मर्चेंट नेवी में कैसे जा सकते हैं, कौन सी पढ़ाई करनी होती है और सैलरी कितनी है?

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- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
समंदर सिर्फ़ घूमने की जगह नहीं, बल्कि दुनिया के कारोबार की रीढ़ भी माना जाता है. इसी के रास्ते दुनिया के कई देशों का ज़्यादातर कारोबार होता है.
भारत में ही 12 बड़े और दो सौ छोटे बंदरगाह हैं, जहां से हर रोज़ लाखों-करोड़ों रुपये का सामान आता-जाता है.
और इसी सेक्टर की एक ऐसी नौकरी है, जो कई नौजवानों को अपनी तरफ़ खींचती है- मर्चेंट नेवी.
दुनिया भर में जितने भी मर्चेंट मरीनर्स हैं, उनमें से सात फ़ीसदी भारतीय हैं.
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संभावना है कि आने वाले वक़्त में शिपिंग इंडस्ट्री में और तेज़ी देखी जा सकती है. भारत सरकार ने साल 2047 तक मैरीटाइम इंडस्ट्री में डेढ़ करोड़ से ज़्यादा रोज़गार पैदा करने का लक्ष्य बनाया है.
लौटते हैं मर्चेंट नेवी की तरफ़. हाई सैलरी, दुनिया के कई देश घूमने का मौक़ा और कम उम्र में बड़ी ज़िम्मेदारी, ये सब इस करियर को आकर्षक तो बनाते हैं, लेकिन इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं.
करियर कनेक्ट की आज की कड़ी में समझेंगे कि मर्चेंट नेवी क्या है, इसमें जाने का रास्ता क्या है, ये किन लोगों के लिए सही विकल्प हो सकता है और ऐसी कौन सी चुनौतियां हैं, जो इसमें सामने आती हैं.
क्या होता है मर्चेंट नेवी?

