकालने के प्रयास जारी हैं, मगर मशीन ख़राब होने के कारण बचाव अभियान ठहर सा गया है.
ये सुरंग क्यों ढही, इसके कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा हिमालय के पहाड़ों की नज़ाकत और भार उठाने की क्षमता को नज़रअंदाज़ करते हुए किए जा रहे अदूरदर्शी और अवैज्ञानिक विकास कार्यों के कारण हुआ है.
अंग्रेज़ी अख़बार द टेलिग्राफ़ की रिपोर्ट के अनुसार, भूविज्ञानियों का कहना है कि हाल के सालों में हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे निर्माण में वैज्ञानिक ढंग से सुरक्षात्मक क़दम उठाने के बजाय आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक लाभ को ज़्यादा तरजीह दी जा रही है.
इंडियन एकेडमी ऑफ़ साइसेंज़ के जर्नल 'करंट साइंस' में भूविज्ञानी नरेश पंत और एच.एस. सैनी लिखते हैं कि ‘भूवैज्ञानिक परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ करके अनुपयुक्त स्थानों पर बेतरतीब ढंग से टाउनशिप और रिहायशी इमारतों का निर्माण किया जा रहा है.’
उत्तरकाशी में हुए हादसे के कई महीने पहले ही उन्होंने लिखा था, “हम ज़मीन की (भार उठाने की) क्षमता और ख़तरों के संबंध में सिविल कंस्ट्रक्शन के मानकों को लागू करने में भी नाकाम रहे हैं.”
उनका कहना था कि बहुत पर्यटन बाज़ार की ताक़त सुरक्षा नियमों पर हावी हो गई है.

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मानकों का उल्लंघन
यह सुरंग जिस चार धाम हाईवे प्रॉजेक्ट के तहत बन रही थी, उसे साल 2016 में शुरू किया गया था. इसके तहत चारों धाम- यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को साल भर सड़क सुविधा से जोड़ने रखने का लक्ष्य है.
लेकिन इसे लागू करने की तरीक़े की कई वैज्ञानिक और पर्यावरण समूह लगातार आलोचना कर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि इस परियोजना के पर्यावरण सम्बंधित और अन्य ख़तरों को कम करने के लिए हाई पावर कमेटी गठित करे.
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री द्वारा गठित इस हाई पावर कमिटी ने पाया था कि 'इस परियोजना में अवैज्ञानिक और बिना योजना के काम करने के कारण हिमालय के ईकोसिस्टम को नुक़सान पहुँचाया है.'
कमिटी ने यह भी पाया था कि 889 किलोमीटर के चार धाम चौड़ीकरण परियोजना को छोटी 53 परियोजनाओं में बदल दिया गया था.
ये सभी हिस्से 100 किलोमीटर से छोटे थे, जिसके कारण इन्हें पर्यावरण संबंधित नियमों से होकर नहीं गुज़रना पड़ा.
जुलाई 2020 में जमा की रिपोर्ट में कमिटी ने चेताया था कि परियोजना के तहत ढलान का मुआयना किए बिना और पर्याप्त क़दम उठाने बग़ैर कटान किया गया है, जिससे भूस्खलन का ख़तरा बढ़ गया है.
द टेलिग्राफ़ के अनुसार, आईआईटी रुड़की और जर्मनी की पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया था कि ऋषिकेश से बद्रीनाथ के जोशीमठ तक, 250 किलोमीटर के हाइवे में सितंबर और अक्टूबर 2022 में 309 भूस्खलन हुए थे, यानी लगभग हर एक किलोमीटर पर एक भूस्खलन.

