सुप्रीम कोर्ट: देश की सबसे ताक़तवर अदालत मुक़दमों के बोझ तले क्यों दब रही है

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के सर्वोच्च न्यायालय को कई जानकार दुनिया में सबसे शक्तिशाली मानते हैं और इसके पीछे कई कारण हैं.
73 साल पुरानी अदालत कार्यकारी अधिनियमों, संसदीय क़ानूनों और संविधान में संशोधन को रद्द कर सकती है.
अदालत के पास स्वतंत्र रूप से मामलों को शुरू करने, मामलों में मदद करने के लिए 'अदालत के मित्रों' को नियुक्त करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहायता के लिए विशेषज्ञ पैनल गठित करने की भी शक्ति है.
आज, 34 जज लगभग 70 हज़ार अपीलों और याचिकाओं का भार संभालते हैं और हर साल लगभग एक हज़ार फ़ैसले देते हैं.
अपने विशाल अधिकार क्षेत्र और शक्ति के बावजूद 'अदालत संकट में है', ऐसा 'कोर्ट ऑन ट्रायल: ए डेटा-ड्रिवन अकाउंट ऑफ़ द सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया' किताब के लेखकों का कहना है.
सुप्रीम कोर्ट पर आधारित इस किताब को अपर्णा चंद्रा, सीतल कलंत्री और विलियम एचजे हबर्ड ने लिखा है.
किताब में लेखकों ने पाया कि अदालत के संकट में होने के मुख्य कारणों में से एक बड़ी संख्या में लंबित मामलों का होना है.
ये मामले वादियों को अधर में लटका देते हैं और उन्हें आर्थिक रूप से ख़त्म कर देते हैं.

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सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति
क़ानून के विशेषज्ञों की इस तिकड़ी का नया काम सुप्रीम कोर्ट के 10 लाख से अधिक मामलों के रिकॉर्ड पर आधारित है.
इन मामलों से इन्होंने पाँच विशिष्ट डेटासेट तैयार किए और उनमें से कई आश्चर्यजनक निष्कर्ष निकले, जिनमें से कुछ हैं-
- नवंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट में 40 फ़ीसदी मामले पाँच साल से अधिक समय से लंबित थे जबकि आठ फ़ीसदी दूसरे अन्य मामले 10 साल से अधिक समय से लंबित थे. साल 2004 में पाँच साल से अधिक समय से लंबित मामले सात फ़ीसदी थे.
- मामलों को ट्रायल कोर्ट में शुरू होने से लेकर सुप्रीम कोर्ट के निपटारे तक औसतन लगभग 13 साल और छह महीने लग गए. इस दौरान शीर्ष अदालत की कार्यवाही में कुल समय का एक तिहाई समय लगा जो न्यायपालिका के प्रत्येक स्तर पर औसत अवधि के समान समय है.
- मामलों की अवधि भी काफ़ी अलग-अलग थी. सबसे धीमे मामलों को समाधान तक पहुँचने में चार साल से अधिक का समय लगा जबकि सबसे तेज़ मामलों को दाखिल होने से लेकर समाधान तक तीन महीने लगे. टैक्स से जुड़े मामलों में अदालत को निर्णय लेने में औसतन चार साल लग जाते हैं, जिससे ये अधिक समय लेने वाले और सरकारी ख़ज़ाने को प्रभावित करने वाले मामले बन जाते हैं.
- नवंबर 2018 तक संविधान पीठ के मामले औसतन साढ़े आठ साल से अधिक समय से लंबित थे और इसमें भी सात न्यायाधीशों की पीठ के मामले 16 साल से अधिक समय तक लंबित थे. संविधान पीठ क़ानून से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों की सुनवाई से संबंधित होती है और इसमें पाँच या उससे अधिक जज शामिल होते हैं.

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कुछ अहम मामले और उनमें हुई देरी का असर
सबसे ज़रूरी बात यह है कि अदालत के रिकॉर्ड में 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सेदारी विशेष अनुमति याचिकाएँ (एसएलपी) की है.
एसएलपी सुप्रीम कोर्ट में दीवानी और फ़ौजदारी अपील के लिए आम साधन है.
लेखकों का कहना है कि यह रिट याचिकाओं और संवैधानिक चुनौतियों की जगह ले लेती है.
वे कहते हैं, ''यह निर्धारित करने के लिए कोई स्पष्ट बेंचमार्क नहीं है कि किस प्रकार के मामले एसएलपी के रास्ते दायर करने योग्य हैं.''
फिर कुछ मामले ऐसे हैं, जिनको लेकर लेखकों का कहना है कि ये 'पिक एंड चूज़ मॉडल' के ज़रिए लाइन में आ जाते हैं और तुरंत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो जाते हैं.
लेखक, जुलाई 2020 के एक मामले का हवाला देते हुए अदालत की ओर से एक रिट को ख़ारिज करने का ज़िक्र करते हैं.
रिट में तर्क दिया गया था कि अदालत ने एक जाने-माने पत्रकार की ज़मानत याचिका को प्राथमिकता दी थी, जबकि याचिकाकर्ता के मामले पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा था.
न्यायाधीशों ने पत्रकार के मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने को उचित ठहराया क्योंकि यह 'मीडिया की आज़ादी' से संबंधित था.
लेखकों का कहना है कि इस मामले की केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के ख़िलाफ़ दायर एक याचिका के साथ तुलना की जाने लगी, जिसमें इलाक़े में इंटरनेट प्रतिबंधों पर फ़ैसलों की समीक्षा के लिए अदालत के आदेश पर बनी व्यवस्था की कमी पर सवाल उठाया गया था.
यह मामला भी लाखों नागरिकों की स्वतंत्रता और मीडिया की आज़ादी से संबंधित था.
लेखकों का कहना है कि भारी बैकलॉग के कारण अदालत को मुश्किल मामलों को सूचीबद्ध न करने का रास्ता मिल जाता है.
इस कारण महत्वपूर्ण मामले लटके रहते हैं, जबकि अदालतों का ध्यान सामान्य मामलों पर केंद्रित रहता है.