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कई नौजवानों के बीच ये पसोपेश दिखती है कि उन्हें इंडियन नेवी जॉइन करनी चाहिए या फिर मर्चेंट नेवी. ये दोनों रास्ते समंदर तक जाते हैं, लेकिन दोनों का मक़सद एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है.
तो सबसे पहले इनके बीच का अंतर समझ लेते हैं.
एकेडमी ऑफ़ मैरीटाइम एजुकेशन एंड ट्रेनिंग के प्लेसमेंट डायरेक्टर कैप्टन चंद्रशेखर कहते हैं, "मर्चेंट नेवी वो शिपिंग सर्विस है, जो समुद्र के रास्ते माल ले जाने वाले कमर्शियल जहाज़ों से जुड़ी है. ये एक कॉस्ट सेंटर है, जो या तो मुनाफ़ा कमाता है या फिर नुक़सान उठाता है. जबकि नेवी यानी नौसेना मुख्य रूप से रक्षा के लिए होती है. यह थल सेना और वायु सेना की तरह भारतीय सेना की एक शाखा है."
मर्चेंट नेवी डिकोडड नामक एडुटेक कंपनी चला रहे प्रणीत मेहता खुद भी एक शिप पर चीफ़ इंजीनियर के पद पर काम कर चुके हैं. वो कहते हैं, "नेवी तक जाने का रास्ता ही अलग है. इसके लिए अलग परीक्षा होती है, नेशनल डिफ़ेंस एकेडमी जाना होता है. वहां तीन साल की कड़ी ट्रेनिंग से गुज़रना होता है. मर्चेंट नेवी प्राइवेट सेक्टर है, जबकि नेवी पूरी तरह सरकारी और देश सेवा के लिए. दोनों के वेतन में भी बहुत अंतर है."
मर्चेंट नेवी की निगरानी डायरेक्ट्रेट जनरल ऑफ़ शिपिंग (डीजी शिपिंग) के हाथों में होती है और इसमें अलग-अलग डिपार्टमेंट होते हैं. और इनमें एंट्री कैसे मिलती है?
- नेविगेशन डिपार्टमेंट या डेक डिपार्टमेंट: नॉटिकल साइंस में डिप्लोमा या फिर बी.एससी इन नॉटिकल साइंस के ज़रिए इस डिपार्टमेंट में एंट्री मिल सकती है. इनका काम होता है जहाज़ को सुरक्षित रास्ते से ले जाना, समुद्र की परिस्थितियों को समझना. इसमें डेक कैडेट, थर्ड ऑफ़िसर, सेकेंड ऑफ़िसर और कैप्टन पद होते हैं.
- इंजन डिपार्टमेंट (मरीन इंजीनियरिंग): नेविगेशन डिपार्टमेंट की तरह ही एक और इंजीनियर होता है, जिसके ज़िम्मे जहाज़ के इंजन, मशीन और तकनीकी उपकरण होते हैं. इस पद को पाने के लिए मरीन इंजीनियरिंग में बीटेक या फिर डिप्लोमा ज़रूरी है. बीटेक इन मरीन इंजीनियरिंग के लिए दाख़िला इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी कॉमन एंट्रेंस टेस्ट के ज़रिए होता है. इसके अलावा एक साल का स्पेशलाइज़्ड डिप्लोमा कोर्स- ग्रैजुएट मरीन इंजीनियरिंग (जीएमई) के ज़रिए भी इस डिपार्टमेंट में एंट्री मिल सकती है. इसके बाद पहली जॉइनिंग जूनियर इंजीनियर के पद पर होती है, फिर फोर्थ इंजीनियर, थर्ड इंजीनियर, सेकेंड इंजीनियर और चीफ़ इंजीनियर पद तक पहुंचते हैं.
- इलेक्ट्रो-टेक्निकल ऑफिसर (ईटीओ): ईटीओ मर्चेंट, शिप के इंजन डिपार्टमेंट का वो लाइसेंस्ड मेंबर होता है, जिसकी ज़िम्मेदारी है सेंसर और अलार्म सिस्टम की निगरानी करना. इसके लिए ज़रूरी है इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स या इंस्ट्रूमेंटेशन जैसे डिपार्टमेंट्स में बीई या बीटेक. साथ ही डीजी शिपिंग अप्रूव्ड ईटीओ कोर्स भी.
- जीपी रेटिंग (सपोर्ट क्रू): इस डिपार्टमेंट में कोई ऑफ़िसर पोज़िशन नहीं होती, लेकिन ये क्रू और जहाज़ की देखभाल के लिहाज़ से अहम भूमिका निभाते हैं. इसके लिए 10वीं पास होना ज़रूरी है. और उम्र साढ़े 17 से 25 साल के बीच होनी चाहिए. 10वीं या 12वीं के बाद छह महीने का जीपी रेटिंग कोर्स होता है, जिसके ज़रिए ये नौकरी पाई जा सकती है.
किन लोगों के लिए है मर्चेंट नेवी?

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प्रतीक तिवारी इन दिनों एक कंपनी में सीनियर चार्टरिंग (शिपिंग) मैनेजर हैं. साल 2006 में जब उन्होंने 12वीं की, तब बाक़ी कई स्टूडेंट्स की तरह उन्हें भी पता नहीं था कि आगे क्या रास्ता अपनाना चाहिए.
उन्होंने बताया, "मेरे घरवाले चाहते थे कि मैं आईटी या कंप्यूटर साइंस में करियर बनाऊं, लेकिन मुझे कुछ अलग करना था और उस समय मर्चेंट नेवी के बारे में जानकारी ज़्यादा नहीं थी. कोई गाइडेंस भी नहीं थी, इसलिए फ़ैसला लेना मुश्किल था. लेकिन मैंने मरीन इंजीनियरिंग करने का फ़ैसला लिया. और फिर चार साल के कोर्स के बाद मेरा सफ़र मरीन इंजीनियर के रूप में शुरू हुआ."
प्रतीक बताते हैं कि ये सफ़र आसान नहीं था. वो कहते हैं कि मर्चेंट नेवी उन लोगों के लिए है, जो :
- इंजीनियरिंग, मशीनरी, सिस्टम, नेविगेशन जैसी तकनीक में रुचि रखते हों
- जो लंबे-लंबे समय तक घर से दूर रह पाएं
- जो अत्यधिक अनुशासित माहौल में, ज़िम्मेदारी के साथ काम कर सकें
- जो शारीरिक और मानसिक, दोनों तरह से फ़िट हों
- जिन्हें घूमने का शौक हो और देश-विदेश में एक्सपोज़र की चाहत हो
प्रणीत मेहता कहते हैं कि मर्चेंट नेवी अपने साथ कई चुनौतियां भी लेकर आती है. जैसे छह महीने आपको समुद्र में बिताने होते हैं. इतने लंबे-लंबे समय तक किसी को अपने घर-परिवार से दूर रहना पड़ता है. अकेलापन महसूस होता है और इस दौरान मानसिक दबाव भी बहुत होता है. ये एक ऐसा पेशा है, जहां आपको हर वक्त तन-मन, दोनों से मौजूद रहना पड़ता है और सख़्त अनुशासन में रहना होता है.
मगर उनका ये भी कहना है, "आजकल नौकरियां कम होती जा रही हैं. ज़्यादातर लोग ऐसे फ़ील्ड में जाते हैं, जहां प्रतिस्पर्धा बहुत है. इसके विपरीत वैश्विक व्यापार और सप्लाई में लगातार बढ़ोतरी के साथ आने वाले 10 सालों में मर्चेंट नेवी इंडस्ट्री में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है. मर्चेंट नेवी कोर्स चुनने का इसलिए सबसे सही समय यही है. क्योंकि यहां प्रतिस्पर्धा कम और तनख़्वाह अच्छी होती है. साथ में ऑफ़िसर की यूनिफॉर्म पहनने का मौक़ा भी मिलता है."
मर्चेंट नेवी के कोर्स कौन-कौन से?

