ईरान का पड़ोसी इस्लामी देशों पर हमले करने का क्या मक़सद हो सकता है?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
अमेरिका और इसराइल के शनिवार, 28 फ़रवरी को ईरान पर हमला करने के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने मध्य-पूर्व में कई इस्लामी देशों पर हमले किए.
ये देश ईरान के इसलिए निशाने पर आए क्योंकि वहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं. इन्होंने अमेरिका-इसराइल की ईरान के ख़िलाफ़ की गई साझा कार्रवाई में मदद की थी.
ईरानी सेना ने कहा कि अमेरिका और इसराइल के ईरान पर किए जा रहे बड़े पैमाने पर और लगातार हमले के जवाब में ईरान ने पूरे क्षेत्र में हमले शुरू कर दिए हैं.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा कि ईरान आत्मरक्षा के लिए सभी सैन्य तरीक़ों का इस्तेमाल करेगा.
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने अपने बयान में कहा कि ईरान अमेरिका-इसराइल के हमलों की जवाबी कार्रवाई में 'ट्रूथफुल प्रॉमिस 4' अभियान के तहत अमेरिकी ठिकानों और संपत्तियों को निशाना बना रहा है.
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ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने अपने बयान में कहा कि ईरान ने जिन देशों को निशाना बनाया उनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन, कुवैत और जॉर्डन शामिल हैं.
इन घटनाओं के बाद मध्य-पूर्व में हालात और अधिक गंभीर हो गए हैं और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं.
ईरान के हमलों में क्या-क्या हुआ?

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ईरान के हमलों के बाद दुबई और अबू धाबी के हवाई अड्डों पर एक व्यक्ति की मौत हो गई और 11 लोग घायल हो गए.
अबू धाबी के अधिकारियों ने पुष्टि की कि ज़ाएद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाकर भेजे गए एक ड्रोन को बीच में ही मार गिराया गया लेकिन उसके गिरते मलबे से एक व्यक्ति की मौत हो गई और सात अन्य घायल हो गए.
दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा यात्री संख्या के लिहाज़ से दुनिया का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है. यह भी इन हमलों में क्षतिग्रस्त हुआ और अधिकारियों के मुताबिक़ यहाँ चार कर्मचारी घायल हुए.
इस घटनाक्रम के बाद क्षेत्र से आने-जाने वाली हज़ारों उड़ानें रद्द या स्थगित कर दी गईं हैं.
रविवार 1 मार्च को भी ईरान ने जवाबी हमले जारी रखे और दोहा, दुबई और मनामा में धमाकों की आवाज़ें सुनी गईं.
अपने सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल करते हुए खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों और ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए हैं.
अमेरिका-इसराइल के साझा हमले में ख़ामेनेई के मारे जाने की पुष्टि शनिवार सुबह ईरान के सरकारी मीडिया ने की थी.
इस बीच, क़तर, बहरीन, जॉर्डन और कुवैत ने कहा कि उन्होंने उनकी ओर दागी गई मिसाइलों को रोक लिया लेकिन गिरते मलबे से बड़े पैमाने पर नुक़सान हुआ है. यहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं.
दुबई में भी एक हवाई हमले को रोके जाने के दौरान गिरे मलबे से जेबेल अली डीप सी पोर्ट के एक हिस्से में आग लग गई. यह दुनिया का नौवाँ सबसे व्यस्त बंदरगाह है.
बहरीन के गृह मंत्रालय ने बताया कि ड्रोन हमले के कारण वहाँ के हवाईअड्डे को नुक़सान पहुँचा. रविवार सुबह भी ऐसे हमलों की अपुष्ट ख़बरें थीं.

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शनिवार को ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने कहा कि उन्होंने मनामा (बहरीन की राजधानी) में स्थित अमेरिकी नौसेना के पाँचवें बेड़े (फ़िफ़्थ फ़्लीट) के मुख्यालय पर हमला किया है. उस इलाक़े से काले धुएँ के बड़े ग़ुबार उठते देखे गए.
उधर, ओमान की सरकारी समाचार एजेंसी ने रिपोर्ट किया कि दुक़्म के वाणिज्यिक बंदरगाह पर दो ड्रोन गिरे जिससे एक कर्मचारी घायल हो गया.
अब तक क्या प्रतिक्रिया हुई?
ईरान के मुस्लिम-बहुल देशों पर किए गए हमलों के बाद कई देशों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया.
ऑर्गेनाईज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) जो कि संयुक्त राष्ट्र के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन है, उसने भी ईरान के हमलों की निंदा की है.
ओआईसी में 57 देश शामिल हैं. इसे अक़्सर इस्लामी दुनिया की सामूहिक आवाज़ कहा जाता है. साल 1969 में बनी इस संस्था का मक़सद दुनिया भर में मुसलमानों के हितों की हिफ़ाज़त करना है.
एक बयान में ओआईसी ने कहा कि सदस्य देशों की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों का लगातार उल्लंघन, एक ख़तरनाक मिसाल है. इससे अच्छे पड़ोसी संबंधों, आपसी सम्मान और दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दख़ल न देने जैसे अंतरराष्ट्रीय रिश्तों की बुनियाद कमज़ोर पड़ती है.
सऊदी अरब के मक्का में स्थित अंतरराष्ट्रीय इस्लामी ग़ैर-सरकारी संगठन 'मुस्लिम वर्ल्ड लीग' ने भी पड़ोसी अरब देशों के ख़िलाफ़ ईरान की कार्रवाई की कड़ी निंदा की है.
ईरान के हमलों ने खड़े किए कई सवाल