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लेखक उदाहरण देते हुए लिखते हैं, सरकार की बायोमिट्रिक आईडी योजना, आधार को चुनौती वाले मामले पर निर्णय लेने में अदालत को बिना कोई सस्पेंशन ऑर्डर जारी किए पूरे पाँच साल लग गए.
इस अवधि के दौरान एक अरब से अधिक लोगों ने योजना के लिए नामांकन किया, जिससे चुनौती का प्रभाव कम हो गया.
साल 2018 में अदालत ने इस योजना को बरकरार रखते हुए कहा कि यह संवैधानिक है और निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है.
फिर चुनावी बॉन्ड पर सवाल उठाने वाली याचिकाएँ आईं.
चुनावी बॉन्ड राजनीतिक दलों को दान देने के लिए एक ब्याज मुक्त वित्तीय साधन हैं. राजनीति में वित्तीय पारदर्शिता लाने के लिए फरवरी, 2018 में चुनावी बॉन्ड पेश किए गए थे.
आलोचकों का कहना है कि बॉन्ड असंवैधानिक है और इसमें काफ़ी समस्याएँ हैं. इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है कि प्रत्येक बांड किसने ख़रीदा और किसे दान दिया गया.
लेखक इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि मामला एक साल तक लटका रहा और आख़िरकार अप्रैल, 2019 में आम चुनावों के साथ इसको लेकर सुनवाई हुई.
इस साल जनवरी में अदालत ने फिर से याचिकाओं पर विचार किया और मार्च में इस बात पर विचार किया जा रहा था कि क्या इसे संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए.

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क्या कहते हैं जानकार?
हार्वर्ड लॉ स्कूल के फे़लो निक रॉबिन्सन का कहना है कि अदालत प्रणाली में महत्वपूर्ण मामलों की तुलना में अधिक सामान्य मामलों को प्राथमिकता देना आलोचना को आमंत्रित करता है.
आलोचना ये होती है कि 'अदालत राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों से बचने के लिए अपने बैकलॉग को ढाल के रूप में इस्तेमाल करती है'.
आलोचना को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन लोकुर की राय निक रॉबिन्सन से मिलती-जुलती है.
जस्टिस मदन लोकुर कहते हैं, ''हां, यह न्यायिक देरी के लिए आलोचना को आमंत्रित करता है. मुझे यह स्वीकार करना होगा कि अदालत ने कुछ विवादास्पद मुद्दों को सुनवाई के लिए लिया है लेकिन चुनावी बॉन्ड मामले जैसे अन्य मुद्दों को भी ख़ारिज कर दिया है.''
रॉबिन्सन का मानना है कि लंबित मामलों ने अदालत को अपने मूल लक्ष्यों से लंबे समय तक के लिए दूर कर दिया है.
रॉबिन्सन कहते हैं, "इतने सारे सामान्य मामलों की सुनवाई करना संविधान की आवश्यकता नहीं है लेकिन यह एक विकल्प है जिसे अदालत ने सक्रिय रूप से चुनने का निर्णय लिया है".
स्पष्ट रूप से मुक़दमों में बढ़ोतरी, सीमित न्यायिक संसाधनों और अदालत की ओर से व्यापक संख्या में अपीलों को स्वीकार करने के कारण अदालत में देरी हो रही है.
किताब के लेखक मामलों के भार को कम करने की वकालत करते हैं.
भारत का सर्वोच्च न्यायालय तीन स्तरीय न्यायिक प्रणाली का सिद्धांत देता है: ज़िला अदालतें, उच्च न्यायालय और शीर्ष अदालत.
रिसर्च के लेखकों का कहना है कि निचली अदालतों को अधिकांश मामले को संभालना चाहिए, केवल उन मामलों को रिज़र्व करना चाहिए जो नए क़ानूनी मुद्दे पेश करते हैं या सुप्रीम कोर्ट को भविष्य के फैसलों में निचली अदालतों की सहायता के लिए नए, स्पष्ट क़ानूनी दिशानिर्देश स्थापित करने की अनुमति देते हैं.
जस्टिस लोकुर का कहना है कि हाई कोर्ट भी समस्या का एक हिस्सा हैं.
वो कहते हैं कि हाई कोर्ट के कुछ फ़ैसले असंगत होते हैं और सुप्रीम कोर्ट के पास अपील में हस्तक्षेप करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. (वैसे, भारत के 25 हाई कोर्ट में 60 लाख से ज़्यादा मामले लंबित हैं.)
निक रॉबिन्सन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को यह तय करने की ज़रूरत है कि वह किन संस्थागत लक्ष्यों को प्राथमिकता देना चाहता है.
रॉबिन्सन कहते हैं, "कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि कम मामलों को लिया जाए लेकिन उनमें बड़ी, अधिक प्रामाणिक बेंच के साथ फ़ैसला दिया जाए जो उच्च न्यायालयों के अनुसरण के लिए स्पष्ट मिसाल कायम करें.''
जस्टिस लोकुर का कहना है कि भारत की सभी अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मामले म लोगों के लिए कष्टदायक बने हुए हैं.
फ़िलहाल शीर्ष अदालत को स्पष्ट रूप से अपने स्वयं के बैकलॉग को ख़त्म करने की आवश्यकता है.
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