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डिप्लोमा इन नॉटिकल साइंस (डीएनएस): डेक डिपार्टमेंट में जाने के लिए एक साल का कोर्स, बारहवीं के बाद किया जा सकता है.
बीएससी इन नॉटिकल साइंस: डेक डिपार्टमेंट में जाने के लिए तीन साल का कोर्स
बीटेक मरीन इंजीनियरिंग: इंजन डिपार्टमेंट में जाने के लिए चार साल का कोर्स
ग्रैजुएट मरीन इंजीनियरिंग (जीएमई): अगर बारहवीं के बाद बीटेक मेकेनिकल में किया है तो फिर 8-12 महीने का ये कोर्स कर इंजन डिपार्टमेंट जॉइन किया जा सकता है.
इलेक्ट्रो टेक्निकल ऑफिसर (ईटीओ): अगर बारहवीं के बाद इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स-कम्युनिकेशन से बीटेक या डिप्लोमा किया है तो चार महीने का ये कोर्स करके इंजन डिपार्टमेंट में जा सकते हैं.
जीपी रेटिंग: छह महीने का कोर्स होता है, जो डेक और इंजन डिपार्टमेंट दोनों में जाने के लिए किया जा सकता है.
कौन जा सकता है मर्चेंट नेवी में?

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अगर बारहवीं में आपके पास फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में 60 फ़ीसदी अंक हैं और इंग्लिश में कम से कम 50 फ़ीसदी अंक हैं तो उनके लिए मर्चेंट नेवी में जाना आसान है. साथ ही विज़न भी 6/6 होना ज़रूरी है.
लेकिन अगर किसी के पास कॉमर्स या आर्ट्स है तो फिर उन्हें ग्यारहवीं और बारहवीं फिर से पीसीएम के साथ करना ज़रूरी है. या फिर एक विकल्प नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) से ग्यारहवीं-बारहवीं करना भी है.
भारत में मर्चेंट नेवी की पढ़ाई के लिए है- इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी यानी आईएमयू है. ये यूनिवर्सिटी हर साल अमूमन मई में एक एंट्रेंस टेस्ट करवाती है, जिसे कहा जाता है आईएमयू-सीईटी. इसमें अच्छा स्कोर लाने वाले स्टूडेंट तीन साल के बीएससी इन नॉटिकल साइंस या फिर चार साल के बीटेक इन मरीन इंजीनियरिंग कोर्स में दाखिला पाते हैं.
इससे जुड़े रजिस्ट्रेशन कब होंगे, एग्ज़ाम कब है, ऐसे सवाल अगर मन में हैं तो इनके जवाब आईएमयू की वेबसाइट पर मौजूद हैं.
अगर पीसीएम के साथ ग्यारहवीं-बारहवीं नहीं है, तो फिर जीपी रेटिंग के ज़रिए भी मर्चेंट नेवी में एंट्री पा सकते हैं, लेकिन इस कोर्स को करने के बाद ऑफिसर नहीं बन पाते.
इन सभी कोर्स के लिए कम से कम उम्र 17 साल या ज़्यादा से ज़्यादा 25 साल हो सकती है.
क्या होती है ग्रोथ और सैलरी?

