अली ख़ामेनेई की मौत का दुनिया के मुस्लिम देशों पर क्या असर पड़ सकता है?

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- Author, रौहान अहमद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अमेरिका और इसराइल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की ओर से जारी किए गए एक संदेश में कहा गया कि इस 'भयानक अपराध' का जवाब दिया जाएगा.
"हम अपनी पूरी ताक़त और पुख़्ता इरादे के साथ, मुस्लिम समुदाय और दुनिया की आज़ाद जनता के समर्थन से, इस 'भयानक अपराध' के दोषियों को पछताने पर मजबूर कर देंगे."
पेज़ेश्कियान ने कहा कि अली ख़ामेनेई ने 37 वर्षों तक "बेहद अक़्लमंदी और दूरदर्शिता के साथ इस्लाम के मोर्चे का नेतृत्व किया और उनकी मौत के बाद ईरान एक मुश्किल दौर से गुज़रेगा."
कहने को तो 86 वर्षीय ख़ामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता थे लेकिन ईरान से बाहर जैसे पाकिस्तान सहित दुनिया के कई देशों में शिया विचारधारा के बीच उनके पैरोकारों की एक बड़ी संख्या मौजूद है.
भारत का शिया समुदाय भी उन्हें अपना सुप्रीम लीडर मानता है.
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इराक़, पाकिस्तान, सीरिया और दुनिया के दूसरे मुस्लिम देशों में रैलियों के दौरान शिया मुसलमान ख़ामेनेई की तस्वीरें हाथों में लिए नज़र आते हैं.
रविवार को पाकिस्तान में कराची स्थित अमेरिकी काउंसलेट के बाहर उस समय गोलीबारी हुई जब प्रदर्शनकारी बाहरी सुरक्षा घेरे को तोड़कर अंदर घुस गए और उन्होंने तोड़फोड़ की. इस दौरान नौ लोगों की मौत की ख़बर भी सामने आई.
इसके अलावा, गिलगित-बल्तिस्तान में हिंसक प्रदर्शनों के दौरान संयुक्त राष्ट्र के कार्यालयों और दूसरी संपत्तियों को आग लगा दी गई.
दुनिया पर क्या असर होगा?

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ऐसे में यह सवाल उठता है कि अमेरिका और इसराइल के हमलों में ख़ामेनेई की मौत का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
अतीत में ईरान और इसराइल के बीच तनाव के दौरान मध्य पूर्व में हिज़्बुल्लाह, हूती विद्रोहियों और इसी तरह के समूहों ने ईरान का समर्थन किया था, लेकिन पिछले दो वर्षों में इन समूहों को अमेरिका और इसराइल की सैन्य कार्रवाइयों में भारी नुक़सान हुआ है.
अमेरिका के 'न्यू लाइन्स इंस्टीट्यूट' के सीनियर डाइरेक्टर और मध्य पूर्व की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले डॉक्टर कामरान बुख़ारी का मानना है कि ख़ामेनेई की मौत के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए ख़तरे ज़रूर पैदा हो सकते हैं.
उन्होंने बीबीसी उर्दू से बातचीत में कहा, "हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और उसकी क़ुद्स फ़ोर्स की क्षमताएं अब क्या हैं और अन्य देशों में उनके प्रॉक्सी ग्रुप्स में कितना दम बचा है."
"हाल के महीनों में हमने देखा कि इसराइल ने हिज़्बुल्लाह के पूरे केंद्रीय नेतृत्व को ख़त्म कर दिया और सीरिया में बशर अल-असद की सरकार गिर गई लेकिन ईरान उनकी मदद के लिए कुछ नहीं कर सका."
उनका मानना है कि अली ख़ामेनेई की मौत का दुनिया भर के शिया मुसलमानों को दुख ज़रूर होगा, लेकिन इराक, लेबनान और सीरिया जैसे देशों में ईरानी सर्वोच्च नेता की तुलना में आयतुल्लाह सिस्तानी के अनुयायियों की संख्या अधिक है "और वे धर्मगुरुओं के राजनीति में आने को पसंद नहीं करते."

