असम: चाय बागानों में शराब से मौत होना यहां आम बात क्यों है?

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम के गोलाघाट से लौट कर
एक छोटे से अस्पताल के बाहर सफ़ेद कपड़े पहने कुछ लोगों ने एक कतार-सी बना रखी है.
इस कतार में पाँच साल के बच्चों से लेकर पचपन साल तक के वे लोग हैं जिनका कोई अपना पिछले दो सप्ताह के भीतर दम तोड़ चुका है.
असम के गोलाघाट इलाक़े में ये हालमीरा चाय का बागान है जहां बागान के भीतर जाने के लिए भी इजाज़त लेनी पड़ती है.
कुछ दिन पहले ज़हरीली शराब पीने से इस बागान के 46 बाशिंदों की मौत हुई है और दर्जनों अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं.

इसी कतार में खड़े हैं दो भाई-बहन - 12 साल की दीपा तेलांगा और उनका छोटा भाई सचिन. दोनों की नज़र एक एनजीओ की तरफ से आए उन लोगों पर टिकी हुई है जो बिस्कुट के पैकेट और लस्सी का टेट्रापैक बाँट रहे हैं.
बीते शुक्रवार को इन दोनों बच्चों के माता-पिता गोलाघाट बाज़ार से इनके लिए मिठाई और साथ में बिस्कुट के पैकेट भी लाए थे. आज ये दोनों बच्चे अनाथ हो चुके हैं और ये भी उस लाइन का हिस्सा हैं जिसे हर तरह की मदद की दरकार है.
छठी क्लास में पढ़ने वाली दीपा तेलांगा उस दिन के बारे में बताती हैं, "हम भाई-बहन खाना खा कर सो गए थे. उस शाम को काम से लौटने के बाद हमारे माता-पिता ने थोड़ी शराब पी थी."
"सुबह उठने पर पता चला कि पिता की तबियत ख़राब हो गई थी और माँ उन्हें लेकर अस्पताल भागीं थीं. लेकिन बाद में पता चला कि पहले माँ की ही मौत हो गई और इसके बाद पिता ने अगले दिन दम तोड़ा".

मसला सिर्फ़ इतना नहीं था. उस शाम को दीपा के माता-पिता के अलावा उनकी दादी और चाचा ने भी वही शराब पी थी. अगले दो दिनों में उन्होंने भी दम तोड़ दिया.
यानी एक परिवार के चार लोगों की मौत 48 घंटों के भीतर हुई और एक झटके में कई लोग अनाथ हो गए.


ज़हरीली शराब का दंश
असम के गोलाघाट इलाक़े में कई जगह मंज़र यही है क्योंकि 21 फ़रवरी के बाद से डेढ़ सौ से ज़्यादा चाय बागान मज़दूरों और किसानों की मौत ज़हरीली शराब पीने से हो चुकी है और इस सूची में महिला-पुरुष दोनों शामिल हैं.
लेकिन आख़िर चाय बाग़ानों में कौन काम करते हैं? गोलाघाट इलाक़े में हालमीरा की तरह के क़रीब 86 चाय के बागान है जिनका इतिहास डेढ़ सौ से लेकर दो सौ साल पुराना है.

चाय के इन बागानों को यहाँ पूरी तरह से बसाने का श्रेय उस दौर की ब्रिटिश सरकार का है जिसने असम की चाय को दुनिया के कई कोनों तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई.
इस प्रक्रिया में भारत के कई कोनों से मज़दूरों को लाकर इन बागानों में बसाने का काम भी ज़ारी रहा और यही वजह है कि लगभग हर बाग़ान में आपको उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, बिहार, बंगाल, ओडिशा और मध्य प्रदेश के रहने वाले लोग मिल जाएँगे.
दीपा तेलांगा की ही चार पुश्तें आन्ध्र प्रदेश से यहाँ लाई गयीं थीं. वो बात और है कि इतने विभिन्न प्रांतों से आए इन मज़दूरों की तीसरी-चौथी पीढ़ी अब सिर्फ़ असमिया भाषा ही जानती है और इनके रहन-सहन के तौर तरीक़े भी स्थानीय हो चुके हैं.
इस तरह के चाय बागानों में काम करने वालों की तनख़्वाह 70 रुपए प्रतिदिन से लेकर 200 प्रतिदिन तक होती है जिसके लिए इन्हें आठ घंटा काम करना अनिवार्य होता है.



