नेपाली कांग्रेस के पीएम चेहरे गगन थापा के लिए कड़ी चुनौती बने जेएनयू में पढ़े अमरेश सिंह- ग्राउंड रिपोर्ट

नेपाल चुनाव
इमेज कैप्शन, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गगन थापा के लिए सरलाही-4 सीट पर जीत आसान नहीं है
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सरलाही नेपाल से
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और पार्टी के लिए प्रधानमंत्री के चेहरे गगन थापा सरलाही-4 संसदीय क्षेत्र के सुदामा गाँव में एक जनसभा को संबोधित करने पहुँचे हैं.

गाँव के लोग गगन थापा के आने की सूचना हिन्दी और मैथिली में दे रहे हैं.

बिहार के सीतामढ़ी से चंद किलोमीटर की दूरी पर यह गाँव है. यहाँ के लोगों की मातृभाषा मैथिली है. लेकिन गगन थापा गाँव के लोगों को नेपाली भाषा में संबोधित करते हैं.

थापा पहाड़ी हैं और पहली बार सरलाही-4 से चुनाव लड़ रहे हैं. इससे पहले वह काठमांडू-4 से चुनाव लड़ते थे.

गगन थापा जब जनसभा को संबोधित करके जाने लगे, तो उनसे मैंने पूछा कि यहाँ के लोगों की पहली भाषा मैथिली और हिन्दी है, लेकिन आपने नेपाली में क्यों संबोधित किया?

गगन थापा ने जवाब में कहा, ''मैं मैथिली और हिन्दी समझता हूँ. बोलता भी हूँ. लेकिन अभी सीख रहा हूँ. यहाँ के लोगों से मैं इनकी भाषा में भी बात करता हूँ लेकिन भाषण में ज़्यादा सहज नेपाली में रहता हूँ.''

नेपाल के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल गगन थापा की इन बातों से सहमत नहीं हैं.

सीके लाल कहते हैं, ''माधव कुमार नेपाल पहाड़ी हैं और मधेश से ही जीतते हैं. वह हिन्दी के साथ मैथिली में भाषण देते हैं. बीपी कोइराला से गिरिजा प्रसाद कोइराला तक मधेश में हिन्दी में भाषण देते थे. लेकिन गगन थापा को नेपाली राष्ट्रवाद भी चाहिए और मधेश में जीत भी. यहाँ भाषा में सहज होने से ज़्यादा नेपाली भाषा के प्रति विशेष आग्रह का मामला है.''

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इमेज कैप्शन, जेएनयू से पीएचडी किए अमरेश सिंह सरलाही-4 सीट से लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे हैं

मधेश में बालेन शाह की लोकप्रियता

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बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अमरेश सिंह गगन थापा को यहाँ से चुनौती दे रहे हैं.

अमरेश सिंह सरलाही-4 से लगातार तीन बार जीत चुके हैं. दो बार नेपाली कांग्रेस से और 2022 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नेपाली कांग्रेस को मात दी थी.

अमरेश सिंह ने दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है और वह इस पहचान को अपने इलाक़े में गर्व के साथ बताते हैं.

नेपाल के चुनाव में मधेशी बनाम पहाड़ी का मुद्दा अहम रहा है, लेकिन इस बार कई चीज़ें ऐसी हो रही हैं, जिनसे लगता है कि इस मुद्दे की लकीर धुंधली पड़ रही है.

बालेन शाह मधेशी मूल के हैं और वह झापा-5 से चुनाव लड़ रहे हैं, जहाँ पहाड़ी मतदाता हैं.

दूसरी तरफ़ गगन थापा पहाड़ी हैं और मधेश के इलाक़े से चुनाव लड़ रहे हैं. दोनों अहम पार्टियों के प्रधानमंत्री के चेहरा हैं.

मधेश में एक बड़े तबके को लग रहा है कि बालेन शाह नेपाल में पहाड़ियों के प्रधानमंत्री बनने का सिलसिला तोड़ने जा रहे हैं.

सरलाही-4 में सिसौटिया गाँव के 60 साल के रघुनाथ शाह कहते हैं, ''ये हमारे समाज का लड़का है. हमने अपने परदादा से लेकर अब तक उन लोगों को देखा है, जिन्होंने हमारे सीने पर चढ़कर राज किया है. अब बालेन शाह इसे बदलने वाले हैं. हम जी जान से उनके साथ हैं.''

