अली रज़ा आराफ़ी कौन हैं जिन्हें ख़ामेनेई की मौत के बाद माना जा रहा है अगला सुप्रीम लीडर

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- Author, मसूद आज़र
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
इसराइल और अमेरिका के हमले में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद ईरान की अंतरिम लीडरशिप काउंसिल का गठन हो गया है.
तीन सदस्यों वाली इस काउंसिल में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान, सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ग़ुलाम-हुसैन मोहसनी-एजई और गार्जियन काउंसिल के सदस्य अली रज़ा आराफ़ी को शामिल किया गया है.
गार्जियन काउंसिल के सदस्य अली रज़ा आराफ़ी को अंतरिम लीडरशिप काउंसिल के ज्यूरिस्ट पद पर चुना गया है.
ईरानी संविधान के अनुच्छेद 111 के मुताबिक़ अगर सर्वोच्च नेता की मृत्य हो जाए, वह इस्तीफ़ा दे दें या उन्हें पद से हटा दिया जाए, तो अंतरिम लीडरशिप काउंसिल का गठन किया जाता है.
इस काउंसिल में राष्ट्रपति, न्यायपालिका के प्रमुख और गार्जियन काउंसिल के सदस्यों में से एक सदस्य को शामिल किया जाता है.
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अंतरिम लीडरशिप काउंसिल क्या करेगी?
अब ईरान का नया सर्वोच्च नेता चुने जाने तक देश की बागडोर तीन सदस्यों वाली यही अंतरिम लीडरशिप काउंसिल संभालेगी.
हालांकि, इस काउंसिल के पास पूरे अधिकार नहीं है. कई मामलों में इसके फ़ैसले सर्वोच्च नेता की सलाहकार परिषद के तीन-चौथाई सदस्यों की मंज़ूरी से ही लागू किए जा सकते हैं.
वो मामले हैं-
- सिस्टम की सामान्य नीतियों का निर्धारण
- जनमत-संग्रह की घोषणा
- युद्ध या शांति की घोषणा
- राष्ट्रपति को पद से हटाना
- जॉइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़, रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर या शीर्ष सैन्य और पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति या बर्ख़ास्तगी
रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख कमांडर, सशस्त्र बलों के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ और कई शीर्ष सैन्य अधिकारियों की मौत के बाद उम्मीद की जा रही है कि अंतरिम लीडरशिप काउंसिल इस संबंध में तीन-चौथाई बहुमत से निर्णय लेगी.
अली रज़ा आराफ़ी कौन हैं?
ईरानी मीडिया के अनुसार, अली रज़ा आराफ़ी का जन्म 1959 में यज़्द प्रांत के मेबद शहर में हुआ था.
उनके पिता मोहम्मद इब्राहिम आराफ़ी अपने समय के धर्मगुरु थे, जो पहलवी शासन के विरोध में सक्रिय थे और आयतुल्लाह ख़ुमैनी के क़रीबी धर्मगुरुओं के संपर्क में थे. उनकी मां शेख़ काज़िम मलिक-अफ़ज़ल अर्दकानी की बेटी थीं.
अली रज़ा आराफ़ी ने बचपन में अपने पिता और दूसरे शिक्षकों से शुरुआती धार्मिक शिक्षा ली. अपनी प्राथमिक शिक्षा के लिए वह क़ुम गए और इसके बाद उन्होंने मदरसे में पढ़ाई की.
आराफ़ी ने मोर्तेज़ा हेरी यज़्दी, मोहम्मद फ़ज़ल लंकरानी, हुसैन वाहिद खोरासानी, जवाद तबरीज़ी और हसन हसनज़ादे अमोली जैसे कई शिया धार्मिक विद्वानों से भी शिक्षा ली. उन्होंने मोहम्मद तक़ी मिस्बाह यज़्दी की दर्शनशास्त्र की कक्षाएं भी लीं.
आराफ़ी को मदरसों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने का अनुभव है और उन्होंने कई शोध कार्यों में सलाह दी है.