थकान मिटाने के लिए शराब का सहारा
निभा बचपन से इस चाय बाग़ान में ही पली-बढ़ीं. उनकी शादी भी यहीं हुई है.
निभा ने बताया, "हम सुबह आठ बजे बागान में काम करने पहुँच जाते हैं. घर आते-आते शाम के पाँच बज जाते हैं. उसके बाद घर का काम और खाना भी बनाना होता है. एक-दो गिलास शराब पीने से थोड़ी थकान मिट जाती है और काम पूरा निपटा लेते हैं".
इस चाय के बागान में क़रीब 5,000 लोग रहते हैं जिनमें ज़्यादातर मज़दूर हैं.

400 हेक्टेयर में फैले इस चाय बागान में एक अस्पताल है, एक चाय पैकिंग करने वाली फ़ैक्टरी है, एक छोटा-सा बाज़ार है और अफ़सरों के क्वार्टर हैं.
ज़्यादातर चाय बागान निजी कम्पनियों के हैं, हालांकि कुछ सरकारी भी हैं.
लेकिन समय बिताने पर इन बागानों में काम करने वाले मज़दूरों की ग़रीबी और बेबसी का भी एहसास होने लगता है.
आधे घरों में बिजली नहीं है और सैंकड़ों परिवारों के पास शौचालय नहीं है.


शराब की लत
असम में हाल में ज़हरीली शराब पीने से 140 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. इनमें से दर्जनों मौतें हालमीरा के इसी बाग़ान से हुई हैं.
इतनी बड़ी दुर्घटना को कुछ ही दिन हुए हैं. बावजूद इसके हमारी मुलाक़ात कई ऐसे लोगों से हुई जिन्होंने सुबह ग्यारह बजे ही देशी शराब पी रखी थी.
जैसे-जैसे बागान के भीतर जाइए यहाँ के कई कड़वे सच बाहर आने लगते हैं.
घरों के इर्द-गर्द कूड़े के ढेरों में शराब की बोतलों का मिलना यहां आम बात है. घटना के बाद लोग डरे तो हैं लेकिन अभी भी शराब का सेवन बदस्तूर जारी है.

बागान की तरफ़ से अपने कंधों पर दो पानी के कनतर लेकर आते हुए बबलू घटवाल से हमने बात की.
उन्होंने बताया, "मेरा काम बागान में काम करने वाले मज़दूरों को पानी पिलाना है. 67 रुपए रोज़ की पगार है और 10 रुपए में शराब का एक क्वार्टर आता है जिसे मैं थकान मिटाने के लिए पीता था. लेकिन एक हफ़्ते से मैंने शराब नहीं पी है".
बबलू के पास से भी शराब की महक आ रही थी.
इन बाग़ानों में ज़्यादातर महिलाएँ और पुरुष शराब पीते हैं.


घरेलू हिंसा की जड़
ज़हरीली शराब पीकर मरने वालों और गोलाघाट और जोरहाट के अस्पताल में इलाज करवा रहे लोगों में महिलाओं की संख्या भी काफ़ी है.
स्थानीय पत्रकार रितुपल्लभ साईकिया के मुताबिक़, "यहाँ महिलाओं से काम भी करवाया जाता है और अक़्सर उनके पैसे भी उन्हें नहीं मिलते. मैंने ख़ुद कई मामले देखे हैं जिनमें वे घरेलू हिंसा का भी शिकार होती रहती हैं. इस सब की प्रमुख वजह शराब ही है".

इसी बागान के बाहर एक छोटी और जर्जर-सी झोपड़ी के बाहर 51 वर्ष के मौसम अली बैठे हुए मिले. आँखें लाल थीं और ज़बान बहक रही थी.
उन्होंने कहा, "परसों मेरी पूर्व पत्नी की मौत हो गई. हम दोनों शराब पीते थे इसी वजह से झगड़े होते थे और हम अलग हो गए. उसने गाँव में किसी और से शादी कर ली थी".
साल 2017 में डिब्रूगढ़ विश्विद्यालय के एक शोध के मुताबिक़ इन चाय बाग़ानों में 14-16 वर्ष की आयु के लोग भी शराब पीने के आदी हो जाते हैं जिससे इलाक़े में बीमारियाँ और मौतें होती रहती हैं.
बागान में काम करने वाली एक नर्स के मुताबिक़, "इस बार मामला बड़ा हो गया तो जाँच बैठ गई और लोगों को हिरासत में लिया गया. वरना यहाँ तो ज़हरीली शराब पीने से मौतें होना कोई नई बात नहीं".
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