आपका चाय पीना कम हो सकता है, जानते हैं इसकी वजह?

देबजानी

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इमेज कैप्शन, चाय पर टिका है देबजानी का भविष्य 
    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुबह के साढ़े छह बजे हैं और दक्षिणी असम की बराक घाटी के पेड़-पौधों पर रात की बारिश की बूंदें अभी शेष हैं.

सिलचर शहर से घंटे भर दूर एक चाय के बाग़ान के पिछले इलाक़े से काफ़ी धुआँ उठ रहा है.

छोटे-छोटे, टिन की छत वाले घरों में खाना पक रहा है. घरवालों के लिए और बाग़ान में उसे बांध कर ले जाने वाले घर के सदस्यों के लिए.

52 साल की देबजानी भी इनमें से एक हैं और उन्हें जल्दी है, खाना पका कर बाग़ान पहुँचने की.

लेकिन इस बात की गारंटी नहीं कि आज भी उतना काम मिल सकेगा जितना पहले मिला करता था.

एक नई चिंता है जिस पर इनके मेहनतकश हाथों का बस नहीं.

देबजानी ने बताया, "ज़्यादा बारिश होने से चाय के पौधों में कीड़े बढ़ने लगते हैं, पत्ते कम हो जाते हैं और हमारा काम भी कम होता है. इससे वेतन भी कम हो जाता है. लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं."

विष्णु सौताल

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इमेज कैप्शन, विष्णु सौताल असम के डोलू चाय बाग़ान में 23 सालों से काम करते आए हैं

कम चाय

क्या आपको मालूम है कि सुबह-शाम आप ताज़गी के लिए जिस चाय की चुस्की लेते हैं, उस चुस्की में ख़लल पड़ सकती है?

यानी जो चाय इतनी आसानी से आपके कप-प्यालों में पहुंच रही है अगर उसकी मात्रा कम होती गई तो फिर क्या कर सकेंगे?

जी हां, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में होने वाली चाय जो यूरोप-अमेरिका तक में पी जाती है, उस पर क्लाइमेट चेंज का असर अब साफ़ दिखने लगा है.

पूर्वोत्तर भारत में बारिश हमेशा से ज़्यादा होती रही है और इलाक़े की मिट्टी में नमी रहती है.

कम ऊंचाई वाले पहाड़ और उनके बीच छोटी-छोटी घाटियों की वजह से ये इलाक़ा चाय उगाने के लिए बेहतरीन रहा है.

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चाय का इतिहास

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इमेज कैप्शन, भारत में चाय का इतिहास क़रीब 200 साल पुराना है.

चाय बाग़ान की फ़ैक्ट्री

मगर कुछ सालों से यहां तापमान 35-37 डिग्री के ऊपर भी जाने लगा है जिसमें चाय के पौधे झुलसने लगते हैं.

अब जब चाय के पौधे झुलसने लगेंगे तो ज़ाहिर है देबजानी जैसे लाखों चाय बाग़ान मज़दूरों पर इसका सीधा असर पड़ेगा.

विष्णु सौताल असम के कछार ज़िले के डोलू चाय बाग़ान में पिछले 23 सालों से काम करते आए हैं.

दूसरे मज़दूरों की तरह उनका भी काम रोज़ चाय की पत्तियों को चुनकर चाय बाग़ान की फ़ैक्ट्री में पहुँचाना है.

उन्होंने कहा, "इस साल तो पेड़ों में पत्ती बहुत कम हो गई है जिसके चलते हमारे बाग़ान में लोगों को काम ही नहीं मिल रहा है. हमें दिन की दो सौ बारह रुपए की मज़दूरी तभी मिलती है जब हम रोज़ 23 किलो चाय पत्ती तोड़ कर दें. कभी-कभी वो पूरा नहीं हो पाता".

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  • भारत में चाय का इतिहास क़रीब 200 साल पुराना है.
  • ब्रितानी हुकूमत ने पहले दार्जीलिंग और फिर असम में चाय उगानी शुरू की थी. वजह थी चाय उत्पादन पर चीन की बादशाहत कम करना.
  • हर साल क़रीब डेढ़ अरब किलो चाय तैयार करने वाला भारत आज काली चाय के उत्पादन में दुनिया में टॉप पर है, जबकि कुल चाय उत्पादन में ये स्थान चीन के पास है.
  • लेकिन पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बदलते मौसम और तापमान का साया चाय बाग़ानों पर पड़ चुका है.
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इंडियन टी एसोसिएशन

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इमेज कैप्शन, इंडियन टी एसोसिएशन के सचिव भास्कर प्रसाद चालिहा

क्लाइमट चेंज

पूर्वी बंगाल और दक्षिणी असम में 2021 की तुलना में अब तक दोगुनी बारिश हो चुकी है. इसमें सिलचर जैसे शहर भी कई दिन तक डूबे रहे.

