नितिन नबीन और यूपी में पंकज चौधरी को कमान देने के पीछे बीजेपी की रणनीति- द लेंस

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पिछले साल जब आम चुनाव समाप्त हुए तब से चर्चा थी कि भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल समाप्त हो गया है और जल्द ही पार्टी को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिलेगा.
बीजेपी ने देशभर में संगठन के चुनाव की प्रक्रिया शुरू की, मगर ये पूरी प्रक्रिया इतनी धीमी गति से चलती रही कि लगभग डेढ़ साल बाद भी पार्टी के पास न तो सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का नया अध्यक्ष था और न ही राष्ट्रीय स्तर पर.
मगर बीते हफ़्ते के आख़िर में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में सांसद पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष घोषित किया और उसी दिन शाम को बिहार के विधायक नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर दिया.
सारे बड़े नामों पर जारी अटकलें थम गईं और सभी राजनीतिक विश्लेषकों को बीजेपी ने एक बार फिर चौंकाया.
कोई भी ये नहीं सोच रहा था कि नितिन नबीन को पार्टी की कमान सौंपी जा सकती है.
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इन दोनों नियुक्तियों और बीजेपी की भावी रणनीति पर बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने चर्चा की.
इस बातचीत में शामिल हुए इंडियन एक्सप्रेस के सीनियर असिस्टेंट एडिटर संतोष सिंह और स्वतंत्र पत्रकार रूही तिवारी.
'नितिन नबीन का नाम सरप्राइज़ करने वाला'

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बीजेपी ने राष्ट्रीय स्तर पर नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है, क्या अंत में वही अध्यक्ष बनेंगे? इस सवाल पर संतोष सिंह कहते हैं कि नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की संभावना है.
वह कहते हैं, "हो सकता है कि ये प्रोबेशन पीरियड (कार्यकारी अध्यक्ष बनना) हो. किसी ने भी नहीं सोचा था कि नितिन नबीन को ये ज़िम्मेदारी मिलेगी क्योंकि राज्य स्तर पर भी जब हम लीडरशिप को देखते थे तो उनकी गिनती छठे या सातवें नंबर पर होती थी."
उन्होंने कहा, "हमने ये कभी नहीं सोचा था, जब ख़बर आई तो हमने चेक भी किया कि कभी राज्य का कार्यकारी अध्यक्ष तो नहीं बनाया है. तो नितिन नबीन का नाम सरप्राइज़ करने वाला है."
संतोष सिंह कहते हैं कि नितिन नबीन को राज्य स्तर पर ज़िम्मेदारियां देने की अटकलें लगाई जा रही थीं. इसके पीछे की वजहों के बारे में बताते हुए वह कुछ राजनीतिक घटनाओं के बारे में बताते हैं.
वह कहते हैं, "छठ पर्व के दौरान जब अमित शाह पटना आए तो नितिन नबीन के घर गए. ऐसा माना गया कि हो सकता है राज्य में चुनाव के बाद नितिन नबीन का कद बढ़े या डिप्टी सीएम का पद मिले."
संतोष सिंह दूसरी घटना का ज़िक्र करते हैं, "प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार के दौरान बिहार गए. प्रोटोकॉल के तहत बहुत सारे नेता पटना एयरपोर्ट उन्हें रिसीव करने गए. पीएम मोदी शुरुआत के मंत्रियों से मिलकर सीधे नितिन नबीन के पास रुकते हैं. यह बहुत सरप्राइज़िंग था. वह उनके पास क़रीब डेढ़ मिनट रुकते हैं और फिर चले जाते हैं."
"तीसरी घटना गांधी मैदान में हुए शपथ ग्रहण समारोह की है. इसका सारा आयोजन नितिन नबीन देख रहे थे. चौथा ये कि अप्रैल 2025 में मधुबनी में हुई एक रैली को ऑर्गेनाइज़ करने में नितिन नबीन का बहुत बड़ा योगदान था. इसके अलावा पार्टी के फंडिंग में उनकी एक अहम भूमिका रही है."
वह कहते हैं, "कमोबेश और भी लोग हैं, जिन्हें महत्वपूर्ण भूमिकाएं मिलीं. लेकिन इतना संकेत नहीं था कि नितिन नबीन को बनाया जाएगा. हम लोग ज़्यादा से ज़्यादा मान कर चल रहे थे कि हो सकता है, इनको राज्य का इंचार्ज बनाया जाए या फिर डिप्टी सीएम बनाया जाए. इसके आगे हमने नहीं सोचा था. तो जब उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया हम सब हैरान थे."
नितिन नबीन को क्यों मिली ज़िम्मेदारी?

नितिन नबीन की नियुक्ति के बाद उनकी कई सारी खूबियां गिनाई गईं, जैसे कि वह युवा हैं, अच्छे संगठनकर्ता हैं, लोगों से जुड़े हुए हैं, बहुत सारे विवादों में नहीं हैं.