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मध्य पूर्व पर गहरी नज़र रखने वाले दूसरे विश्लेषक भी डॉक्टर बुख़ारी जैसी ही राय रखते हैं.
हिब्रू यूनिवर्सिटी में एशियाई अध्ययन और इस्लामी व मध्य पूर्व अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर सिमोन वोल्फ़गांग फ़ुक्स कहते हैं कि इसकी संभावना है कि हिज़्बुल्लाह इस स्थिति में मूकदर्शक की भूमिका निभाना बंद कर दे. वह कहते हैं कि यह भी हो सकता है कि इराकी सशस्त्र समूह इराक या उसके बाहर अमेरिकी सेना पर हमले शुरू कर दें.
हालांकि वह मानते हैं कि अक्तूबर 2023 के बाद से हिज़्बुल्लाह सहित दूसरे ईरान समर्थित समूह कमज़ोर हो गए हैं और वह अब शक्ति संतुलन को बिगाड़ नहीं सकते.
उनके अनुसार, "मुस्लिम दुनिया के कुछ वर्ग ख़ामेनेई के साम्राज्यवाद-विरोधी रुख़ का समर्थन ज़रूर करते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि वह ख़ामेनेई की मौत पर आंसू बहाएंगे. ख़ास तौर से वह लोग जिन्हें सीरिया, लेबनान और खाड़ी देशों में ईरानी हस्तक्षेप का ख़मियाज़ा भुगतना पड़ा."
ख़ामेनेई की मौत का ईरानी सरकार पर क्या असर पड़ेगा और क्या इसके प्रभाव देश से बाहर भी पड़ेंगे?
टीकाकारों का मानना है कि ख़ामेनेई की मौत से ईरान की वर्तमान सरकार का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त तो नहीं होगा, लेकिन "यह फिर कभी पहले जैसा भी नहीं हो पाएगा."
डॉक्टर कामरान बुख़ारी कहते हैं, "रहबर-ए-आला (सर्वोच्च नेता) इस व्यवस्था के केंद्रीय पुर्ज़े थे, हालांकि वह कई वर्षों से बीमार थे और राज्य के मामलों को चलाने के लिए उनका झुकाव पूरी तरह से रिवोल्यूशनरी गार्ड्स या ईरानी सेना पर था."
डॉक्टर बुख़ारी का मानना है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स अब अतीत की तुलना में कम शक्तिशाली हैं.
वह कहते हैं, "ख़ामेनेई की मौत एक युग का अंत है. इसके बाद वर्तमान व्यवस्था फ़िलहाल पूरी तरह से ध्वस्त नहीं होगी लेकिन इसमें बदलाव तो ज़रूर आएंगे."
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही बता चुके हैं कि वे ईरान में कैसी व्यवस्था देखना चाहते हैं.
ईरानी सर्वोच्च नेता की मौत की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा था, "हमें सुनने को मिल रहा है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कई सदस्य और दूसरे सुरक्षा व पुलिस बल अब लड़ना नहीं चाहते और हमसे माफ़ी चाहते हैं."
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह उम्मीद भी जताई थी कि ईरानी सुरक्षा बल 'देशप्रेमी जनता' के साथ मिलकर देश को फिर से महानता की ओर ले जाएंगे.
ख़ामेनेई ने अपनी ज़िंदगी में हमेशा पश्चिम और ख़ास तौर से अमेरिका को अविश्वास की निगाह से देखा और शोधकर्ताओं को लगता है कि उनके बाद बदलाव आना तय है.
सिमोन वोल्फ़गांग फ़ुक्स कहते हैं, "ख़ामेनेई की मौजूदगी में ईरान में सार्थक सुधारों या अमेरिका के साथ संबंधों में सुधार की कोई संभावना नहीं थी. लेकिन भविष्य में ईरान के नए सर्वोच्च नेता को ईरान की राह बदलने की आज़ादी होगी."

