ईरान की ज़मीन पर ग्राउंड ऑपरेशन के लिए क्या अपने सैनिक उतारेंगे ट्रंप

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अमेरिका-इसराइल के ईरान के साथ युद्ध को आज चार दिन हो चुके हैं.
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि के बाद भी दोनों तरफ़ से हमले जारी हैं.
आगे इस युद्ध की तस्वीर क्या होगी, यह अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध से क्या हासिल करना चाहते हैं और इसे किस तरह ख़त्म करना चाहते हैं, इस पर उनके संकेत अब तक बदलते रहे हैं.
राष्ट्रपति ट्रंप और उनके प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों ने सार्वजनिक बयानों और साक्षात्कारों में अलग-अलग प्राथमिकताएँ और लक्ष्य सामने रखे हैं.
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विश्लेषकों का मानना है कि यह पिछले दो दशकों में मध्य पूर्व में अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य अभियानों में से एक है.
अमेरिका ने अब तक यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा है कि उसका अंतिम लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन है या नहीं.
हमले की शुरुआत में अमेरिकी प्रशासन ने मुख्य रूप से ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को निशाना बनाने की बात कही थी.
लेकिन हमले के बाद के घंटों और दिनों में राष्ट्रपति ट्रंप के बयान और संकेत बदलते रहे हैं. उन्होंने अपने सोशल मीडिया संदेशों और इंटरव्यू में कभी शासन परिवर्तन की संभावना की ओर इशारा किया, कभी सीमित सैन्य लक्ष्यों की बात की.
राष्ट्रपति ट्रंप ने नहीं ख़ारिज की संभावना

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सोमवार को दिए एक बयान में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि लंबी दूरी की मिसाइलों और परमाणु हथियारों की दिशा में बढ़ती ईरानी क्षमताएँ न सिर्फ़ मध्य पूर्व के लिए, बल्कि अमेरिकी लोगों के लिए भी ख़तरा हैं.
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान में ज़मीनी सैनिक भेजने की संभावना को भी पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया है.
अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “हर राष्ट्रपति कहता है कि ‘ईरान में ज़मीन पर सैनिक नहीं भेजे जाएंगे’, लेकिन मैं ऐसा नहीं कहता. मैं कहता हूँ, शायद हमें उनकी ज़रूरत न पड़े, या अगर आवश्यकता पड़ी तो उन्हें भेज भी सकते हैं.”
हालांकि, कई रक्षा विश्लेषक ईरान में बड़े पैमाने पर ज़मीनी हमले की संभावना को बहुत सीमित मानते हैं.
रक्षा विश्लेषक प्रवीण साहनी का कहना है, “मौजूदा परिस्थितियों में अमेरिकी सैनिकों का ईरान की ज़मीन पर उतरने की संभावना बेहद कम है. अभी यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका इस युद्ध से आख़िर चाहता क्या है. अमेरिका ने ईरान पर हमला तो कर दिया है, लेकिन ज़मीनी सेना उतारना उसके लिए न सैन्य रूप से आसान होगा और न ही राजनीतिक रूप से.”
ज़मीनी हमले की आशंका को ख़ारिज करते हुए रक्षा विश्लेषक प्रवीण साहनी दो मुख्य तर्क देते हैं, पहला, ईरान का विशाल भूभाग और जटिल भौगोलिक स्थिति, और दूसरा, हमले के बाद ईरान के भीतर दिख रही राष्ट्रीय एकजुटता.
अमेरिका और इसराइल ने अपनी सैन्य शक्ति का बड़ा हिस्सा लगाकर ईरान पर हमले शुरू किए हैं, और युद्ध के चौथे दिन भी राजधानी तेहरान और अन्य इलाक़ों पर तीव्र हवाई हमले जारी हैं.
फिर भी प्रवीण साहनी मानते हैं कि इस युद्ध में अमेरिका-इसराइल के लिए ईरान को निर्णायक हार देना आसान नहीं होगा.
इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के अनुभव

