चीन से भारत में आकर बसे लोग क्यों न के बराबर रह गए

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- Author, चारुकेसी रामादुराई
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पश्चिम बंगाल के कोलकाता में एक सदी से अधिक समय से हक्का चीनी का एक छोटा सा समुदाय अमन-चैन से रहता आ रहा है.
इस समुदाय की जेनिस ली जब कोलकाता से चीन में छुट्टियां मनाने गईं, तो उन्हें ये महसूस हुआ कि वो वहां छुट्टी के ख़त्म होने तक का इंतज़ार नहीं कर सकती हैं.
वे उस वक़्त को याद करते हुए बताती हैं, "मैं हक्का भाषा नहीं बोल सकती थी, मुझे खाना पसंद नहीं था और मैं बहुत खोई हुई महसूस कर रही थी."
किसी विदेशी संस्कृति या वहां के रहन-सहन के खांचे में फिट न होने की बात आम हो सकती है लेकिन जेनिस ली के लिए नहीं क्योंकि वो खु़द चीनी मूल की हैं.
उन्होंने कहा, "मुझे तब जा कर राहत मिली जब मैं वहां से वापस आ गई."
वे वापस कोलकाता में अपने घर आने की बात कर रही थीं. जेनिस ली, हक्का मूल की पाँचवीं पीढ़ी की भारतीय चीनी हैं.
वे पो-चोंग फूड्स में काम करती हैं. पो-चोंग फूड्स उनके दादा ने 1958 में शुरू किया था, जिसके ज़रिए वह कोलकाता में रह रहे बाक़ी चीनी निवासियों को चीनी सॉस और नूडल्स की सप्लाई करते थे.

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स्थानीय संस्कृति से मेलजोल
भारत के पहले चीनी अप्रवासी टोंग आह च्यू (ब्रिटिश रिकॉर्ड के अनुसार अचेव), 1778 में चाय (चाय की पत्तियां) के साथ कोलकाता पहुंचे और शहर के पास एक चीनी मिल की शुरुआत की.
एक पूर्वी बंदरगाह के तौर पर कोलकाता चीन और पूर्वी एशिया से भारत में प्रवेश के लिए सबसे नज़दीकी जगह है. इसलिए यहां भारत का एकमात्र चीनी समुदाय रहने लगा.
20वीं शताब्दी की शुरुआत में कोलकाता में चीनी आबादी 20,000 से ज़्यादा हो गई थी, जब कई लोग चीन के गृहयुद्ध और जापान के साथ संघर्ष से बचने के लिए चीन से यहां भाग आए थे. ये लोग चमड़ा उद्योग में काम खोजने के लिए कोलकाता आए थे.
उन्होंने यहां अंतरजातीय विवाह किया, स्थानीय लोगों के साथ घुल-मिल गए और धारा प्रवाह बंगाली और हिंदी बोलना सीख गए.
जेनिस ली समझाती हैं कि खाने वाली 'चीनी' के साथ चीन से आए अप्रवासी टोंग आ चू की वजह से भारत में चीन से आए लोगों के लिए 'चीनी' शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा.
1950 के दौर में दिया गया कूटनीतिक स्लोगन "हिंदी चीनी भाई भाई" भी इसी का उदाहरण है. यहां तक कि कोलकाता में बसे चाइना टाउन को आज भी चीनापारा कहा जाता है.

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कोलकाता के चाइना-टाउन
आज कोलकाता में चीनी मूल के बमुश्किल 2,000 लोग बचे हैं. लेकिन उनकी संस्कृति टायरेटा बाज़ार (जिसे टायरेटी भी कहा जाता है) और तंगरा में हर जगह दिखाई देती है.
चाहे वो स्ट्रीट फूड विक्रेता हों, ताओवादी मंदिरों और सामुदायिक क्लब हों या चंद्र नव वर्ष के लिए वार्षिक लायन डांस की जाने वाली नृत्य हो, हर जगह उनकी संस्कृति झलकती है.
सैन फ्रांसिस्को और लंदन जैसे शहर अपने चाइना टाउन के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कोलकाता ध्यान नहीं खींच सका है. भारत में अब भी कोई दूसरा चाइना टाउन नहीं है.
कोलकाता एक नहीं बल्कि दो चाइना टाउन के लिए जाना जाता है. टायरेटा बाज़ार कोलकाता का मूल चाइना टाउन है जो 1800 के दशक से अस्तित्व में है. इसके बाद 1900 की शुरुआत में तंगरा में चीनियों की बसावट की गई.
कोलकाता में कई सालों से स्थानीय विरासत को बताने वाले ब्लॉगर रंगन दत्ता बताते हैं कि आबादी के एक बड़े हिस्से को एक दलदली वाले इलाक़े में जाने के लिए मजबूर किया गया था. ये इलाक़ा मुख्य शहर के बाहर हुआ करता था. चमड़ा उद्योग से फैलने वाली गंदगी की वजह से उन्हें टायरेटा से बाहर कर दिया गया था.
रंगन दत्ता कहते हैं, "चीनी पहले बंगाली कस्बे और यूरोपीय कस्बे के बीच एक इलाके में बस गए, जहां दूसरे विदेशी जैसे अर्मीनियाई और यूनानी, साथ ही ग़ैर-बंगाली जैसे मारवाड़ी और पारसी रहते थे. ये सभी तब व्यापार या व्यवसाय के लिए कोलकाता आए थे."

