ख़ामेनेई की मौत और जंग: क्या ऐसे वक़्त की तैयारी ईरान पहले से कर रहा था?

ख़ामेनेई

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इमेज कैप्शन, अमेरिका और इसराइल के हमले में ख़ामेनेई मारे गए हैं
    • Author, लिस डूसेट
    • पदनाम, चीफ़ इंटरनेशनल कॉरेस्पॉन्डेंट, बीबीसी
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

यह इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के लिए एक निर्णायक पल है.

शनिवार सुबह, जब यह साफ़ हो गया था कि पहले दौर के हमलों में सुप्रीम लीडर के आवास को निशाना बनाया गया है, तब ही से उनकी हालत को लेकर तरह-तरह की ख़बरें चल रही थीं.

सैटेलाइट तस्वीरों में उनके परिसर को हुआ भारी नुक़सान दिख रहा था.

ईरान की पहली प्रतिक्रिया यह थी कि उन्हें किसी सुरक्षित जगह ले जाया गया है. फिर ख़बर आई कि 86 वर्षीय धर्मगुरु सरकारी टीवी पर बोलने वाले हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

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युद्ध के अगले दिन की सुबह ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत पर शोक जताने वाले कार्यक्रम दिखने लगे

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शाम होते-होते, इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने एक टीवी संबोधन में घोषणा की कि 'कई संकेत हैं' कि सुप्रीम लीडर 'अब नहीं रहे.'

इसराइली और अमेरिकी मीडिया में आई कई रिपोर्टों में, अनाम अधिकारियों के हवाले से यह कहा गया कि उनके मरने के पुख़्ता सबूत मौजूद हैं.

उधर, ईरानी अधिकारी लगातार इसे नकारते रहे.

लेकिन फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर उनके मारे जाने की घोषणा की.

इसके कुछ घंटों बाद ईरान के सरकारी टीवी के एक प्रज़ेंटर ने रोते हुए ख़ामेनेई की मौत की घोषणा की, और कहा कि वो 'शहादत का मीठा, पवित्र घूंट पी गए'.

'हर तरह की स्थिति के लिए तैयार रहने के निर्देश थे'

लंदन में ईरान दूतावास के बाहर जश्न मनाते लोकतंत्र समर्थक ईरानी

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चालीस दिनों के शोक की घोषणा की गई और जैसे ही युद्ध के अगले दिन की सुबह हुई, उनकी मौत पर शोक जताने वाले सरकार-समर्थित कार्यक्रम दिखने लगे.

लेकिन इसी दौरान, रात भर में कई शहरों से जश्न के वीडियो भी तेज़ी से सामने आए और कई देशों में बसे ईरानी समुदाय में भी उनके कट्टरपंथी शासन के अंत को लेकर ख़ुशी और उम्मीद दिखाई दी कि शायद यह इस्लामिक शासन के अंत की शुरुआत हो.

ये इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के उथल-पुथल भरे इतिहास के बेहद अहम पल हैं, लेकिन इसके सबसे ताक़तवर धर्मगुरु और कमांडर इसकी तैयारी पहले से कर रहे थे.

पिछले साल जून में हुए 12 दिन के युद्ध के दौरान हर किसी का ध्यान पूरी तरह उसी पर केंद्रित था. सिर्फ़ पहली ही रात, पहले दौर के हमलों में, इसराइल नौ परमाणु वैज्ञानिकों और कई सुरक्षा प्रमुखों की हत्या करने में कामयाब रहा था.

और अगले कुछ दिनों में, कई और वरिष्ठ वैज्ञानिकों और कम से कम 30 शीर्ष कमांडरों को मार दिया गया.

यह भी साफ़ कर दिया गया था कि आयतुल्लाह भी उनके निशाने पर हो सकते हैं.

तब यह ख़बर आई थी कि ख़ामेनेई, जिन्होंने पूरा युद्ध का समय अपने ख़ास बंकर में बिताया था, सुरक्षा अधिकारियों की ऐसी सूचियां तैयार कर रहे थे जो तुरंत उनकी जगह ले सकें ताकि ऊपरी स्तर पर कोई ख़ालीपन न पैदा हो.