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मात्र नितिन नबीन ही इन सारी शर्तों को पूरा कर रहे हों, बहुत सारे नाम पहले से चल रहे थे.
धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, शिवराज सिंह चौहान, सुनील बंसल जैसे नेताओं के नाम चल रहे थे.
अलग-अलग समय पर अलग-अलग नाम आते रहे, इन नेताओं की राष्ट्रीय स्तर पर छवि और पहचान है. आख़िर इन सबको छोड़कर प्रदेश के एक विधायक और मंत्री को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की क्या वजह रही होगी?
इस पर रूही तिवारी कहती हैं, "नरेंद्र मोदी और अमित शाह के किसी भी फ़ैसले का अनुमान नहीं लगा सकते, चाहे वो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का नाम हो या राजस्थान और दिल्ली के. बीजेपी के अध्यक्ष के मामले में भी यही हुआ."
रूही तिवारी भी मानती हैं कि नितिन नबीन का नाम बहुत ही आश्चर्य करने वाला था, किसी ने ये उम्मीद नहीं की थी.
नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने का कारण बताते हुए रूही तिवारी कहती हैं, "एक जो कारण कहा जा रहा है, वह ये कि नई पीढ़ी को आगे किया जा रहा है. नितिन नबीन 45 साल के हैं. नितिन गडकरी के बाद ये दूसरे सबसे युवा अध्यक्ष होंगे. लेकिन ये अकेले ऐसे नेता तो नहीं होंगे. 45 से 50 की उम्र के बीच ऐसे कई नेता होंगे जो शायद राष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा अनुभवी होंगे. इन्हें क्यों बनाया गया इसका जवाब तो प्रधानमंत्री और अमित शाह से ही मांगा जा सकता है."
"लेकिन एक चीज़ ज़रूर इनकी देखी गई है कि ये कुछ ऐसे लोगों को बनाते हैं जो पहले से राष्ट्रीय स्तर पर बहुत स्टेब्लिश्ड नहीं है. जिनका राष्ट्रीय स्तर पर या राज्य के स्तर पर बहुत ज़्यादा प्रेज़ेंस नहीं है. इससे हम ये समझ सकते हैं कि शायद कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी और अमित शाह ऐसे लोगों को आगे बढ़ाना चाहते हैं जो ज़मीन से जुड़े हैं, जिनके बारे में लोग बहुत ज़्यादा नहीं जानते हैं, लेकिन वे कड़ी मेहनत कर रहे हैं."
वह कहती हैं, "या फिर हम दूसरे तरीक़े से इसे ऐसे भी देख सकते हैं कि वे ऐसे लोगों को नहीं बनाना चाहते जिनसे उन्हें ख़तरा हो या उनके फ़ैसलों को चैलेंज कर सकते हों, या फिर उनकी सोच को और वे जिस तरीक़े से पार्टी को आगे ले जाना चाहते हैं, उसको चैलेंज कर सकते हैं. आप इसे दोनों तरीक़ों से देख सकते हैं."
'हो सकता है कि बीजेपी को अगला मुख्यमंत्री मिल गया हो'

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किसी भी पार्टी में अध्यक्ष पद को लेकर अंदरूनी राजनीति होती है, खींचतान होती है, कैंप होता है. बीजेपी को लेकर कहा जाता है कि वो कैंप बनाना संभव ही नहीं है, क्योंकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के हिसाब से सारी पार्टी चलती है.
हमें ये भी देखने को मिलता है कि पूरा का पूरा मंत्रिमंडल इस्तीफ़ा देता है और अगले दिन नए मुख्यमंत्री और नया मंत्रिमंडल शपथ ले लेता है, तो गुटबाज़ी यहां तो नहीं है. लेकिन जब आम चुनाव हुआ तो ये बात ज़रूर उठी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपनी भूमिका को थोड़ा और मुखर या प्रभावी करना चाहता है.
ये भी कहा गया कि एक खींचतान चल रही है, जिसकी वजह से इतनी आसानी से कोई नहीं बन पा रहा है. अब जब नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है तो क्या ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की इसमें ज़्यादा चली है?
इस पर संतोष सिंह कहते हैं, "मुझे पता नहीं इसमें आरएसएस की कितनी भूमिका है. ऐसा कहा जा रहा है कि उन्हें लूप में लिया गया है. मुझे लगता है कि ये उनके 'बिहार पावर ट्रांसफ़र प्लान' का भी पार्ट हो सकता है. क्योंकि बिहार में आप देखेंगे कि एक मुख्यमंत्री पद के लिए सम्राट चौधरी, संजय जायसवाल, दिलीप जायसवाल, विजय कुमार चौधरी, नित्यानंद राय... इस तरह के नामों के बीच कड़ा कॉम्पिटीशन होता हुआ दिखता है."
