जम्मू-कश्मीर का वो 'दूध का गाँव' जहां देसी फ़्रिज की है अनोखी परंपरा

- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कश्मीर की ऊँची पहाड़ियों और घाटियों से घिरा है उरी ज़िले का दुदरन गाँव, जो नियंत्रण रेखा (एलओसी) के क़रीब है.
जब हम गाँव पहुँचे तो यहाँ का मौसम सुहावना था. पतझड़ की शुरुआत हो चुकी थी. ठंड की आमद को देखते हुए यहाँ के लोग सर्दियों के लिए चारे और अनाज का भंडार तैयार करने लगे थे.
ये गांव दूध और खाने-पीने के सामान को सुरक्षित रखने के लिए एक ख़ास चीज का इस्तेमाल करता है. यहां के लोग इसे 'देसी रेफ़्रिजरेटर' भी कहते हैं.
इसके बारे में जब हमने गांव वालों से बातचीत शुरू की तो वे हमें मुस्कराते हुए कुछ जगहों पर ले गए.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
वहाँ लकड़ी और पत्थर से बने छोटे-छोटे ढांचे थे. इनमें लकड़ी का दरवाज़ा हटाते ही अंदर एक गुफा जैसी जगह दिखती है, जहाँ दूध से भरे बर्तन रखे होते हैं.
शाम ढलने को थी, ज़रीना बेगम अपनी गाय लेकर घर लौटीं और रोज़ की तरह दूध दुहा. फिर उन्होंने दूधअपने देसी फ़्रिज में रखा.
इसे यहाँ की स्थानीय भाषा में 'डडूर' कहा जाता है.
ज़रीना बताती हैं, "हम लकड़ी के इन डडूर में दूध रखते हैं. दूध से दही बन जाती है, फिर हम मक्खन निकालते हैं और उससे घी बनाते हैं. वो घी हम ख़ुद इस्तेमाल करते हैं. कभी किसी को देते हैं, कभी बेचते भी हैं."
"डडूर में दूध आठ-दस दिन तक ठीक रहता है. बिजली वाले फ़्रिज में दूध जम जाता है और अक्सर बच्चे बीमार हो जाते हैं. डडूर में रखा दूध सेहत के लिए अच्छा रहता है."
जब से गाँव बसा है, तब से है डडूर

श्रीनगर से लगभग 95 किलोमीटर दूर इस गाँव के लोग बताते हैं कि दुदरन की पहचान ही दूध से जुड़ी है.
मोहम्मद हाफ़िज़ शेख़ कहते हैं, "हमारे देसी रेफ़्रिजरेटर को कश्मीरी में डडूर कहते हैं. ये उतने ही पुराने हैं जितना ये गाँव. जब यहाँ लोग बसने लगे, तब से ही ये डडूर बने हुए हैं."
पहले यहाँ दूध बहुत होता था, इसलिए गाँव का नाम ही 'दुदरन' पड़ा, यानी वह जगह जहाँ बहुत दूध हो."
मोहम्मद शफ़ी बताते हैं, "डडूर को ठंडा रखने का सिर्फ़ एक ज़रिया है- पानी. इसमें बिजली या जनरेटर की ज़रूरत नहीं होती. नीचे पानी का छोटा सा बाँध बनाते हैं, जिससे ठंडक बनी रहती है. इन्हें हमेशा उन जगहों पर बनाया जाता है जहाँ प्राकृतिक झरने हों, सूखी ज़मीन पर नहीं."
मक्खन और घी बनाने का देसी तरीक़ा

इस देसी फ़्रिज का इस्तेमाल मार्च से नवंबर तक होता है. सर्दियों में जब तापमान बहुत गिर जाता है, तब इनका उपयोग नहीं किया जाता.
अक्सर गाँव में कई परिवार मिलकर एक डडूर बनाते हैं. कुछ लोग अपने घर के लिए अलग डडूर भी बनाते हैं. दूध से लेकर घी बनाने तक का पूरा काम गाँव की महिलाएं करती हैं.
नूरजा अपने घर की ऊपरी मंज़िल पर सालों से घी बनाती आ रही हैं.
वो बताती हैं, "गाय से दूध निकालकर हम उसे डडूर में रखते हैं. कई दिन बाद उसे निकालकर बर्तन में डालते हैं और 'गुरूस मंथन' करते हैं. यानी लंबे समय तक दूध को फेंटते हैं तो इससे मक्खन बनता है, फिर उसे उबालकर घी तैयार करते हैं. इस प्रक्रिया में लगभग एक घंटा लगता है."
'यह परंपरा कभी ख़त्म नहीं होगी'

गाँव के ही अब्दुल अहद शेख़ ने भी अपना डडूर बनाया है.
वो कहते हैं, "हमारा गाँव कई मोहल्लों में बँटा है, हर मोहल्ले में लोगों ने अपने-अपने डडूर बनाए हैं. ये परंपरा चलती रहेगी. यहाँ दूध उतना नहीं निकलता जितना पहले होता था, लेकिन हम उसे बेचते नहीं. अपने इस्तेमाल के लिए रखते हैं. किसी के पास एक गाय है, किसी के पास चार."
गाँव में कुछ घरों में अब बिजली वाले फ़्रिज भी हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल ज़्यादातर सब्ज़ियां या अन्य चीज़ें रखने के लिए होता है. दूध आज भी डडूर में ही रखा जाता है.
मोहम्मद क़ासिम बताते हैं, "हमारे बुज़ुर्ग कहते थे कि इन लकड़ी के फ़्रिजों को कभी मत छोड़ो. पहले जब बिजली वाले फ़्रिज नहीं थे, लोग महीनों तक इन्हीं में दूध, मीट और खाना रखते थे. अब हर घर में फ़्रिज है, लेकिन जो पुराने लोग हैं, वो आज भी डडूर की अहमियत समझते हैं."
बर्फ़बारी में टूटने का ख़तरा

ग़ुलाम रसूल कहते हैं, "जब बर्फ़ ज़्यादा गिरती है, तो कभी-कभी ये देसी फ़्रिज टूट भी जाते हैं. इन्हें बार-बार बनाना पड़ता है. जिनके पास दूध है, वही इन्हें बनाते हैं. अब ये काम धीरे-धीरे कम हो रहा है."
हाफ़िज़ शेख़ बताते हैं कि नई पीढ़ी अब मवेशी पालने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही.
वो कहते हैं, "जब मवेशी नहीं रहेंगे, तो दूध भी नहीं रहेगा. पहले हर घर में गाय, भेड़ या बकरियां थीं. अब लोग मेहनत करने से बचते हैं. डर है कि आने वाले वक़्त में दूध की पैदावार और ये परंपरा दोनों कम हो जाएँगे."
खेती पर निर्भर गाँव और चुनौतियाँ

दुदरन के ज़्यादातर लोग खेती और मज़दूरी पर निर्भर हैं. ऊँचाई पर बसे इस गाँव में सर्दियों में भारी बर्फ़बारी होती है, जिससे जीवन मुश्किल हो जाता है.
सीमा के क़रीब होने की वजह से लोगों को गोलीबारी का डर भी रहता है. हालांकि ग्रामीणों ने बताया कि इस बार 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान गाँव में गोलीबारी नहीं हुई.
आज भी यह गाँव अपनी सादगी और परंपरागत जीवनशैली को संजोए हुए है और 'डडूर' उसी जीवन का अहसास है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां कर सकते हैं. आप हमें एक्स, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