युवावस्था से ही वह राजनीति में सक्रिय थे और अपने पिता के साथ पहलवी शासन के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल रहे. 16 साल की उम्र में उन्हें गिरफ़्तार कर कुछ समय के लिए जेल भेजा गया था.
1979 में क़ुम के मदरसे में "काउंसिल फ़ॉर द सुपरविज़न ऑफ़ नॉन-इरानियन स्टूडेंट्स" नाम का एक संगठन बनाया गया था. 1986 में इस संगठन के स्ट्रक्चर में बदलाव और इसकी गतिविधियां बढ़ाने के बाद इसका नाम "वर्ल्ड सेंटर फ़ॉर इस्लामिक साइंसेज़" कर दिया गया.
1993 से यह संगठन ईरान के सर्वोच्च नेता की देखरेख में आया और साल 2002 में ख़ामेनेई ने आराफ़ी को इस संगठन का नेतृत्व सौंपा. आराफ़ी 2008तक इसके प्रमुख रहे.
आराफ़ी यूनिवर्सिटी ऑफ़ होली क़ुरान साइसेंज़ एंड एजुकेशन के बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ के सदस्य हैं.
वो मेबद के इमाम-ए-जुमे (शुक्रवार नमाज़ के नेता) और 2014 में क़ुम के इमाम-ए-जुमे भी रहे हैं.
वो सांस्कृतिक क्रांति की सर्वोच्च परिषद के सदस्य हैं. साल 2016 में उन्हें क़ुम मदरसे का डायरेक्टर और ईरान की मदरसों का प्रमुख नियुक्त किया गया था.
वो क़ुम मदरसे के टीचर्स एसोसिएशन के सदस्य हैं.
आराफ़ी साल 2019 में ख़ामेनेई के आदेश पर गार्जियन काउंसिल के सदस्य बने थे.
ख़ामेनेई के भरोसेमंद रहे हैं आराफ़ी

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कुछ साल पहले तक अली रज़ा आराफ़ी का नाम कम ही लोग जानते थे. पहले उन्हें "हुज्जत अल-इस्लाम" कहा जाता था, जबकि अब उन्हें "आयतुल्लाह" कहा जा रहा है.
ख़ामेनेई को आराफ़ी पर पूरा भरोसा था और उन्हें उनके क़रीबी लोगों में गिना जाता था.
इसी भरोसे और क़रीबी के कारण धीरे-धीरे आराफ़ी का क़द बढ़ता गया. यहां तक कि उनका नाम ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी के संभावित उम्मीदवारों में भी शामिल होने लगा.
अपने भाषणों और सार्वजनिक रुख़ में आराफ़ी अक्सर इस्लामी गणराज्य के नेता के विचारों को ज़ाहिर करते रहे हैं.
साल 2016 में उन्होंने ऐसी "सोच" की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जो "पश्चिमी सोच" का मुक़ाबला कर सके और साथ ही, उसमें बातचीत, विरोध, जिहाद और क्रांति जैसे सिद्धांत समाहित हों.
विदेश नीति और घरेलू मुद्दों पर भी उनके विचार सर्वोच्च नेता की घोषित नीतियों के मुताबिक़ रहे हैं.
उन्होंने ईरान का डिफ़ेंस कार्यक्रम जारी रखने, अमेरिका के रुख़ पर जवाब देने और जनसंख्या वृद्धि की नीतियों पर बल दिया है.
जुलाई 2017 में क़ुम की जुमे की नमाज़ के दौरान उन्होंने अमेरिका को "दुनिया में मानवाधिकार उल्लंघन का केंद्र" बताया था.
आराफ़ी की उन्नति से स्पष्ट है कि वे हाल के वर्षों में इस्लामी गणराज्य की धार्मिक और राजनीतिक संरचना में एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बनकर उभरे हैं.
अंतरिम लीडरशिप काउंसिल में उन्हें सौंपी गई ज़िम्मेदारी के मद्देनज़र ऐसा माना जा रहा है कि अब ईरान में आगे जो भी होगा, उसमें आराफ़ी की एक अहम भूमिका हो सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.













