'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के पीछे क्या बीजेपी का कोई राजनीतिक संदेश भी है

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- Author, अर्जुन परमार
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
गुजरात का सोमनाथ मंदिर हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पवित्र माने जाने वाले 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है.
इतिहास और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में ख़ास महत्व वाला सोमनाथ मंदिर इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में है. सोमनाथ में चार दिनों का 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' आयोजित किया गया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हो रहे हैं.
प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के मुताबिक़, यह उत्सव जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले के एक हज़ार साल पूरे होने की याद में मनाया जा रहा है.
पीआईबी के अनुसार, "यह उत्सव विनाश को याद करते हुए नहीं बल्कि आस्था, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और पुनर्जन्म की भावना के सम्मान के रूप में मनाया जा रहा है."
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इन चार दिनों के दौरान, सोमनाथ आध्यात्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक चिंतन और राष्ट्रीय स्मृति के प्रतीक में बदला दिखेगा. उत्सव के दौरान सोमनाथ में अलग-अलग आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं.
सोमनाथ में 8 से 11 जनवरी तक चलने वाले इस उत्सव का आयोजन 'भव्य' तरीके से किया जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही इस उत्सव के राजनीतिक संदेश को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है.
आज कई राजनीतिक विशेषज्ञ देश की राष्ट्रीय राजनीति में 'बीजेपी के प्रभुत्व' और 'हिंदू राष्ट्रवाद की भावना' के अधिक प्रचलित होने की घटनाओं को सोमनाथ में शुरू हुए प्रयासों से जोड़ते हैं.
जब आडवाणी की रथ यात्रा सोमनाथ से शुरू हुई

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राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सोमनाथ से शुरू हुई आडवाणी की रथ यात्रा भारतीय राजनीति में एक 'महत्वपूर्ण मोड़' थी.
इस यात्रा के कारण न केवल बीजेपी और आडवाणी, बल्कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया.
दिसंबर 1989 में हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने पहली बार अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर (अयोध्या) निर्माण के मुद्दे को शामिल किया था.
इसका नतीजा यह हुआ कि इससे पहले हुए लोकसभा चुनावों (साल 1984) में 224 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ़ दो सीटें जीतने वाली बीजेपी को साल 1989 के चुनाव में 85 सीटों पर जीत मिल गई.
कई विश्लेषक इस घटना को देश में 'हिंदू राष्ट्रवाद के उदय की शुरुआत' मानते हैं.
उस वक़्त एक तरफ देश के कई इलाक़ों में 'मंडल कमीशन' (आरक्षण) के समर्थन और विरोध में आंदोलन हो रहे थे, वहीं बीजेपी ने 'अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण' के मुद्दे पर अपनी सियासत को आगे बढ़ाया.
इसके लिए साल 1991 में, जब लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक अपनी रथ यात्रा शुरू की, तो मोदी को यात्रा के गुजरात चरण की जिम्मेदारी दी गई थी.
'द आर्किटेक्ट ऑफ न्यू बीजेपी, हाउ नरेंद्र मोदी ट्रांसफॉर्म्ड द पार्टी' के लेखक अजय सिंह कहते हैं, "जब आडवाणी और प्रमोद महाजन सोमनाथ मंदिर के पास वेरावल पहुंचे, तो उन्हें वहां पार्टी का कोई पोस्टर या झंडा नहीं दिखा. पार्टी में यह चिंता भी थी कि शायद यात्रा की तैयारियां ठीक से नहीं हुई थीं. लेकिन जब अगले दिन यात्रा शुरू हुई, तो हज़ारों लोग सड़कों पर थे."
उन्होंने लिखा है, "समाज के हर वर्ग ने इसमें भाग लिया. पहली बार बीजेपी उन लोगों तक पहुंची जिनसे संघ परिवार ने अब तक जुड़ने की कोशिश नहीं की थी."
पत्रकार शकील अख़्तर के अनुसार, "राम जन्मभूमि आंदोलन ने हिंदुओं के बीच बिखरी हुई राष्ट्रवादी भावना को एक राजनीतिक आंदोलन और धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्रवाद में बदल दिया. राम जन्मभूमि आंदोलन ने देश में पहली बार हिंदू राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़कर हिंदुओं की अंतरात्मा की आवाज़ उठाने का काम किया."
आडवाणी की यात्रा के 35 साल बाद