चाय के व्यापार से जुड़े सभी लोग इस बात से हैरान भी हैं और दुखी भी.

चाय उत्पादकों की नुमाइंदगी करने वाली इंडियन टी एसोसिएशन के सचिव भास्कर प्रसाद चालिहा के मुताबिक़, असम-मिज़ोरम बॉर्डर वाली बराक घाटी में ही "2012 में 5.68 करोड़ किलोग्राम चाय उत्पादन होता था जो 2021 में घट कर 4.27 करोड़ किलोग्राम रह गया है."

उन्होंने बताया, "बारिश अभी सिर्फ़ सात महीने होती है, लेकिन उतनी हो होती है जितनी पहले बारह महीने में हुआ करती थी. इस तीव्रता से ज़मीन की ऊपरी सतह जिसे हम टॉप सॉयल कहते हैं, उसका नुक़सान होता है. उत्पादन में हमें तक़रीबन 2.5% की साल-दर-साल कटौती दिख रही है, सिर्फ़ क्लाइमट चेंज के कारण. इस हिसाब से अगर हम चलते रहे तो 50 साल में तो मेरा उत्पादन ही ख़त्म हो जाएगा."

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चाय के बाग़ान

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इमेज कैप्शन, भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में 10 हज़ार से ज़्यादा चाय के बाग़ान हैं

बराक घाटी

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में 10 हज़ार से ज़्यादा चाय के बाग़ान हैं.

पश्चिमी बंगाल से लेकर, असम, सिक्किम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में होने वाली बेहतरीन चाय भारत के कुल चाय उत्पादन का 80% है.

इनमें काम करने वाले 10 लाख से ज़्यादा लोगों के पूर्वज ब्रितानी शासनकाल में देश के अलग हिस्सों से यहां लाए गए थे. अब सभी यहीं के राज्यों के नागरिक हैं और स्थानीय संस्कृति में घुल-मिल गए हैं.

कमलजीत तेली के मुताबिक़ उनके दादा शायद बिहार के थे और बराक घाटी के एक चाय बाग़ान में क़रीब सौ साल पहले मज़दूरी के लिए भेजे गए थे.

उन्होंने कहा, "जब मैं छोटा था तब लोग कम पड़ते थे और चाय बाग़ान बढ़ते जा रहे थे. कुछ सालों से ये बदल गया है और बगीचे कम हो रहे हैं. अब जो लोग चाय बाग़ान में काम करते हैं उनका रोज़गार तो यही है क्योंकि हमें कुछ और करना ही नहीं आता. बाक़ी भगवान जाने."

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कमलजीत तेली

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इमेज कैप्शन, कमलजीत तेली के मुताबिक़ उनके दादा शायद बिहार के थे

ऐसा नहीं है कि चाय बाग़ान मज़दूरों की ज़िन्दगी में चुनौतियां कम रही हैं. कम तनख्वाह पर नौकरी करना, ख़राब सैनिटेशन जैसी तमाम मुसीबतें वे झेलते आए हैं.

लेकिन जलवायु परिवर्तन से कैसे निबटना है ये उन्हें नहीं पता. वैसे चिंता की लकीरें उनके चेहरों पर भी हैं जिन्हें बदलते मौसम का पौधों पर असर भी दिख रहा है और चाय की क्वॉलिटी में गिरावट भी.

असम विश्विद्यालय में प्रोफ़ेसर जयश्री राउत पर्यावरण विभाग की डीन हैं और लंबे समय से इसी विषय पर रिसर्च कर रही हैं.

उनके मुताबिक़, "चाय की पत्ती में 50 से ज़्यादा केमिकल्स होते हैं जो इसके स्वाद के लिए बेहद यूनीक होते हैं. बढ़ते तापमान और बारिश के चलते इन पौधों में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट पर भी बुरा असर पड़ रहा है."

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