राजमा, सोयाबीन जैसे बीन्स बचा पाएंगे चुनौतियों से घिरी इस दुनिया को?

इमेज स्रोत, Getty Images
मानवता आज कई तरह के खतरों से जूझ रही है. दुनिया में जलवायु परिवर्तन से लेकर कुपोषण और जीवन-यापन का लगातार महंगा होना नई चुनौतियों के तरह सामने आ रहे हैं.
ऐसा लगता है कि इस संकट को बचाने के लिए हमें किसी नायक की जरूरत है. लेकिन जरूरी नहीं कि हर नायक विजेता की तरह मुकुट पहने हमारे सामने प्रकट हो.
कई बार हमें ये नायक उन जगहों पर भी मिल सकते हैं, जहां किसी ने इनकी कल्पना भी न की हो. जैसे ये आपके मॉर्निंग टोस्ट में भी हो सकते हैं.
तो क्या दुनिया की समस्याओं का हल टोस्ट के साथ खाए जाने वाली बीन्स में मिल सकता है. दुनिया भर में लोग अपने मुख्य आहार में बीन्स को शामिल करते हैं.
पूरी दुनिया में इसकी 40 हजार प्रजातियां पाई जाती हैं. इसका इस्तेमाल कई तरह से हो सकता है. ये काफी पोषक, सस्ता और पर्यावरण का हितैषी होता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
सेहत के लिए कितना मुफीद बीन्स?
फलियों के परिवार से ताल्लुक रखने वाली बीन्स एक सब्जी है जो कई आकारों में पाई जाती है. दुनिया भर में इसका इस्तेमाल- दाल, चने से लेकर मटर और ताजे बीन्स के तौर पर होता है.
अगर आप ये नहीं तय कर पा रहे हैं कि इन्हें सब्जी मानें या प्रोटीन तो हम आपको बता दें कि ये सब्जी भी हो सकता है या प्रोटीन या फिर दोनों.
मिसाल के तौर पर ताजी मटर और हरी बीन्स स्टार्च वाली सब्जियां मानी जाती हैं जबकि राजमा में काफी ज्यादा प्रोटीन होता है. ब्लैक बीन्स और चने को आप सब्जी और प्रोटीन दोनों वर्ग में रख सकते हैं.
ऐसी दुनिया में जहां ढाई करोड़ से अधिक लोग ज्यादा वजन, मोटापे या फिर कुपोषण के शिकार हैं, वहां बीन्स पोषण का शानदार स्रोत साबित हो रहा है.
बीन्स न सिर्फ सस्ता है बल्कि ये पशु उत्पादों का भी विकल्प है. बीन्स में कम वसा और ज्यादा पोषण होता है. ये प्रोटीन, आयरन, जिंक और फाइबर से भरपूर होते हैं.
इनमें जटिल कार्बोहाइड्रेट होता है जो बड़ी आंत में मौजूद बैक्टीरिया को पोषण देता है. इससे हमारी आंतें स्वस्थ रहती हैं. वैसे सभी तरह के बीन्स में एक खास अनुपात में अमीनो एसिड होते हैं लेकिन सोयाबीन में हमारे स्वास्थ्य के हिसाब से ये अनुपात सबसे अच्छा होता है.
दूसरे बीन्स में अमीनो एसिड का ये संतुलन उतना बढ़िया नहीं होता लेकिन दुनिया भर में लोग पुराने समय से ही अपने खाने में इन्हें शामिल करते रहे हैं ताकि भोजन को पूरी तरह पोषक बनाया जा सके.
बीन्स को तरह-तरह से खाया जाता है. टोस्ट बीन्स, बीन्स बरिटोज से मटर-चावल, दाल रोटी कुछ लोकप्रिय भोजन हैं. बीन्स के साथ खाने की हर चीज बेहतर बन जाती है.
हालांकि बीन्स से पेट में गैस बन सकती है लेकिन ये पेट की गैस को निकालने में भी मददगार साबित होता है. इसके अलावा बीन्स जंगलों, चारागाहों और दलदली जमीन को समेटे पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचाए रखता है.