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इस रथ यात्रा के क़रीब 35 साल बाद, आज देश में बीजेपी की सरकार है और सरकार ने 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' का आयोजन किया है.
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार जगदीश आचार्य के अनुसार, सोमनाथ के बारे में कोई भी बात हिंदू समुदाय पर 'फौरन असर' डालती है.
जगदीश आचार्य आगे कहते हैं, "इस बार भारत के पांच-छह राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और गुजरात में स्थानीय निकायों के चुनाव भी होंगे. इसे ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने सोमनाथ पर आक्रमण की 1000वीं वर्षगांठ को एक बड़ा आयोजन बनाने और इससे अधिक से अधिक राजनीतिक लाभ उठाने की रणनीति तैयार की है."
उनका कहना है कि बीजेपी ने इस पूरे आयोजन को बहुत ही 'भव्य' रूप देकर इसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है.
"बीजेपी ने मुस्लिम आक्रमणकारियों की क्रूरता और हिंदू समुदाय की वीरता को एक साथ पिरोकर इस पूरी घटना को एक नया रूप दे दिया है, जो लोगों को प्रभावित करता है. "
"इस घटना के ज़रिए बीजेपी को अपनी कट्टर हिंदू राजनीति को फिर से दिखाने का एक और मौक़ा मिल गया है.
साथ ही बीजेपी को वह कहानी फिर से फैलाने का मौक़ा मिला है कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ थे. एक ऐसा कार्यक्रम जो हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की बीजेपी की योजना को भारी समर्थन देगा."
सौराष्ट्र के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार कौशिक मेहता के अनुसार, "यह कार्यक्रम एक बार फिर इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि 'प्रधानमंत्री मोदी यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे नेहरू से बेहतर शासक' हैं."
कौशिक मेहता कहते हैं, "नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेहरू की आलोचना या उन्हें बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ते. यह कार्यक्रम भी इसी का हिस्सा दिखाई देता है. यह माहौल इस उद्देश्य के लिए उपयुक्त है और इसमें हर तरह की सही-ग़लत की झलक दिखाई दे रही है. इस अवसर का पूरा उपयोग उसी मक़सद को हासिल करने के लिए किया जा रहा है."
इस कार्यक्रम को गुजरात में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़ते हुए उन्होंने कहा, "सोमनाथ हिंदू धर्म का एक बहुत बड़ा केंद्र है और मुस्लिम आक्रमणकारियों के हमलों के बारे में बताने के लिए यह आयोजन बहुत महत्वपूर्ण है. इसके अलावा, अगले साल गुजरात में विधानसभा चुनाव भी होने हैं और यह पूरा मुद्दा बीजेपी की रणनीति के लिए बहुत उपयुक्त है."
हालांकि बीजेपी नेता यज्ञेश दवे कहते हैं, "जब कोई धार्मिक त्योहार अपनी तिथि और समय के अनुसार मनाया जाता है और पूरा देश इसके उत्सव में शामिल होता है, तो मुझे नहीं लगता कि इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से देखना सही है."
उन्होंने कहा, "भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमनाथ मंदिर के न्यासी भी हैं और उन्होंने सोमनाथ कॉरिडोर और उसके आसपास के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है. जब पूरा भारत इस अवसर को धार्मिक रंगों से सजे त्योहार के रूप में मना रहा है, तो इसे राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है."
बीजेपी के सामने कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं?

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जगदीश आचार्य का कहना है कि अगर हम गुजरात की बात करें तो राज्य में बीजेपी के लिए कोई वास्तविक चुनौती नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह बात सच नहीं है.
उनका कहना है, "बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर कई साल से सत्ता में है. राष्ट्रीय स्तर पर सरकार को अब जनता के हितों और विकास के लिए किए गए कार्यों का हिसाब देना होगा क्योंकि आप लंबे समय तक एक ही मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ सकते. और इसमें हिंदुत्व भी शामिल है."
उनके मुताबिक़, "अब जो सवाल उठेंगे, वो सरकार के प्रदर्शन से जुड़े होंगे. विदेश नीति, भारत के अमेरिका और अन्य देशों के साथ संबंध और उसकी चुनौतियों से जुड़े सवाल होंगे. इसके अलावा, भारत की आर्थिक नीति से संबंधित सवाल भी पूछे जाने लगे हैं."
कौशिक मेहता का मानना है कि आने वाले दिनों में बीजेपी को स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.
वे कहते हैं, "हाल ही में इंदौर में प्रदूषित पानी के कारण लोगों की जान चली गई. ऐसा उन शहरों में होता है जिन्हें सबसे स्वच्छ शहर का पुरस्कार मिलता है. इस तरह के विरोधाभास हमेशा लोगों की नज़रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं."
"इसके अलावा, राजकोट और गांधीनगर जैसे शहरों में लोगों को स्थानीय स्तर पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनके ख़िलाफ़ लोग अक्सर आवाज़ उठाते हैं. ये सभी बातें स्थानीय स्तर पर बीजेपी के लिए चुनौतियां खड़ी करती हैं."
हालांकि, कौशिक मेहता और जगदीश आचार्य दोनों का मानना है कि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के सामने कई चुनौतियों के बावजूद, इन मुद्दों को उठाने में विपक्ष की कमजोरी से उस पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