वह कहते हैं, "यहां से एक ऐसा व्यक्ति नितिन नबीन, जो अभी तक सबको चाचा-भइया कहा करते थे, पैर छूकर प्रणाम करते थे. वो अचानक सबसे ऊपर हो जाते हैं."
वह बताते हैं, "बिहार में जब पावर ट्रांसफ़र का समय आता है तो नितिन नबीन की ऐसी छवि है कि उनकी जेडीयू में भी स्वीकार्यता बहुत है, संगठन में भी है. एक होता है- 'लाइक बाय ऑल टाइप', जैसे किसी को चैलेंज नहीं करना न ही इंटेलेक्चुअल या दूसरी तरह से, संपूर्ण संगठनकर्ता, कंप्लीट 'यस मैन'. तो इस फ़्रेम में उन्हें लोग देखते थे."
संतोष सिंह का मानना है कि नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के पीछे दो कारण हो सकते हैं.
वह कहते हैं, "कहीं न कहीं नितिन नबीन टॉप लीडरशिप की पसंद थे. उनके लिए एक सॉफ़्ट कॉर्नर ज़रूर रहा था. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन्होंने जाति राजनीति को साध लिया है. अपर कास्ट कायस्थ की आबादी एक फ़ीसदी से भी कम है."
संतोष सिंह कहते हैं, "बीजेपी का जिस तरह का ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर है, वहां नितिन नबीन फ़िट बैठते थे. और दूसरा ये कि वह बड़े बिहार प्लान का हिस्सा हो सकते हैं. हो सकता है कि बीजेपी को अगला मुख्यमंत्री मिल गया हो."
क्या बीजेपी ने जाति को नज़रअंदाज़ किया?
जब नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया तो यह कहा जा रहा है कि ये काडर बेस्ड पार्टी ही कर सकती है. जहां पर किसी फ़ैसले के पीछे पूरा काडर बिना सोचे सपोर्ट करे कि ये किस जाति के हैं.
लेकिन उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी को जब अध्यक्ष बनाया गया तो यह कहा गया कि ये समाजवादी पार्टी के पीडीए के कास्ट कॉम्बिनेशन की काट है. तो ये दोनों चीज़ें साथ में चलती हुई तो नहीं दिखतीं?
इस पर रूही तिवारी कहती हैं कि बीजेपी को भले ही काडर बेस्ड पार्टी कहा जाता है, लेकिन वह कभी भी जाति को नज़रअंदाज़ नहीं करती है. क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार में जाति राजनीति बहुत हावी है.
उन्होंने कहा, "पंकज चौधरी ओबीसी लीडर हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में वहां का रिज़ल्ट बीजेपी ने देखा है, तो उस हिसाब से उन्होंने ऐसा नेता चुना है. मुझे नहीं लगता कि नितिन नबीन को ज़िम्मेदारी देना ये दिखाता है कि बीजेपी जाति को नज़रअंदाज़ करती है."
उनके मुताबिक़, बिहार में हाल ही में चुनाव हुए हैं और राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की बात थी, इसलिए शायद वहां पर जाति को बहुत महत्व नहीं दिया गया. लेकिन उत्तर प्रदेश में 2027 में चुनाव है, वहां ज़रूर जाति को महत्व दिया गया.
वहीं, संतोष सिंह मानते हैं कि बीजेपी जब अपने कंफ़र्ट ज़ोन में होती है तो वह इस तरह के प्रयोग करती है.
उनका कहना है, "केंद्र जब बहुत मज़बूत हो जाता है तो राज्य में किसी भी प्रकार के प्रयोग कर सकते हैं."

'बीजेपी लीडरशिप रबर स्टांप लगा रही है'
रूही तिवारी का मानना है कि बीजेपी लीडरशिप अपने पसंदीदा व्यक्ति को ही ज़िम्मेदारी दे रही है.
वह भजनलाल शर्मा, मोहन यादव, रेखा गुप्ता का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि इन लोगों ने ऐसा कोई काम अभी तक नहीं किया है, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी हो या अपने आप को साबित किया हो. बल्कि इनकी आलोचना हो रही है.
वह कहती हैं बीजेपी लीडिरशिप इन लोगों पर इसलिए दांव नहीं लगा रही है कि इन नेताओं में पोटेंशियल दिख रहा है या इन्हें ग्रूम करना चाहते हैं.
वह कहती हैं, "कहीं न कहीं ये रबर स्टांप लगा रहे हैं. नितिन नबीन के लिए ये कहना अभी ज़ल्दबाज़ी होगी, लेकिन अभी तक जो दिख रहा है वह रबर स्टांप ही दिख रहा है और वो जानते हैं कि वो रबर स्टैंप लगा रहे हैं."