नेपाली कांग्रेस की सेंट्रल कमिटी की मेंबर नगीना यादव को लगता है कि इस बार के चुनाव में मधेश बनाम पहाड़ की लकीर धुंधली ज़रूर हुई है, लेकिन जाति के नाम पर लामबंदी बढ़ती दिख रही है.

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इमेज कैप्शन, सरलाही-4 के मतदाता रघुनाथ शाह को लग रहा है कि बालेन शाह उनके समाज से हैं और वही पहाड़ियों के दबदबे को चुनौती देंगे

जातीय गोलबंदी

नगीना यादव कहती हैं, ''मधेश में तेली जाति से ताल्लुक़ रखने वाले लोग बालेन शाह के साथ लामबंद होते दिख रहे हैं. दलितों और मध्यवर्गीय जातियों में भी बालेन को लेकर आकर्षण है. यहाँ के जो अपर कास्ट हैं, उनका रुझान कांग्रेस के साथ है लेकिन उनकी तादाद बहुत कम है. इस इलाक़े में सबसे ज़्यादा यादव मतदाता हैं.''

बालेन शाह की स्वीकार्यता पहाड़ और मधेश दोनों में दिख रही है और यह गगन थापा के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है. गगन थापा से हमने पूछा कि बालेन शाह ने वाक़ई मधेश और पहाड़ के भेद को मिटा दिया है?

इस सवाल के जवाब में थापा कहते हैं, ''इस भेद को मैं मिटा रहा हूँ. इसे मैंने चुनौती के तौर पर लिया है. मैं किसी और सीट से भी जीत सकता था लेकिन मधेश से चुनाव लड़ रहा हूँ.''

नेपाली भाषा के प्रमुख अख़बार कांतीपुर के वरिष्ठ पत्रकार राजेश मिश्र मानते हैं कि बालेन को लेकर जितना आकर्षण पहाड़ों में है, उतना ही मधेश में भी है और इसका फ़ायदा सरलाही-4 में अमरेश सिंह को मिलेगा.

राजेश मिश्र कहते हैं, ''2014 में जिस तरह से भारत में कांग्रेस के ख़िलाफ़ और नरेंद्र मोदी के पक्ष में लहर थी, कुछ वैसी ही लहर नेपाल के इस चुनाव में बालेन शाह की है. तुलना में एक अहम कमी है कि बीजेपी के पास मज़बूत संगठन भी था, लेकिन बालेन की पार्टी बिल्कुल नई है और संगठन न के बराबर है. नेपाल का यह पहला चुनाव है, जो व्यक्ति केंद्रित हो गया है.''

राजेश मिश्र कहते हैं, ''सरलाही-4 में न तो गगन के लिए आसान लड़ाई है और न ही अमरेश सिंह के लिए. अगर अमरेश सिंह आरएसपी से ना होते तो वह रेस से बाहर रहते लेकिन बालेन की लोकप्रियता का उन्हें भरपूर फ़ायदा होता दिख रहा है. गगन थापा प्रधानमंत्री का चेहरा हैं, इसका फ़ायदा उन्हें सरलाही-4 में मिलेगा. क्योंकि यहाँ के लोगों को लग रहा है कि उनका सांसद प्रधानमंत्री बन सकता है.''

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इमेज कैप्शन, सरलाही चार की मतदाता सुशीला चौधरी कहती हैं कि उनके बच्चों को बालेन पसंद हैं, इसलिए वह भी बालेन को ही वोट करेंगी

मधेशी बनाम पहाड़ी

सरलाही-4 के अलग-अलग इलाक़ों में बालेन शाह के प्रति युवाओं का ज़्यादा आकर्षण दिखता है.

ये युवा अपने माता-पिता की सोच को भी प्रभावित कर रहे हैं.

सरलाही-4 के सिसौटियां गाँव में धानुक जाति की आबादी अच्छी-ख़ासी है. इसी गाँव की सुशीला चौधरी कहती हैं कि उनके बच्चों की पसंद बालेन शाह हैं, इसलिए वह भी इसी पसंद के आधार पर वोट करेंगी.