इन जड़ों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया वातावरण से नाइट्रोजन को अवशोषित कर इसे मिट्टी में सुरक्षित कर लेते हैं. इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन फिक्सिंग कहते हैं, जो न सिर्फ पेड़ों और दूसरे पौधों को पोषण मुहैया कराती है बल्कि ये खेती के लिए प्राकृतिक पोषक तत्व के तौर पर भी काम करती है.

इमेज स्रोत, Getty Images
पानी बचाने का काम करेगा बीन्स
दुनिया का तापमान लगातार बढ़ रहा है. इसके बावजूद बीन्स पर आंच नहीं आई है. ये अलग-अलग जलवायु वाले वातावरण में लगातार पैदा किए जा रहे हैं.
ब्रिटेन के ब्रॉड बीन्स से लेकर हिमालय में उगाए जाने वाले चौरी तक. ये बड़े सख्त जान होते हैं और इन्हें धान, गेहूं और दूसरे पशु उत्पादों की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है.
एक अनुमान के मुताबिक 2030 तक दुनिया भर पानी की मांग 40 फीसदी बढ़ जाएगी. ऐसे में बीन्स किसी सुपरपावर से कम नहीं हैं.
बीन्स लेकर कई गलतफहमियां भी रही हैं. शोधकर्ताओं में एक बार यह चिंता देखी गई कि सोयाबीन में पाए जाने वाले आइसोफ्लेवोन्स ओस्ट्रोजेन हारमोन की नकल कर स्वास्थ्य समस्या पैदा कर सकता है.
लेकिन गनीमत है कि इस बारे में हुए और ज्यादा अध्ययनों ने इसे गलत साबित कर दिया है. इसके उलट नए अध्ययनों में ये पाया गया कि सोयाबीन कैंसर का जोखिम कम कर सकता है और फेफड़ों को भी स्वस्थ रखता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
बीन्स खाने में क्या दिक्कत है?
एक और चिंता ये थी कि ज्यादा सोयाबीन पैदा करने से अमेज़न जैसे जगहों पर जंगल घट सकते हैं. लेकिन सचाई ये है कि इस इलाके में उगाए जाने वाले सोयाबीन पशुचारा में इस्तेमाल होता है.
अगर हम कम मीट और ज्यादा सोयाबीन खाएं तो हम खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन में भी कटौती कर सकेंगे.
इसका मतलब ये कि इससे जंगलों और दूसरी प्राकृतिक जगहों पर दबाव कम पड़ेगा. फसल उगाने के लिए ज्यादा जंगल नहीं काटे जाएंगे.
बहरहाल जिंदगी में हर चीज की तरह बीन्स में सब कुछ अच्छा नहीं है.
जो लोग अपने भोजन में बीन्स शामिल करने के आदी नहीं होते उन्हें धीरे-धीरे इसकी आदत डालनी होगी क्योंकि इनमें काफी फाइबर होता है.
हालांकि ये भारी भी होते हैं.
कुछ लोगों का मानना है कि इससे पेट खराब हो सकता है. हालांकि इन्हें भिगोकर पकाने से यह समस्या कम होगी.
राजमा और कैनलिनी बीन्स में काफी लेक्टिन होता है, ये एक ऐसा प्रोटीन है जो इन्हें विषैला बना सकता है.
इसलिए इन्हें अच्छी तरह से पकाना जरूरी है. कम पका राजमा फूड प्वॉयजनिंग की वजह बन सकता है.
हालांकि बीन्स से ये उम्मीद बेमानी है कि ये दुनिया की सभी समस्याओं का हल हैं.
लेकिन दुनिया में इनकी इतनी भारी मात्रा में मौजूदगी, पौष्टिकता और पर्यावरण हितैषी गुणों के अलावा इनके तरह-तरह के स्वादिष्ट डिश से लगता है आने वाले दिनों में इनका जलवा और बढ़ेगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














