ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कितने ताक़तवर, सेना से कैसे हैं अलग?

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- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
अमेरिका और इसराइल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के साथ ही देश की इलीट सेना रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) के प्रमुख जनरल मोहम्मद पाकपोर और कुछ सीनियर कमांडरों के मारे जाने की भी पुष्टि हुई है.
हमलों में ईरानी सेना के चीफ़ ऑफ स्टाफ़ अब्दुल रहीम मौसवी और रक्षा मंत्री मेजर जनरल अज़ीज नासिरज़ादेह भी मारे गए हैं.
शनिवार को अमेरिका और इसराइल ने ईरान के कई शहरों पर हमले किए थे और रविवार तड़के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ख़ामेनेई की मौत को लेकर दावा किया था.
इसके बाद ईरान के सरकारी मीडिया ने ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि की थी.
ताज़ा घटनाक्रम के बाद एक बार फिर आईआरजीसी और ईरान की व्यवस्था में इसकी भूमिका को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है.
आईआरजीसी ईरान के लिए धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर लड़ने वाली सेना है. ये घरेलू संकट के साथ विदेशी खतरों की स्थिति में इस्लामिक राष्ट्र के हितों की रक्षा करती है.
'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर' है क्या?

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इस आर्म्ड ग्रुप की स्थापना 1979 में ईरानी क्रांति की सफ़लता के बाद की गई थी. मक़सद था देश में इस्लामी तंत्र की रक्षा करना. मूल रूप से ये ईरान की नियमित सेना के विकल्प के तौर पर काम करता है.
अमेरिकी थिंकटैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस आईआरजीसी के बारे में लिखता है, "देश की ताक़त के प्रदर्शन, आंतरिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में इसकी केंद्रीय भूमिका है. 1979 की क्रांति के बाद ईरान के धर्मगुरु नेतृत्व ने पारंपरिक सशस्त्र बलों पर अविश्वास जताते हुए उनके समानांतर और संतुलन के रूप में आईआरजीसी की स्थापना की थी. आज यह सीधे सर्वोच्च नेता को रिपोर्ट करता है और समय के साथ इसका आकार और अधिकार दोनों काफ़ी बढ़ चुके हैं. इसके गठन के पीछे मक़सद था कि आईआरजीसी नए शासन को किसी भी तख़्तापलट से बचाए."
लंदन के 'चैटम हाउस इंटरनेशनल अफ़ेयर्स थिंक टैंक' से जुड़ी डॉ. सनम विकल के मुताबिक, "शुरुआत में ये एक छोटा सैन्य समूह था, लेकिन आज ये बहुत बड़े संगठन का रूप ले चुका है."
ईरान की इस स्पेशल फ़ोर्स के पास अपनी ज़मीन है, अपनी नौसेना और एयरफ़ोर्स भी है. इन सबको मिलाकर एक लाख 90 हजार लोगों के इस संगठन से जुड़े होने का अनुमान है.
ये फ़ोर्स ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम भी संचालित करती है.
आईआरजीसी ने अपना बड़ा कारोबारी साम्राज्य भी खड़ा किया है, जिसमें डिफ़ेंस, इंजीनियरिंग, कंस्ट्रक्शन क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं. माना जाता है कि ईरान की अर्थव्यस्था में इनकी हिस्सेदारी एक तिहाई के क़रीब है.
मध्य पूर्व मामलों की जानकार शुभदा चौधरी कहती हैं, "सरल शब्दों में समझें कि भारत की सेना है, नेवी है, एयरफ़ोर्स है. ठीक ऐसे ही ईरान की रेग्युलर आर्मी है, जिसे अर्तेश कहते हैं. मगर ईरान में जब 1979 में क्रांति हुई थी उसके बाद आईआरजीसी को बनाया गया. ये एक पैरामिलिट्री विंग है, जिसके अंदर आर्मी, नेवी, एयरफ़ोर्स, न्यूक्लियर वॉरफ़ेयर...ये सब आईआरजीसी के अंतर्गत आता है. ईरान के घरेलू मामलों में इसका बड़ा नियंत्रण है. और विदेशों जो इसकी शाखाएं हैं, उसे कुद्स फ़ोर्स कहते हैं. और जो इसका मिलिशिया है उसे कहते हैं बैसिज मिलिशिया."

ईरान में आईआरजीसी क्या करता रहा है?
आईआरजीसी का एक पैरा मिलिट्री विंग है बैसिज रेसिस्टेंस फोर्स (BRF). इस विंग के ज़रिए आईजीआरसी पूरे ईरान में आंतरिक सुरक्षा संभालता है. यही विंग ईरान में विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती करने में सबसे आगे रहा है.
ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर मरियम अलेम्ज़ादेह के मुताबिक़, "बैसिज ने 2023 में प्रदर्शकारियों पर आंख मूंद कर हिंसक कार्रवाई की. इसने कई लोगों को पीट-पीट कर मार डाला. इससे सरकार का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा, बल्कि बैसिज की हिंसा के बाद विरोध प्रदर्शन और तेज़ हुए"
काउंसिल फॉर फॉरेन रिलेशंस ने इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ के हवाले से बताया है कि आईआरजीसी के पास ईरान के 31 प्रांतों में कुल डेढ़ लाख से अधिक सैनिक हैं. वहीं बैसिज अर्धसैनिक बल भी ये दावा करता है कि वह करीब छह लाख वॉलंटीयर्स को इकट्ठा करने की क्षमता रखता है. ईरान की नियमित नौसेना से इतर आईआरजीसी के पास करीब 20 हज़ार सेलर्स हैं जो स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ समेत ईरान की समुद्री सीमाओं पर तैनात हैं. और इसकी वायुसेना में भी 15 हज़ार सैन्यकर्मी हैं.
आईआरजीसी ईरान की राष्ट्रीय राजनीति में भी बेहद प्रभावशाली है. इसके कई पूर्व अधिकारी सरकार में ऊँचे पदों तक पहुंचे हैं, जिनमें मंत्रिमंडल, संसद और प्रांतीय प्रशासन शामिल हैं.

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विदेशों में क्या करता है आईआरजीसी?
ईरान की इस स्पेशल फ़ोर्स की सबसे चर्चित शाखा है 'क़ुद्स फ़ोर्स'.
ये मध्य पूर्व में सक्रिय लेबनान के हिज़बुल्लाह जैसे हथियारबंद समूहों, इराक़ के शिया मिलिशिया और सीरिया सरकार के लिए लड़ने वाले लड़ाकों की ट्रेनिंग के साथ पैसे और हथियार मुहैया कराता है.
प्रोफ़ेसर अलेम्ज़ादेह कहती हैं, "क़ुद्स फ़ोर्स उन जगहों पर तमाम आर्म्ड ग्रुप्स के बीच दोस्ताना संबंध मज़बूत करने की कोशिश करता है, जहां शक्ति संतुलन ईरान के पक्ष में बनाया जा सकता है."
वही डॉ. विकल बताती हैं, "ईरान की सरकार अमेरिका को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती हैं और ऐसे सभी ग्रुप्स का समर्थन करती हैं जो दूसरे देशों में अमेरिका पर हमला करें."
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