बालेन शाह ने वाक़ई मधेशियों और पहाड़ियों के बीच के भेद को मिटा दिया है?

सीके लाल ऐसा बिल्कुल नहीं मानते हैं.

वह कहते हैं, ''बालेन शाह का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि मधेश को जीता जा सके. मधेशी पार्टियाँ इस बार ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर होंगी. बालेन को अभी इसका अहसास नहीं है लेकिन बाद में होगा.''

''आरएसपी के अध्यक्ष रवि लामीछाने और इसी पार्टी के प्रधानमंत्री के चेहरा बालेन शाह कब तक साथ रहेंगे, इस पर मुझे शंका है. बालेन और रवि दोनों बहुत ही महत्वाकांक्षी हैं. चुनाव जीतने के लिए दोनों एक दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं. जिसका मक़सद ही इस्तेमाल करना हो, वे लंबे समय तक साथ नहीं रह सकते हैं.''

हालाँकि अमरेश सिंह ऐसा नहीं मानते हैं.

वह कहते हैं, ''नेपाली कांग्रेस ने मधेशियों को इस्तेमाल हमेशा से किया है. सरलाही में चार संसदीय क्षेत्र हैं और यहाँ नेपाली कांग्रेस ने तीन सीट पर पहाड़ियों को उतारा है. जहाँ तक रवि और बालेन के साथ का सवाल है तो दोनों के बीच बहुत ही अच्छी समझ है.''

सरलाही-4 में जाति के अधार पर भी वोटों की लामबंदी होती दिख रही है.

गगन थापा की एक मार्च को जिस सुदामा गाँव में जनसभा थी, वो राजपूत बहुल गाँव है.

गगन थापा ख़ुद छेत्री हैं. गाँव के ज़्यादा राजपूतों का रुझान थापा के साथ दिख रहा था जबकि यहाँ कई दलितों का रुझान बालेन शाह की ओर दिख रहा था.

अमरेश सिंह भूमिहार हैं. इनकी जाति के लोगों की संख्या बहुत कम है लेकिन दलित और पिछड़ी जातियां ही उनकी ताक़त हैं.

अमरेश सिंह एक मार्च को सिसौटियां गाँव में कैंपेन के लिए पहुँचे हैं.

गाँव में आते ही वह गोपी मंडल के घर पर पहुँचे. गोपी मंडल धानुक जाति से हैं. अमरेश सिंह ने मंडल के घर पर ही खाना खाया और एक घंटे तक आराम किया. इसके बाद वह चुनाव प्रचार के लिए निकले.

मधेश
इमेज कैप्शन, नेपाल के मधेश इलाक़े में ग़रीबी ज़्यादा है और विकास की पहुँच अब भी अपर्याप्त है

अमरेश सिंह की जेएनयू पहचान

अमरेश सिंह कहते हैं, ''मेरी परवरिश जेएनयू की है. जेएनयू ने मुझे सिखाया है कि ग़रीबों का साथ कभी छोड़ना नहीं है. हमारे पीछे जो लामबंद हैं, वे सारे ग़रीब ही हैं. गगन थापा के पीछे जो लोग हैं, उन्हें देख लीजिए तो आपको फ़र्क साफ़ पता चल जाएगा.''

अमरेश सिंह भी मानते हैं कि नेपाल का यह चुनाव व्यक्ति केंद्रित हो गया है और केंद्र में बालेन शाह हैं.

क्या व्यक्ति केंद्रित चुनाव लोकतंत्र के लिए अच्छा है? इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं, ''भारत में अभी इसी का ज़ोर है लेकिन नेपाल भी अब आज़माने जा रहा है. नेपाल का लोकतंत्र अब पुराने खाँचे से बाहर निकल रहा है.''

सुदामा गाँव में जहाँ गगन थापा की जनसभा थी, वह उसी गाँव के राजपूत जमींदार परिवार का घर का कैंपस था.

इस घर के बुज़ुर्गों की तस्वीरें राजा बीरेंद्र के साथ लगी थी. यह परिवार ख़ुद को राजावादी बताता है.

इस घर के बगल में ही एक मल्लाह परिवार की छोटी सी दुकान है. दुकान एक महिला चला रही हैं.