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अमेरिकी यूरोपीय कमान के पूर्व डिप्टी कमांडर जनरल चार्ल्स वॉल्ड का आकलन है कि ईरान में बड़े पैमाने पर ज़मीनी घुसपैठ की संभावना बेहद कम है.
27 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित एक लेख में उन्होंने साफ़ कहा था कि उन्हें नहीं लगता कि अमेरिका ईरान में ज़मीनी सेना भेजकर शासन परिवर्तन की कोशिश करेगा.
वॉल्ड का तर्क है कि अमेरिका के पास हवाई और नौसैनिक शक्ति में भारी बढ़त है, लेकिन इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के लंबे युद्धों के अनुभव के बाद अमेरिकी राजनीति में नए “बूट्स ऑन द ग्राउंड” यानी ज़मीनी आक्रमण को लेकर गहरी अनिच्छा है.
वॉल्ड के मुताबिक़, किसी भी प्रशासन के लिए, चाहे वह ट्रंप का ही क्यों न हो, मध्य पूर्व में एक और बड़े पैमाने पर ज़मीनी युद्ध में उतरना घरेलू राजनीति के लिहाज़ से बेहद जोखिम भरा क़दम साबित हो सकता है.
हेरिटेज फ़ाउंडेशन से जुड़े रणनीतिक विश्लेषक जेम्स जे काराफ़ानो ने ईरान पर पूर्ण आक्रमण की संभावना पर अपने पुराने विश्लेषण में चेतावनी दी थी कि यह विकल्प इराक़ 2003 से भी कहीं अधिक जटिल और कठिन हो सकता है.
2006 में प्रकाशित एक विश्लेषण में काराफ़ानो ने लिखा था कि “पूर्ण आक्रमण एक बेहद उलझा हुआ विकल्प होगा; अंततः ईरान की सेना को हराया जा सकता है, लेकिन अमेरिकी सेना पर भारी दबाव पड़ेगा और स्थिति एक अनिश्चित और बेहद महंगी सैन्य मौजूदगी में बदल सकती है.”
और जटिल ज़मीनी हालात

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रक्षा विश्लेषक प्रवीण साहनी का मानना है कि दो दशक बाद ईरान में अमेरिका के लिए ज़मीनी स्थिति और भी जटिल हो गई है.
उनके मुताबिक़, ईरान का भौगोलिक विस्तार, पर्वतीय इलाक़े, बड़ी आबादी और मज़बूत सैन्य ढांचा किसी भी बाहरी सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं.
अमेरिका ने साल 2003 में इराक़ पर हमला किया था, तब ब्रिटेन ने इस सैन्य अभियान का साथ दिया था, जबकि ईरान पर मौजूदा हमलों के बाद ब्रिटेन ने सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया है.
अमेरिकी ज़मीनी सेनाओं ने 2011 में इराक़ छोड़ा था; इस लंबे सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका के साढ़े चार हज़ार से अधिक सैनिक मारे गए और लगभग 32 हज़ार घायल हुए, जिसके असर आज भी अमेरिकी समाज और राजनीति में महसूस किए जाते हैं.
अभी ईरान को लेकर अमेरिका के दीर्घकालिक लक्ष्य को लेकर धुंध साफ़ नहीं हुई है.
कई विश्लेषक मानते हैं कि अगर लक्ष्य केवल “सर्जिकल स्ट्राइक” से आगे बढ़कर शासन परिवर्तन और क़ब्ज़े तक चला जाता है, तो अमेरिका को रक्षा ख़र्च में दीर्घकालिक और भारी वृद्धि झेलनी पड़ेगी.
प्रवीण साहनी कहते हैं कि अमेरिका के लिए यह युद्ध बेहद ख़र्चीला साबित हो सकता है और अंततः ईरान को निर्णायक रूप से हराना उसके लिए बेहद कठिन होगा.
अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमले से कुछ दिन पहले ही, अटलांटिक काउंसिल से जुड़े और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में ईरान मामलों के पूर्व निदेशक रह चुके नेट स्वानसन ने एक लेख में चेतावनी दी थी कि ईरान पर सीमित हवाई हमले भी धीरे-धीरे ज़मीनी प्रतिबद्धता में बदल सकते हैं.
स्वानसन ने लिखा था कि यह अविश्वसनीय लग सकता है कि ट्रंप, जो “कई युद्धों” को समाप्त करने का दावा करते रहे हैं, ईरान में ज़मीनी सैनिक भेजें या शासन परिवर्तन के लिए आगे बढ़ें, लेकिन मौजूदा हालात उन्हें उस दिशा में धकेल सकते हैं.
स्वानसन के मुताबिक़, अगर लक्ष्य सिर्फ़ सैन्य ठिकानों को नुक़सान पहुँचाने से आगे बढ़कर “पूर्ण शासन परिवर्तन” बन जाता है, तो ईरान की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय अस्थिरता अमेरिका को एक लंबे और थकाऊ संघर्ष में फँसा सकती है.