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ईरान के पड़ोसी देशों पर किए गए हमलों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
क्या ईरान ने तुरंत सैन्य कार्रवाई करके उस अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति को कमज़ोर कर दिया जो संयुक्त हमलों के बाद उसे मिल सकती थी?
क्या ये हमले खाड़ी देशों को ईरान से और दूर धकेल देंगे?
साथ ही क्या मिसाइल हमलों से खाड़ी देशों में फैली दहशत, नागरिकों का सुरक्षित ठिकानों पर जाना और अबू धाबी में एक नागरिक की मौत जैसे घटनाक्रम क्या ये सवाल और महत्वपूर्ण तो नहीं कर देते हैं कि ईरान ने अपनी ताक़त दिखाने की कोशिश में कूटनीतिक जोख़िम बढ़ा लिए हैं?
ऐसे वक़्त में जहां क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियाँ संयम और संवाद की अपील कर रही हैं, उस वक़्त क्या ईरान का यह आक्रामक रवैया भविष्य की बातचीत में उसकी स्थिति को कमज़ोर करेगा?
और क्या यह क़दम अंतरराष्ट्रीय मंच पर समर्थन जुटाने के बजाय उसके लिए विरोध को और मज़बूत करेगा?
क्या ईरान के हमले एक 'कूटनीतिक भूल' हैं?

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अश्विनी महापात्रा जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर हैं और मध्य-पूर्व के मामलों के जानकार हैं.
वो कहते हैं, "ये डिप्लोमेटिक ब्लंडर (कूटनीतिक भूल) नहीं है. ईरान में अमेरिका और इसराइल के हमले के बाद जो सत्ता की अथॉरिटी थी वो ध्वस्त हो गई. तो उसके बाद ये जो कार्रवाई ईरान कर रहा है वह अपनी जनता को यह दिखाने के लिए है कि अभी भी सत्ता बरक़रार है."
प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं कि ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद जो ख़ालीपन आ गया है, उसका असर अस्थिरता पैदा करने वाला है, तो वहाँ की सत्ता के जो लोग हैं, उन्हें भी अब नहीं पता है कि वे आगे कैसे बढ़ेंगे.
वो कहते हैं कि ईरान के हमले ये दिखाते हैं कि उनकी सरकार के अंदर एक अस्त-व्यस्त सी हालत हो गई है.
प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं, "बाहर से आपको डिप्लोमेटिक ब्लंडर लगेगा लेकिन अंदर से जो हालात बन रहे हैं उनमें ये देखना होगा कि ईरान की नीति बनाएगा कौन और ये कौन तय करेगा कि कैसा जवाब दिया जाए और क्या दिशा निर्धारित की जाए."
"एक होता है कि घबराहट में आप कुछ कर रहे हैं. दूसरा होता है कि आप सोच-समझ कर ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि अभी भी ये सत्ता बरक़रार है और इसकी वैधता है. जो लोग ख़ामेनेई का विरोध करते थे, उनको वे ठिकाने लगा सकते हैं. तो ईरान की सरकार अपनी ताक़त दिखा रही है. उसके लिए सवाल सरकार की वैधता का है. मैं नहीं मानता कि ये डिप्लोमेटिक ब्लंडर है क्योंकि जब एक स्थिर सरकार ही नहीं है तो ये एक घबराहट भरी प्रतिक्रिया है."
प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं कि ईरान के पास "लॉन्ग रेंज मिसाइल हैं तो जितने अमेरिकी बेस हैं क़तर से लेकर जॉर्डन तक, उन पर वो हमला कर ही सकते हैं. उनकी रेंज में वे आते हैं. उन्हें भी तो अपनी जनता को दिखाना है न?"
डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के नेल्सन मंडेला सेंटर फ़ॉर पीस एंड कॉनफ़्लिक्ट रेज़ोलुशन में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.
उनका मानना है कि ईरान ने कूटनीतिक भूल तो की है.
वो कहते हैं, "डिप्लोमेटिक ब्लंडर तो बिल्कुल है और उसकी वजह यह नहीं है कि ईरान खाड़ी के देशों को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाना चाह रहा था. ये हमले दिखाते हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता सीमित है. ऑपरेशन की कमियाँ अब उजागर हो गई हैं."