उनसे पूछा कि इस बार के चुनाव में क्या होता दिख रहा है? इसके जवाब में वह कहती हैं, ''प्रत्यक्ष में गगन थापा को वोट दूँगी और समानुपाती में घंटी छाप को."

घंटी आरएसपी का चुनाव चिह्न है.

दरअसल नेपाल में मतदान के वक़्त मतदाताओं को दो मतपत्र मिलते हैं.

एक मतपत्र के ज़रिए उम्मीदवार को चुनना होता है और दूसरे मतपत्र के ज़रिए पार्टी को.

मिसाल के तौर पर सरलाही-4 को लें. एक मतपत्र के ज़रिए यहाँ के लोग गगन थापा, अमरेश सिंह और बाक़ी उम्मीदवारों को वोट करेंगे और दूसरे मतपत्र के ज़रिए पार्टी को चुनेंगे.

उम्मीदवारों में जिसका ज़्यादा वोट आएगा, वो जीत हासिल करेगा.

लेकिन दूसरे मतपत्र में एक पार्टी को वोट दिया जाता है. मान लीजिए कि किसी पार्टी को पूरे नेपाल में सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं, ऐसे में उसी आधार पर उन्हें और सांसद मिलेंगे.

नेपाल में प्रत्यक्ष रूप से 165 सांसद चुने जाते हैं और समानुपाती रूप से 110. कुल 275 सीटें हैं और जिनके पास 50 फ़ीसदी सांसद होंगे, वही पार्टी सरकार बनाएगी.

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इमेज कैप्शन, सरलाही-4 सीट पर एक जातीय समूह के रूप में यादवों का वोट सबसे ज़्यादा है

गगन थापा की मुश्किलें

गगन थापा ने उस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया, जहाँ 2022 में कांग्रेस हार गई थी.

सोलुखुम्बु में जन्मे और काठमांडू में पले-बढ़े गगन थापा का उस क्षेत्र को चुनना, जिसे अक्सर 'कोर मधेश' कहा जाता है, राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जा रहा है.

इस निर्वाचन क्षेत्र से पहाड़ी मूल का कोई उम्मीदवार पहले कभी प्रमुख दावेदार के रूप में उभर कर सामने नहीं आया है.

2022 के चुनाव में कांग्रेस सरलाही की चारों सीटों में से किसी पर भी जीत दर्ज नहीं कर सकी थी.

अमरेश ने सरलाही-4 सीट 20,017 वोट पाकर जीत हासिल की थी जबकि कांग्रेस उम्मीदवार नागेंद्र कुमार को 18,253 वोट मिले थे.

2017 में भी मुक़ाबला कड़ा रहा था. अमरेश ने 29,675 वोट हासिल किए थे जबकि राष्ट्रीय जनता पार्टी के उम्मीदवार राकेश कुमार मिश्रा को 28,136 वोट मिले थे.

अमरेश सिंह 2006 के जनआंदोलन के बाद प्रमुखता से उभरे. अमरेश सिंह ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि बीपी कोइराला और गिरिजा प्रसाद कोइराला से प्रेरित होकर वह राजनीति में आए. उस समय वह भारत की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे थे.

सरलाही-4 इलाक़े के वरिष्ठ नेता महेंद्र ठाकुर का भी राजनीतिक क्षेत्र रहा है.

उन्होंने 1991, 1994 और 1999 के चुनाव तब के सरलाही-5 से जीते थे.

2008 तक आते-आते उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तराई-मधेश डेमोक्रेटिक पार्टी बना ली थी.

निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्गठन के बाद उन्होंने सरलाही-6 से चुनाव लड़ा और हार गए. इसके बाद उन्होंने अपना राजनीतिक आधार मोहतरी की ओर स्थानांतरित कर लिया.

2008 का चुनाव विशेष रूप से हिंसक रहा था. इस चुनाव में अमरेश सिंह को शिवपूजन यादव ने हरा दिया था. मतदान के दौरान बूथ पर कब्ज़ा की कोशिशें और विस्फोट की घटनाएँ भी हुई थीं.

गढ़ैया मतदान केंद्र के बाहर हुए एक विस्फोट में अमरेश के चचेरे भाई शंभु सिंह की मौत हो गई थी.

अमरेश सिंह को अगर इस इलाक़े में किस जातीय समुदाय से चुनौती मिलती है तो वे यादव हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.