जलवायु परिवर्तन के इन चौंकाने वाले नतीजों के बारे में क्या आप जानते हैं?

जलवायु परिवर्तन

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इमेज कैप्शन, बढ़ते तापमान से साइबेरिया में बर्फ से जमे हुए मैदान में बड़े-बड़े गड्ढे हो रहे हैं
    • Author, विक्टोरिया गिल & एला हेम्बले
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

चिड़ियों का संगीत, हल्की बर्फबारी, खिलते फूल और मिज जैसे छोटे मच्छरों का काटना- नवंबर महीने में उत्तरी इंग्लैंड में आप इन चीजों की उम्मीद नहीं करते. लेकिन ऐसा हो रहा है और ये लगातार गर्म होती जा रही धरती के हल्के साइड इफेक्ट्स हैं.

तपती धरती की वजह से भयावह बाढ़ आ रही है. सूखा पड़ रहा है. तापमान बढ़ रहा है. धरती का तापमान बढ़ने से साइबेरिया में वर्षों से बर्फ से ढके मैदान पिघल रहे हैं. सरसों की पैदावार घट रही है और धरती की चमक धीमी पड़ती जा रही है.

जलवायु के परिवर्तन के कुछ नतीजे बेहद घातक हैं लेकिन इसकी वजह से कुछ ऐसे अजीब परिवर्तन हो रहे हैं, जिसका शायद आपको अंदाजा न हो.

ट्रुंडा का विस्तार और धरती की चमक

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साइबेरिया में बर्फ से जमे हुए मैदान में बड़े-बड़े गड्ढे हो रहे हैं. कुछ रूसी वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती का तापमान बढ़ने से जमीन के अंदर गैस के पॉकेट बन रहे हैं. इनमें अचानक विस्फोट हो रहा और इससे गड्ढे बने रहे हैं.

बर्फ से पटी हुई ऐसी जमीन को परमाफ्रॉस्ट कहा जाता है. इसमें दो या उससे अधिक साल तक बर्फ जमी रहती है.

आर्कटिक में जो बड़े गड्ढे बन रहे हैं, उसके पीछे भी यही अवधारणा है.

बीबीसी फ्यूचर के एक लेख में कहा गया है कि ऐसा होना ये बताता है कि हमारी धरती के उत्तर में ये आबादी विहीन इलाका कैसे चुपचाप कुछ बड़े बदलाव से गुजर रहा है.

हाल के रिसर्च बताते हैं कि आर्कटिक हमारे अंदाजा से ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है. इसके गर्म होने की रफ्तार दुनिया के गर्म होने की रफ्तार से चार गुनी है.

न्यू जर्सी में बिग बियर सोलर ऑब्जरवेटरी के वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती का तापमान बढ़ने से न सिर्फ इसके अंदर इस तरह के गड्ढे हो रहे हैं बल्कि इसकी 'चमक' भी घट रही है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती से लौट कर आने वाली सूरज की जो रोशनी चांद के स्याह इलाके में पड़ रही उसे 'अर्थ साइन' या अलबिडो कहा जाता है. असल में ये धरती की रोशनी को परावर्तित करने की क्षमता है.

इस अध्ययन में बताया गया है कि पूर्वी प्रशांत सागर के ऊपर निचले आसमान में पाए जाने वाले बादल कम हो रहे हैं. ऐसा समुद्र का तापमान बढ़ने की वजह से हो रहा है.

चूंकि ये बादल किसी आईने की तरह होता है, जो अंतरिक्ष में सूरज की रोशनी को परावर्तित करता है. लेकिन इन बादलों के घटते जाने से ये रोशनी घट जाती है. इसलिए वैज्ञानिकों के इस अध्ययन के मुताबिक हम अपनी धरती की चमक कम करते जा रहे हैं.

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ग्लोबल वॉर्मिंग के इन नतीजों के बारे में जानते हैं?

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ग्लोबल वॉर्मिंग को हम मनुष्य ही महसूस नहीं कर रहे हैं. कुछ जानवरों पर इसका बड़े ही अजीब तरीके से असर पड़ रहा है.

कुछ सरीसृपों में बच्चों का लिंग निर्धारण पर भी इसका असर पड़ रहा है. दरअसल उनके अंडे किस तापमान पर निषेचित हो रहे हैं, इससे फर्क पड़ रहा है. ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली छिपकलियों की एक प्रजाति ( दाढ़ी वाले नर ड्रैगन) में एक तापमान सीमा से अधिक तापमान होने पर नर मादा में तब्दील हो जाता है.

वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इससे नर छिपकली खत्म हो सकते हैं और इससे इस प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा है.

समद्र में ग्रीनहाउस गैस कार्बन डाइक्साइड का बढ़ता स्तर मछलियों में सूंघने या महसूस करने की क्षमता कम कर रहा है.

जलवायु परिवर्तन से मौसम की लय भी बिगड़ती नजर आ रही है और इसका असर दिख रहा है. ब्रिटेन के जंगलों में ग्रेट टिट (पक्षियों की एक प्रजाति) के बच्चे 1940 के दशक की तुलना में तीन हफ्ते पहले ही अंडों से निकल आए.

तापमान बढ़ने की वजह से वसंत की आहार श्रृंखला भी बदल गई है. धरती का तापमान बढ़ने से वे इल्लियां भी अब जल्दी पैदा हो रही हैं जिन्हें पक्षी खाते हैं. ओक पेड़ की पत्तियां भी जल्दी पैदा हो रही हैं. जिन्हें ये इल्लियां खाती हैं.

मौसम में बदलाव से कई पक्षी इससे तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ इस इलाके से दूसरी जगह जा रहे हैं. इस साल नॉरफॉक की खदानों में पैदा होने वाले चूजे (ये मधुमक्खियों को खाने वाले चूजे को खाते हैं) दिख रहे हैं. अमूमन ये दक्षिण यूरोप और उत्तरी अफ्रीका में पैदा होते हैं.

यहां तक कि अब आवाजें सुनाई पड़ने के वक्त में भी बदलाव आ रहा है. लंदन में अब इस सीजन में उन पक्षियों की आवाजें सुनाई पड़ रही हैं, जो पहले सुनाई नहीं पड़ती थीं. एक अध्ययन में तो ये भी बताया गया है कि पक्षी अब ऊंचाई में मौजूद पेड़ों की ओर बढ़ रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, समय से पहले पैदा होने वाले चूजे

फसलों पर किस तरह पड़ रहा असर

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मौसम में इस तरह के भारी बदलाव के वजह से फसल उगाना भी कठिन होता जा रहा है. गेहूं, मक्का और कॉफी पर पहले ही इसका असर दिख रहा है. लेकिन अब और भी चीजों की कमी होती दिख रही है.

हर साल सिरिराचा मिर्च सॉस के दो करोड़ बोतल तैयार करने वाली कैलिफोर्निया की कंपनी उई फोंग फूड्स ने अप्रैल में अपने ग्राहकों को चिट्ठी लिख कर सूचना दी कि शायद उन्हें उनका ऑर्डर डिलीवर न हो सके. क्योंकि इस मिर्च की भारी कमी हो गई है.

गर्मी में फ्रांस के सुपर मार्केट्स में डिजोन मस्टर्ड खत्म होने शुरू हो गए. दरअसल ये सरसों कनाडा के घास के मैदानों वाले इलाके में उगाई जाती है. और वहां मौसम में गड़बड़ी की वजह से इसकी पैदावार घटने लगी है. दुनिया के इसी इलाके में सबसे ज्यादा सरसों उगाई जाती है.

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इमेज कैप्शन, मशहूर डिजोन मस्टर्ड की बोतलें

जलवायु परिवर्तन की वजह से कार्बन मुक्त होने की कोशिश भी धीमी होती जा रही है. अगस्त में एनर्जी कंपनी ईडीएफ को फ्रांस में न्यूक्लियर पावर स्टेशन में उत्पादन घटाना पड़ा क्योंकि वहां की नदियों में पर्याप्त ठंडा पानी नहीं था.

इस समस्या का क्या हल होगा, इस पर यूएन के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में चर्चा हो रही है. सम्मेलन में इस बात पर विचार-विमर्श हो रहा है कि धरती को गर्म करने वाली गैसों में भारी कटौती कैसे हो.

धरती का तापमान को बढ़ा कर हम अपनी दुनिया को काफी बदल चुके हैं. लेकिन अब हमें ऐसे बदलावों के लिए तैयार रहना होगा जो आश्चर्यचकित कर सकते हैं. ऐसे बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं, जिनकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी.

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