बीजेपी तर्क देती है कि अगर नई पीढ़ी के नेताओं को वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में लाकर ग्रूम नहीं करेंगे तो अगली पीढ़ी के नेता कैसे तैयार होंगे, रणनीतिक तौर ये सही भी लगता है?
इस पर रूही तिवारी कहती हैं कि नई पीढ़ी को हमेशा तैयार करना चाहिए और हर पार्टी को ऐसा करना चाहिए. लेकिन क्या ये सच में नई पीढ़ी के नेता तैयार कर रहे हैं?
वह कहती हैं, "इन्होंने जो मुख्यमंत्री बनाए हैं, इनमें से कौन ऐसा लग रहा जो पार्टी को आगे ले जा सकता है या जो राज्य में अपनी पार्टी को बढ़ा सकता है. जहां तक राष्ट्रीय अध्यक्ष का सवाल है तो धर्मेंद्र प्रधान भी तो अगली पीढ़ी हैं, तो उन्हें क्यों नहीं ग्रूम किया जा रहा?.... नितिन नबीन को ही क्यों चुना गया? ऐसे कई नेता होंगे. इनसे भी ज़्यादा जानेमाने नेता होंगे."
"कहीं न कहीं इनकी अभी तक की पसंद देखकर लगता है कि ये ऐसे लोगों को लेना चाहते हैं जो इनके लिए ख़तरा न बनें. जो इनकी बात न टाले और जो इनके साथ मिलकर चले."
क्या पंकज चौधरी की नियुक्ति से योगी आदित्यनाथ असहज होंगे?

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उत्तर प्रदेश की अगर बात की जाए तो लोगों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ और पंकज चौधरी के बीच काम को लेकर अच्छे संबंध हैं लेकिन दोनों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए जद्दोजहद भी रही है, क्योंकि दोनों एक ही इलाक़े से आते हैं.
ऐसे में जब पंकज चौधरी की नियुक्ति होती है और वह कार्यकाल संभालते वक्त योगी आदित्यनाथ के पैर छूते हैं. तो ऐसे में क्या ये केंद्र की तरफ़ से उठाया गया ऐसा क़दम है जो योगी आदित्यनाथ को असहज कर सकता है या इसमें ये संदेश है कि 2027 में चुनाव है, सबको साथ-साथ चलना है?
इस सवाल पर संतोष सिंह कहते हैं कि बीजेपी इंटर्नल मैसेजिंग देने में माहिर है. एक बाहरी राजनीति चलती है और एक अंदरूनी.
वह कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ से किसे ख़तरा है ये बताने की ज़रूरत नहीं है. बिल्कुल वे राष्ट्रीय स्तर पर भविष्य के बहुत तेज़ी से उभरते हुए नेता हैं... पंकज चौधरी को लाकर एक मैसेज देने की कोशिश की है. लेकिन मुझे लगता है कि योगी आदित्यनाथ का स्टेचर उससे बहुत बड़ा है. मैं कहूंगा कि ये सिंबोलिज़्म और पोस्चरिंग की पॉलिटिक्स है."
वहीं, रूही तिवारी का मानना है कि बीजेपी हमेशा चुनाव की तैयारी में होती है. वह अगला चुनाव देखकर काम करती है, लेकिन उसे उत्तर प्रदेश के मामले में योगी आदित्यनाथ पर ध्यान देना होगा.
वह कहती हैं, "उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ बहुत लोकप्रिय हैं. मैं ये कहूंगी कि आज की तारीख़ में वो उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी से ज़्यादा लोकप्रिय हैं. और 2024 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह को जिस तरह का रिज़ल्ट मिला है, उससे थोड़ा झटका लगा होगा और ये भी समझ में आया होगा कि अगर योगी आदित्यनाथ चाहें तो वो टॉप लीडरशिप को डैमेज कर सकते हैं."
"इसलिए उन्हें और पंकज चौधरी को ध्यान से आगे बढ़ना होगा. उनको ये समझना पड़ेगा कि इस समय योगी आदित्यनाथ की बीजेपी के संगठन में, वोटर्स पर और ब्यूरोक्रेसी पर जो पकड़ है, वह बहुत मज़बूत है. उत्तर प्रदेश में आप उन्हें नाराज़ करके चुनाव नहीं जीत सकते. आपको उनके नाम पर ही लड़ना होगा."
रूही तिवारी कहती हैं कि अगर बीजेपी लीडरशिप सकारात्मक तौर पर पंकज चौधरी के नाम पर एक्सपेरिमेंट कर रही है तो सही है, लेकिन अगर वो योगी आदित्यनाथ को असहज करने की नियत से कर रही है तो बीजेपी उत्तर प्रदेश में पूरी ताक़त से चुनाव नहीं लड़ पाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

