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ईरान की शासन व्यवस्था में क्या बदलाव आएगा, यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन ख़ामेनेई की मौत कई दूसरे देशों के लिए परेशानी की वजह ज़रूर बन सकती है.
दुनिया भर में ईरान समर्थक समूहों पर शोध करने वाले फ़िलिप स्मिथ कहते हैं, "जब आप इस्लामी क्रांति की कट्टर विचारधाराओं से जूझते हैं, तो आप 'विलायत-ए-फ़क़ीह' (इस्लामी धार्मिक नेतृत्व का संरक्षण) को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. यह विचारधारा धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक भी है."
"रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को पता है कि इन सिद्धांतों के ज़रिए लोगों को सामुदायिक सहित कई मोर्चों पर सक्रिय किया जा सकता है."
फ़िलिप के अनुसार, "समस्या यह है कि ख़ामेनेई पूरी मुस्लिम उम्माह के नेता बनना चाहते थे, लेकिन वह सही मायने में एक आयतुल्लाह नहीं थे और वह आयतुल्लाह सिस्तानी के मुक़ाबले कम हैसियत रखते थे."
इसीलिए ख़ुमैनी की मौत के बाद ईरानी संविधान में संशोधन करके 'रहबर' (नेता) के लिए 'मरजा' (अथॉरिटी) होने की शर्त ख़त्म कर दी गई थी.
यहां 'विलायत-ए-फ़क़ीह' को समझना ज़रूरी है.
ख़ामेनेई आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी के पैरोकार थे, जिसके तहत उलेमा को 'इमाम-ए-ज़माना' का नायब (प्रतिनिधि) और इस्लामी न्यायशास्त्र व शिक्षा का विशेषज्ञ होने के नाते राजनीतिक शक्ति का स्रोत माना जाता है.
आमतौर पर शिया धार्मिक और राजनीतिक विचार में इमाम-ए-ज़माना की 'अरसा-ए-ग़याबत' (ओझल होने) की अवधि में स्थापित राज्य शक्ति को ज़बर्दस्ती क़ब्ज़ाया हुआ माना जाता था. दूसरी तरफ़ आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने इसके विपरीत इस पर ज़ोर दिया कि इमाम-ए-ज़माना के प्रकट होने तक सरकार या राजनीतिक शक्ति से दूरी नहीं बनाई जा सकती.
इसलिए, उनके अनुसार ज़रूरत इस बात की थी कि विद्वान और मुजतहिद (नई परिस्थितियों में इस्लाम के अनुसार फ़ैसला लेने वाले) आगे बढ़ें और सत्ता संभालकर समाज में सुधार करें.
फ़िलिप कहते हैं कि ईरान ने विलायत-ए-फ़क़ीह को लोगों को सक्रिय करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और अपनी सीमाओं के बाहर इसे राजनीति के लिए इस्तेमाल किया.
फ़िलिप के अनुसार, "इसी का इस्तेमाल करके उन्होंने लेबनान में हिज़्बुल्लाह बनाया, इसी के तहत इराक में 'कताइब सैयद अल-शुहदा' जैसे समूह हैं और इसी तरह पाकिस्तान में 'लश्कर-ए-ज़ैनबियून' है.'
शायद ख़ामेनेई दुनिया के सभी शियाओं के आध्यात्मिक नेता न हों, लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि उनके अनुयायियों के जीवन पर उनकी मौत का असर ज़रूर पड़ेगा.
प्रोफ़ेसर सिमोन वोल्फ़गांग फ़ुक्स कहते हैं, "पाकिस्तान, भारत, इराक और लेबनान में भले ही लोग अपने जीवन में उनके धार्मिक आदेशों का पालन न करते हों, लेकिन वह इन जगहों पर अपने अनुयायियों के बीच एक गर्व और शक्ति के प्रतीक के रूप में याद रखे जाएंगे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

