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व्यंजनों का सहारे स्थानीय लोगों से मेल-जोल
कोलकाता में तीसरी पीढ़ी के चीनी शेफ़ पीटर सेंग उस इलाक़े से बाहर पले-बढ़े हैं लेकिन वो याद करते हैं कि वह अपने चचेरे भाइयों से मिलने वहां जाया करते थे.
वह कहते हैं, "निश्चित रूप से बो बैरक (जहां एंग्लो-इंडियन समुदाय रहते थे) में आर्मेनियाई चर्च और पारसी मंदिर सभी इस बहुसांस्कृतिक इलाके में मौजूद हैं. फिर भी इन समुदाय के सभी लोग टायरेटा बाज़ार में नहीं रहते थे.
कोलकाता में रहने वाली स्वाति मिश्रा का मक़सद चीनियों के सार्वजनिक स्थानों का कायाकल्प करने के लिए स्थानीय भागीदारी को जुटाना है. उन्होंने टायरेटा बाज़ार में कम्युनिटी आर्ट प्रोजेक्ट की अगुवाई की थी.
वह कहती हैं, "एक आदर्श चाइना टाउन के उलट, टायरेटा बाज़ार में एकांत पसंद समुदाय नहीं हैं. चीनी शुरुआत से ही दूसरे समुदायों के साथ नज़दीकियों के साथ रह रहे हैं और उनमें से कुछ मुझसे बेहतर बांग्ला बोलते हैं."
तंगरा इलाक़े को बाद में बनाया गया था, लेकिन वहां बाक़ी दुनिया के चाइना टाउन की तरह ही सजावटी प्रवेश द्वार बने हुए हैं.
स्थानीय लोगों के बीच की खाई को पाटने के लिए चीनी समुदाय ने खान-पान का सहारा लिया.
भारत में पहला चीनी रेस्तरां कोलकाता में स्थानीय हक्कानी समुदाय ने शुरू किया था और समय के साथ भारत-चीनी व्यंजनों ने देश के बाक़ी हिस्सों तक अपनी पैठ बना ली.
आज तक यह भारत के लिए उनका सबसे बड़ा सौगात बना हुआ है. चीनी व्यंजन देश भर में पसंद किया जाते हैं. ये सड़क से लेकर आलीशान रेस्तरां तक मिलता है.

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कई नए व्यंजन
घर पर पारंपरिक हक्का नूडल्स के "हल्के स्वाद" के मज़े लेते हुए बड़े होने वाले पीटर सेंग कहते हैं कि रसोइयों को भारतीयों के स्वाद के मुताबिक़ सुधार करना पड़ा.
वह कहते हैं, "हर किसी ने अपने हिसाब से हरी मिर्च, प्याज़, धनिया पाउडर और यहां तक कि गरम मसाले को इसमें मिलाया."
स्थानीय मसालों और सॉस के मिश्रण से मिलकर कुछ नए व्यंजन ईजाद किए गए. जैसे डार्क सोया सॉस के इस्तेमाल से चिली चिकन, कॉर्न स्टार्च और मसालों में तली हुई फूलगोभी के फूल से गोबी मंचूरियन. इन व्यंजनों की चीन में कोई चर्चा नहीं है.
पो-चोंग फूड्स ने भारतीय सॉस जैसे पुदीना (पुदीना), कसुंदी (सरसों का बंगाली संस्करण) और चिल्ली चिकन सॉस बनाना भी शुरू कर दिया है. कोलकाता के भारतीयों के साथ-साथ चीनी स्थानीय लोगों को यह काफ़ी पसंद आता है.
टायरेटा बाज़ार में सुन यात सेन स्ट्रीट पर रविवार की सुबह चीनी नाश्ता करना कोलकाता के कई स्थानीय लोगों का पसंदीदा रिवाज है. ये लोग अस्थायी स्ट्रीट स्टॉल पर परोसे जाने वाले ताज़ा पकौड़े, वॉन्टन और नूडल्स के लिए वहां पहुंचते हैं.
सुबह साढ़े पांच बजे तक विक्रेता एल्यूमीनियम स्टीमर में चिकन मोमोज, पोर्क बन्स और फिशबॉल सूप को लेकर तैयार हैं.
तंगरा इलाका आह लेउंग, बीजिंग, किम लिंग और गोल्डन जॉय (सेंग के परिवार का पसंदीदा) जैसे चीनी रेस्तरां के लिए जाना जाता है.
जेनिस ली कहती हैं, "कोलकाता का चाइनीज खाना दुनिया में हर जगह मशहूर है, यहां तक कि न्यूयॉर्क में एक रेस्तरां भी है."
जेनिस ली का इशारा न्यूयॉर्क के 'तंगरा मसाला' रेस्तरां की ओर जो चीनी व्यंजन को भारतीय अंदाज में परोसता है.