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अमेरिका-इसराइल के हमलों के बाद ईरान ने भी आक्रामक प्रतिक्रिया दी है; उसने मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमलों के साथ-साथ क़तर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इसराइल की ओर भी मिसाइलें दागी हैं, जिनके दावों की स्वतंत्र पुष्टि अब भी प्रक्रिया में है.
स्वानसन का कहना है कि ईरान की सैन्य संरचना भले कमज़ोर पड़ी हो, लेकिन वह पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुई है, और ज़मीनी युद्ध की स्थिति में व्यापक प्रतिरोध और विद्रोह की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
प्रवीण साहनी का आकलन है कि ईरान में सर्वोच्च नेता की मौत के बाद राष्ट्रीय एकजुटता की स्पष्ट तस्वीर उभर रही है.
उनके मुताबिक़, अगर अमेरिका इस माहौल में ज़मीनी सेना भेजने का फ़ैसला करता है, तो यह उसके लिए सैन्य और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बेहद घातक साबित हो सकता है.
साहनी यह भी याद दिलाते हैं कि लेबनान का शिया लड़ाका संगठन हिज़्बुल्लाह भले हाल के वर्षों में दबाव में रहा हो, लेकिन वह तस्वीर से पूरी तरह बाहर नहीं है और दूसरे मोर्चे के रूप में सक्रिय होने की क्षमता अभी भी रखता है.
हिज़्बुल्लाह ने इसराइल पर रॉकेट दागे हैं, जिसके बाद इसराइल ने लेबनान की राजधानी बेरूत और अन्य क्षेत्रों पर भी बमबारी की है और हिज़्बुल्लाह के कई कमांडरों को निशाना बनाने का दावा किया है.
ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया

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कई विश्लेषक यह तर्क दे रहे हैं कि जिस तरह अमेरिकी लक्ष्यों का विश्लेषण ज़ोरों पर है, उतनी ही गंभीरता से यह समझने की ज़रूरत है कि ईरान के रणनीतिक लक्ष्य क्या हो सकते हैं.
प्रवीण साहनी कहते हैं, “ईरान ने जिस तरह की आक्रामक प्रतिक्रिया दी है, उससे यह संकेत मिलता है कि उसका लक्ष्य केवल अपने अस्तित्व की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि मध्य पूर्व से अमेरिकी सैन्य अड्डों को पीछे धकेलना भी हो सकता है.”
यह भले ही एक बड़ा निष्कर्ष हो, लेकिन इसका एक अर्थ यह भी है कि अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच युद्ध अब सिर्फ़ द्विपक्षीय संघर्ष नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय पुनर्संतुलन की दिशा में भी बढ़ता दिख रहा है.
हालाँकि, आगे बढ़ते इस युद्ध के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि राष्ट्रपति ट्रंप आख़िरकार अपने लक्ष्य किस स्तर पर निर्धारित करते हैं, आगे की अमेरिकी रणनीति बहुत हद तक इन्हीं लक्ष्यों पर निर्भर करेगी.
जहाँ तक ज़मीनी हमले का सवाल है, सैन्य इतिहास में सिर्फ़ हवाई हमलों के ज़रिए किसी मज़बूत और बड़े देश में सत्ता परिवर्तन या निर्णायक जीत के उदाहरण बहुत सीमित रहे हैं.
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने साल 2003 में इराक़ पर तीव्र हवाई हमले किए थे; इराक़ की सेना को भारी नुक़सान पहुँचने के बावजूद, आख़िरकार अमेरिका को ज़मीनी सेना भेजनी पड़ी थी और अगले सात साल तक उसे इराक़ में ज़मीनी संघर्ष झेलना पड़ा था.
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