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नाज़ुक पहाड़
द टेलिग्राफ़ के अनुसार, दिल्ली यूनिवर्सिटी में जियोलॉजी के प्रोफ़ेसर पंत ने कहा, “यह नहीं कहा जा रहा कि हिमालय में सड़कें या दूसरे प्रॉजेक्ट बनने ही नहीं चाहिए. लेकिन वहां की भूवैज्ञानिक बाधाओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए, ताकि ख़तरा कम हो सके.”
पंत और अन्य भूविज्ञानियों ने हिमालय की बड़ी परियोजनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि सतलुज पर भाखड़ा बांध और भागीरथी पर टिहरी बांध कई सालों से बिना किसी दिक्कत के काम कर कर रहे हैं.
पंत ने कहा, “मुश्किल जगहों पर महत्वाकांक्षी परियोजनाएं बनाई जा सकती हैं, लेकिन स्थानीय भूविज्ञान और स्थानीय भूभाग की बोझ उठाने की क्षमता को ध्यान में रखना जाना चाहिए. इन पुरानी परियोजनाओं में इन बातों का ख्याल रखा गया है और आज की परियोजनाओं को भी ऐसा ही करना चाहिए.”
पंत और सैनी ने कहा है कि अभी जो निर्माण संबंधित गतिविधियां हो रही हैं, उनमें दूरदर्शिता नहीं है और लोगों को बाढ़ वाले इलाक़ों या तीखी पहाड़ी ढलानों में रिहायशी इमारतें बनाने और कमज़ोर चट्टानों पर बिना सही अलाइनमेंट के रोड बनाने दिए जा रहे हैं.
भूविज्ञानियों का कहना है कि हिमालय 'नाज़ुक' है क्योंकि यह अपेक्षाकृत नए पहाड़ हैं, जो भूकंप के ख़तरे वाली बेल्ट में फैले हुए हैं. उनका कहना है कि इनके कई इलाक़े ढीली, कमज़ोर मिट्टी वाले हैं, जो ज़्यादा बोझ नहीं उठा सकते.

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चीन में निमोनिया, भारत में 'अलर्ट'
चीन में बच्चों में निमोनिया फैलने की ख़बर पर पूरी दुनिया की नज़र बनी हुई है.
इस बीच, नवभारत टाइम्स की ख़बर के अनुसार, भारत सरकार ने चीन से आ रही रिपोर्टों को ध्यान में रखते हुए राज्यों को अलर्ट किया है.
अख़बार लिखता है कि भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है, "मौजूदा इन्फ्लुएंज़ा और सर्दी के मौसम के मद्देनजर इसे अहम माना जा रहा है, जिसके कारण सांस सम्बंधी बीमारी के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. केंद्र सरकार स्थिति पर क़रीब से नज़र रख रही है और अभी किसी भी तरह की चेतावनी की ज़रूरत नहीं है."
चीन से आ रही ख़बरों के अनुसार, उत्तरी चीन के अस्पतालों में सांस की बीमारी से जूझ रहे बच्चों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. राजधानी बीजिंग में भी हर रोज़ क़रीब 7 हज़ार बच्चे अस्पताल पहुंच रहे हैं.
चीन के हेल्थ कमिशन का कहना है कि अलग-अलग कारणों से फेफड़ों में यह संक्रमण हो रहा है. इसमें मुख्य कारण इन्फ्लुएंज़ा बताया जा रहा है.
चीन का कहना है कि इस निमोनिया के लिए कोई नया पैथोजन यानी बीमारी पैदा करने वाला कारण नहीं है.
लोगों को अदालत जाने से डरना नहीं चाहिए: चीफ़ जस्टिस

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चीफ़ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा है कि नागरिकों को अदालतों का दरवाज़ा खटखटाने से नहीं डरना चाहिए.
हिंदुस्तान की ख़बर के अनुसार, चीफ़ जस्टिस ने रविवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक लोक अदालत की भूमिका निभाई है.
उन्होंने कहा, "नागरिकों को अदलातकों का दरवाज़ा खटखटाने से डरना नहीं चाहिए और इन्हें अंतिम उपाय के तौर पर भी नहीं देखना चाहिए."
संविधान दिवस समारोह के उद्घाटन पर आयोजित कार्यक्रम में चीफ़ जस्टिस ने कहा, "जिस तरह संविधान हमें स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के ज़रिये राजनीतिक मतभेदों को हर करने देना है, उसी तरह अदालती प्रणाली, स्थापित सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के माध्यम से कई मतभेदों को सुलझाने में मदद करती है."
उन्होंने कहा कि इस तरह, देश की हर अदालत वास्तव में संवैधानिक व्यवस्ता का विस्तार है.
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