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चीनी समुदाय के कम होने के पीछे की चुनौतियां
विश्व स्मारक कोष के मुताबिक़ एक सदी से ज़्यादा समय तक भारत का हिस्सा होने के बावजूद कोलकाता की चीनी समुदाय लगातार घट रही है और आने वाले समय में इसके पूरी तरह से ग़ायब होने का ख़तरा है.
जेनिस ली ने उन चुनौतियों के बारे में बात की जो एक आबादी वाले शहर के बीचों बीच क़ीमती अचल संपत्ति पर रहने के साथ आती हैं, जिसमें बड़े पैमाने पर "ज़मीन हड़पने" और संपत्ति के मालिकाना हक़ को लेकर लड़ाई शामिल हैं.
आबादी की गिरावट की शुरुआत 1962 के भारत-चीन युद्ध के साथ हुई. उस समय पीढ़ियों से यहां रहने वाले को शक और दुश्मनी के साथ देखा जाता था.
सैकड़ों चीनी अप्रवासियों को बिना किसी आधार के हिरासत में लिया गया और देश के दूसरे छोर पर स्थित राजस्थान के नज़रबंदी शिविरों में भेज दिया गया, जहां उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया.
अपने घर कोलकाता लौटने के बाद कई लोगों ने दूसरे देशों में जाने का फै़सला किया जहां उनके परिवार और दोस्त थे.
उसके बाद से सरकारी आदेशों पर सैकड़ों चमड़े के कारख़ानों को भी बंद कर दिया गया है, आजीविका को होने वाले नुकसान की वजह से नतीजतन कई और लोग ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा चले गए. पिछले कुछ दशकों में भारत में बाकी समुदायों की तरह ही भारतीय चीनी युवा बेहतर शिक्षा और रोज़गार के अवसरों की तलाश में विदेश चले गए.
रंगन दत्त बताते हैं कि स्कूल के उनके ज़्यादातर चीनी दोस्त अब टोरंटो में रहते हैं. जबकि सेंग कहते हैं कि केवल स्थापित व्यवसाय वाले ही अब कोलकाता में रहते हैं, और उन पर भी अपने बच्चों के साथ विदेश जाने का दबाव है.

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जेनिस ली खु़द अपने समुदाय को होने वाली परेशानियों से नहीं गुज़री हैं और वो यहां अपने जीवन को बेहतर बनाने का विकल्प चुनती हैं.
वो कहती हैं, "हम एक छोटे से चुस्त-दुरुस्त समुदाय हैं. हम अभी भी अपने रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और चीनी नव-वर्ष जैसे त्योहारों को एक साथ मनाते हैं."
सेंग अब चेन्नई में काम करते हैं और चीनी नव-वर्ष के मौके पर साल में एक बार कोलकाता में अपने माता-पिता से मिलने जाते हैं.
वे कहते हैं, "जब तक वहां हमारा परिवार है, हम अपनी संस्कृति का पालन बरकरार रखेंगे..."
जेनिस ली के मुताबिक़ अखंडता का प्रयास दोनों तरफ से हुआ है. बंगाली विक्रेता हक्का में बोलना सीख रहे हैं और बोक चोय, कैलान जैसी चीनी सब्जियां बेच रहे हैं.
वे हंसते हुए बंगाली मिठाइयों को अपने जीवन का हिस्सा बताती हैं, "मैं रसगुल्ला और मिष्टी दोई (मीठी दही) के बिना नहीं रह सकती."
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