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डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा कहते हैं कि हमले दिखाते हैं कि ये हताशा में किए गए हैं, इसमें ईरान किसी भी तरह जवाब देते हुए दिखना चाह रहा है.
उनके मुताबिक़, "तो हताशा में की गई इस कार्रवाई में डिप्लोमेटिक ब्लंडर तो हुआ है. इसका नतीजा यह हुआ है कि पहले जो खाड़ी के देश अपने एयरस्पेस देने से मना कर रहे थे, उन्होंने अब सामूहिक रूप से अमेरिकी छत्रछाया को स्वीकार कर लिया है और इसराइल को अपनी एयरस्पेस दे दी है."
ईरान के मुस्लिम देशों से रिश्तों का क्या होगा?
ईरान के हमलों का उसके पड़ोस के इस्लामी देशों से रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं, "अमेरिका और इसराइल ने जो भी किया है, वह ईरान की सत्ता बदलने के लिए किया है. अब ये देखना होगा कि भविष्य में ईरान की सत्ता किसके हाथ में आती है. इस क्षेत्र के सारे इस्लामी देश अमेरिका के सहयोगी देश हैं. सब देशों के अमेरिका के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते हैं."
डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा कहते हैं, "यह ज़रूर है कि खाड़ी के देशों में जनता की जो राय है, वह ईरान का समर्थन नहीं करेगी क्योंकि पब्लिक सेंटिमेंट राष्ट्रवाद को एक बहुत मज़बूत ढंग से देखती है. वह सिर्फ़ धर्म के हिसाब से अपने आप को नहीं देखती है. सऊदी के लोग हों, यूएई के लोग हों, क़तर के लोग हों- उनके लिए ईरान के प्रति उस तरह का रवैया नहीं रहेगा. ख़ासकर अगर आईआरजीसी का शासन जारी रहता है."
डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा का कहना है, "इस अराजकता में क्षेत्रीय सुरक्षा ख़तरे में पड़ जाएगी लेकिन इन हालात में यह ज़रूर है कि खाड़ी के देश चाहेंगे कि ईरान में जो बदलाव हो उसमें कम से कम अव्यवस्था हो क्योंकि उस अव्यवस्था का सबसे बड़ा असर ईरान के पड़ोसियों पर ही होगा."
सवाल यह भी है कि क्या भविष्य में इन इस्लामी देशों में अमेरिकी सेना की मौजूदगी बढ़ेगी?
प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा कहते हैं, "वह अमेरिका पर निर्भर करता है. जब तक राष्ट्रपति ट्रंप हैं, वे बेस उसी हालत में रहेंगे. दूसरे देशों में ऐसे मिलिटरी बेस रखना और उन्हें मेन्टेन करना, इसमें बहुत बड़ी पूँजी लगती है. ये निर्भर करेगा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कि क्या यह सिलसिला भविष्य में भी जारी रह सकता है? सारी बात आर्थिक संसाधनों की है."

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डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा कहते हैं, "देखिये ईरान के पड़ोसी देशों में अमेरिका की उपस्थिति पहले से ही है. लेकिन अमेरिका का फुटप्रिंट बिल्कुल बढ़ेगा. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस बात से गुरेज़ नहीं करेंगे. इसराइल भी चाहेगा कि अमेरिका इस इलाक़े में स्थाई तौर पर एक 'सेफ़्टी गार्डियन' के तौर पर रहे.''
''रणनीति के दो उद्देश्य होते हैं- राजनीतिक और सैन्य. ईरान में अगर सत्ता परिवर्तन होता है तो राजनीतिक मक़सद पूरा हो जाएगा. सैन्य मक़सद में लॉन्ग-टर्म प्लानिंग होती है क्योंकि जो ख़ालीपन आएगा उससे अव्यवस्था होगी. अमेरिका, इसराइल और खाड़ी के देश ये नहीं चाहेंगे कि ईरान अगला इराक़ बने."
क्या ईरान को कूटनीतिक अलगाव का सामना करना पड़ेगा?
सवाल यह भी है कि क्या इस हालिया घटनाक्रम के बाद ईरान को 'डिप्लोमेटिक आईसोलेशन' या कूटनीतिक अलगाव का सामना करना पड़ सकता है?
प्रोफ़ेसर अश्विनी महापात्रा का कहना है, "डिप्लोमेटिक आइसोलेशन तो पहले ही था क्योंकि इस इलाक़े में ज़्यादातर सुन्नी देश हैं. बहरीन में ज़्यादा शिया हैं लेकिन सुन्नी के पास सत्ता है. तो शिया-सुन्नी नज़रिए से देखेंगे तो कूटनीतिक परेशानी कोई नई बात नहीं होगी. वह तो पहले से ही है."
वो कहते हैं, "ईरान को तुरंत कोई समर्थन या सहानुभूति नहीं मिलेगी क्योंकि लोग कहेंगे कि ईरान को यह नहीं करना चाहिए था. आलोचना होगी कि जब जंग ईरान और इसराइल के बीच है, जिसमें अमेरिका भी शामिल है तो ईरान इन देशों को क्यों उसमें खींच रहा है.''
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