और पिछले साल की लड़ाई से भी पहले, यह रिपोर्ट आई थी कि ख़ामेनेई ने असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स- लगभग 88 वरिष्ठ धर्मगुरुओं की वह संस्था जो सुप्रीम लीडर की नियुक्ति करती है- को हर तरह की स्थिति के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया था.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा था कि उनकी हत्या की स्थिति में उन्होंने 'तीन वरिष्ठ धर्मगुरुओं' को संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर चुना था.

कई सालों से इस बात पर अटकलें लगती रही हैं कि उनकी जगह कौन ले सकता है, जिनमें उनके बेटे मोजतबा भी शामिल हैं.

नेतृत्व में बदलाव से क्या बदलेगी व्यवस्था भी?

खामेनेई ने सख्ती से शासन किया. सुधार की मांगों और विरोध प्रदर्शनों की बार-बार उठने वाली लहरों को वह दबाते रहे

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पहले दिन की हवाई बमबारी और निशाने लगाकर किए गए हमलों में अकेले सुप्रीम लीडर ही नहीं मारे गए. जो लोग अब भी अपने पद पर हैं, या जिन्हें मजबूरन ऊंचे पदों की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ी है, वे दुनिया को यह संदेश देना चाहेंगे कि अब भी नियंत्रण पूरी तरह उनके हाथों में हैं और उत्तराधिकार की प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के चलेगी.

लेकिन आयतुल्लाह के 36 साल लंबे शासन का अंत उनके समर्थकों, ख़ासकर उनके क़रीबी सहायकों और उन सहयोगियों के लिए बड़ा झटका होगा, जो एलीट इस्लामिक रिवोल्युशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) में थे और जिनका काम उन्हें और इस्लामिक क्रांति को देश और बाहर दोनों जगह बचाना था.

लेकिन बीबीसी ने ऐसे वीडियो की पुष्टि की है जिनमें तेहरान और करज की सड़कों पर लोग उनकी मौत की ख़बरों का जश्न मनाते दिख रहे हैं.

पश्चिम, ख़ासकर अमेरिका को लेकर गहरी शंका रखने वाले और इसराइल के कट्टर विरोधी खामेनेई ने सख़्ती से शासन किया. सुधार की मांगों और विरोध प्रदर्शनों की बार-बार उठने वाली लहरों को वह दबाते रहे.

इसराइल और अमेरिका के साथ सीधे सैन्य टकराव और अपने ही लोगों की बदलाव की बढ़ती मांगों की वजह से पिछले कुछ साल उनके लिए सबसे ज़्यादा चुनौतियों वाला समय रहे.

इस महीने की शुरुआत में जब हम तेहरान में थे, तो ईरान एक बदला हुआ देश महसूस हो रहा था. देश के इतिहास में सुरक्षाबलों के किए सबसे बर्बर दमन, जिनमें हज़ारों ईरानियों की मौत हुई थी, उनका दर्द और गुस्सा तब ताज़ा था.

ख़ामेनेई के नेतृत्व के अचानक अंत के साथ ही अब सवाल उनके उत्तराधिकारी पर उठेंगे और इसे लेकर भी कि नेतृत्व में बदलाव क्या 47 साल पुरानी इस्लामिक रिपब्लिक की दिशा में भी कोई बदलाव लाएगा.

उभरकर सामने चाहे जो भी आए, उसका सबसे बड़ा लक्ष्य वही रहेगा- ऐसी व्यवस्था को बनाए रखना जो धर्मगुरुओं और उनकी ताक़तवर सुरक्षा संस्थाओं को सत्ता में बनाए रखे.

एक ऐसा युद्ध, जिसके ख़त्म होने की गुंज़ाइश अभी नज़र नहीं आ रही, वह अनिश्चित और ख़तरनाक तरीक़ों से आगे बढ़ रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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