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जानकार कहते हैं कि कम उम्र में लाखों की सैलरी देने वाला प्रोफ़ेशन मर्चेंट नेवी है. इसमें प्रतिस्पर्धा भी कम है. पिछले साल क़रीब 40 हज़ार स्टूडेंट आईएमयू-सीईटी के लिए बैठे थे, जबकि इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे बाकी एंट्रेंस एग्ज़ाम के लिए ये संख्या लाखों में होती है.
कैप्टन चंद्रशेखर ने बताया कि किसी कैडेट के लिए शुरुआती सैलरी 30 हज़ार प्रति महीने के आसपास से शुरू होती है. अगर कोई 4 साल के कोर्स के बाद ऑफ़िसर बने तो फिर ये प्रति महीने 45 से 90 हज़ार के बीच भी हो सकती है.
मर्चेंट नेवी में अगर किसी को थर्ड से सेकेंड ऑफ़िसर बनना है तो इसके लिए डीजी शिपिंग की ओर से कराई जाने वाली पात्रता परीक्षा को क्लियर करना होता है. इसे सर्टिफ़िकेट ऑफ कॉम्पिटेंसी यानी सीओसी कहा जाता है. हालांकि, ये प्रमोशन की गारंटी नहीं है, बल्कि प्रमोशन पाने के लिए ज़रूरी है.
प्रतीक बताते हैं कि चीफ़ इंजीनियर और कैप्टन के लेवल तक सैलरी 8 से 15 लाख रुपये महीने तक भी जा सकती है. हालांकि, ये इस पर निर्भर है कि संबंधित व्यक्ति का अनुभव कितना है और वो किस तरह के जहाज़ पर काम कर रहे हैं. उदाहरण के लिए तेल टैंकर वाले जहाज़ों पर बल्क कैरियर शिप से ज़्यादा वेतन मिलता है.
कहां से करें पढ़ाई?

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ऐसा नहीं है कि भारत के किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में मरीन कोर्स पढ़ाए जाते हैं. बल्कि इसके लिए कुछ ख़ास संस्थान हैं, जो इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी (आईएमयू) के अंतर्गत आते हैं या फिर जिन्हें डीजी शिपिंग से मान्यता मिली होती है.
भारत में क़रीब 200 मैरीटाइम इंस्टीट्यूट हैं.
आईएमयू एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, जिसका हेडक्वॉर्टर कोलकाता में है और इसके अलावा चेन्नई, मुंबई, विशाखापट्टनम और कोच्चि में इसके कैंपस हैं.
यहां बीटेक इन मरीन इंजीनियरिंग, बी.एससी इन नॉटिकल साइंस, जीएमई डिप्लोमा, ईटीओ कोर्स, मैरीटाइम मैनेजमेंट के पीजी कोर्स कर सकते हैं.
इसके साथ ही चेन्नई के एकेडमी ऑफ़ मैरीटाइम एजुकेशन एंड ट्रेनिंग (एएमईटी) और टोलानी मैरीटाइम इंस्टीट्यूट (टीएमआई) पुणे से भी मरीन कोर्स किए जा सकते हैं.
हालांकि, अगर किसी को जीपी रेटिंग, सपोर्ट क्रू या प्री-सी ट्रेनिंग जैसे कोर्स की ओर जाना है तो फिर इसके लिए भी कुछ बेहतर संस्थान हैं. जैसे:
- एंग्लो ईस्टर्न मैरीटाइम एकेडमी (कोच्चि)
- साउथ इंडिया मैरीटाइम एकेडमी (चेन्नई)
- लॉयोला इंस्टीट्यूट ऑफ़ मरीन इंजीनियरिंग एंड ट्रेनिंग स्टडीज़ (चेन्नई)
- इंटरनेशनल मैरीटाइम इंस्टीट्यूट (नोएडा)
- साइंटिफ़िक मरीन एंड इंजीनियरिंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (कोलकाता)
फ़ीस की बात करें तो आईएमयू के कैंपस में बीटेक मरीन इंजीनियरिंग और बीएससी नॉटिकल साइंस की सालाना फ़ीस क़रीब सवा दो से ढाई लाख के आसपास है. ये मान्यता प्राप्त प्राइवेट इंस्टीट्यूट में अलग-अलग भी हो सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















