असम में 'असमिया और बंगाली गमछे को मिलाने' पर क्यों हो रहा है विरोध?

- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
असम के कई हिस्सों में बीते कुछ दिनों में असमिया गामोसा अर्थात गमछा के स्वरूप के साथ कथित छेड़छाड़ को लेकर कुछ जातीय संगठनों और छात्र समूहों ने कड़ा विरोध जताया है.
दरअसल नवगठित बांग्ला साहित्य सभा असम नामक एक साहित्यिक निकाय ने अपने एक कार्यक्रम में मेहमानों को सम्मानित करने के लिए जो गमछा भेंट किया था उसका आधा हिस्सा असमिया गमछा और आधा हिस्सा बंगाली गमछा को सिलकर तैयार किया गया था.
इस नए विवादास्पद गमछे का आधा हिस्सा लाल और सफ़ेद फूलों वाला असमिया फुलम गमछा था तो दूसरा हिस्सा आधा लाल और सफ़ेद चेकदार पैटर्न वाला गमछा था, जिसका इस्तेमाल अमूमन बंगाली लोग करते हैं.
असमिया समुदाय के गमछे के साथ छेड़छाड़ करने और बीच से काटकर उसके आधे हिस्से के साथ बंगाली समुदाय के गमछे को जोड़ने की वजह से यहां एक नए विवाद का जन्म हुआ है.
हालांकि बांग्ला साहित्य सभा असमिया गमछा को बीच में से फाड़ने के आरोपों से इनकार करता है.
क्यों हो रहा है विरोध?
बांग्ला साहित्य सभा ने गुवाहाटी के मालीगांव स्थित श्री हितेश्वर सैकिया भवन में 25 मार्च से जिस दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया था उसमें असम के शिक्षा मंत्री रनोज पेगु, असम साहित्य सभा के पदाधिकारियों समेत कई विशिष्ट लोग मौजूद थे.
राज्य के शिक्षा मंत्री पेगु समेत उस कार्यक्रम में मौजूद सभी मेहमानों को यह नया गमछा पहना कर उनका सम्मान किया गया था. लेकिन असमिया लोगों का एक वर्ग अपने पारंपरिक गमछे के साथ इस तरह की छेड़छाड़ से बेहद नाराज़ है.
ऐसे में असमिया गमछे की इस नई रचना के विरोध में कुछ लोगों ने पुलिस में एफ़आईआर भी दर्ज कराई है.
कृषक संग्राम समिति, बीर लाचित सेना समेत कई लोगों ने बांग्ला साहित्य सभा के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज की है.
इस मामले को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ता हीरक ज्योति बोरा ने गुवाहाटी के चांदमारी थाने में बांग्ला साहित्य सभा के अध्यक्ष और महासचिव के ख़िलाफ़ एक शिकायत दर्ज कराई है.
जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने वाले बोरा कहते हैं, "बांग्ला साहित्य सभा के उस सम्मेलन में असम सरकार के मंत्री समेत कई बड़े लोग मौजूद थे और उन लोगों को इस तरह के एक गमछे से सम्मानित किया गया, यह किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है. असमिया गमछा को इस तरह बीच में से काट कर दूसरे गमछे से जोड़ना न केवल हमारे स्वाभिमान के प्रतीक गमछे का अपमान है बल्कि यह एक तरह से स्वदेशी लोगों के अधिकारों का हनन भी है."

माफ़ी मांगने के बाद भी नहीं थमा विवाद
हालांकि इस विवाद को बढ़ता देख बांग्ला साहित्य सभा ने लिखित में एक बयान जारी कर माफ़ी मांग ली है. बांग्ला साहित्य सभा से जुड़े लोगों का कहना है कि दोनों समुदाय (असमिया-बंगाली) के बीच सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने तथा ब्रह्मपुत्र और बराक वैली के बीच एक मिलन के प्रतीक स्वरूप इस गमछे को जोड़कर एक बनाया गया था.
फिलहाल पुलिस ने कई अलग-अलग थानों में दर्ज हुए मामलों में बांग्ला साहित्य सभा के किसी भी पदाधिकारी से कोई पूछताछ नहीं की है.
मानवाधिकार कार्यकर्ता बोरा का कहना है कि बांग्ला साहित्य सभा एक पवित्र और ज़िम्मेदार संस्था है लेकिन उन्होंने जिस अप्रत्यक्ष तरीक़े से माफ़ी मांगी वो काफ़ी नहीं है. वो कहते हैं, "बांग्ला साहित्य सभा को क़ानूनी तौर पर असम के लोगों को लिखित रूप से यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह की ग़लती दोबारा नहीं होगी."

जीआई टैग प्राप्त है असमिया गमछा
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य ने असम सरकार से इस मामले में कड़ी कार्रवाई करने का आह्वान किया है.
आसू नेता भट्टाचार्य ने इस विवाद पर कहा, "यह गमछा हमारा स्वाभिमान है. इसे जीआई टैग मिला है. लिहाज़ा गमछे की मर्यादा और असम की ज़मीन की सुरक्षा करनी ही होगी. हमारे गमछे का कोई अपमान न कर सके, इसके लिए सभी को आह्वान करता हूँ तथा असम सरकार से इस मामले कार्रवाई करने की मांग करता हूं."
असम की संस्कृति और पहचान के प्रतीक असमिया गमछे को पिछले साल दिसंबर में केंद्र सरकार से भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग मिला है.
हाथ से बुने जाने वाले ये गमछे आयताकार कपड़े से बने होते हैं और इसमें दोनों तरफ लाल बॉर्डर होते हैं, जो राज्य की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है. यह गमछा असमिया लोगों के स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि कई मौकों पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कंधे पर भी असमिया गमछा लहराता दिख जाता है.
क्या कहते हैं जानकार?
असम में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी इस विवाद पर कहते हैं, "असम में रहने वाली सभी जाति-जनजातियों की अपनी पोशाक, संस्कृति, गीत हैं, लिहाज़ा सभी को अपनी-अपनी सांस्कृतिक चीज़ों का ही व्यवहार करना चाहिए."
वो कहते हैं, "अगर कोई बाहर से प्रवासन के तहत यहां अपनी संस्कृति के साथ आया है और उसका यहां पालन कर रहा तो उसमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन बांग्ला साहित्य सभा नामक संगठन ने दो संस्कृति को मिलाकर जिस तरह का एक अलग गमछा बनाया है वो किसी भी कीमत पर यहां स्वीकार्य नहीं हो सकता. लिहाज़ा दो समुदाय के बीच में किसी भी तरह के टकराव से बचने के लिए इस तरह का काम नहीं करना चाहिए."

असमिया गमछा असम की शान का प्रतीक
असम में असमिया गमछे का धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक रूप से गहरा प्रतीकात्मक मूल्य है. इसे आपसी सम्मान और एकजुटता के प्रतीक के रूप में उपहार में दिया जाता है.
इसके अलावा 1980 के दशक की शुरुआत में असम आंदोलन की बात हो या फिर हाल ही में राज्य में नागरिकता संशोधन अधिनियम के ख़िलाफ़ हुए विरोध की, यहां प्रदर्शनकारियों ने असमिया पहचान के चिह्न के रूप में इस गमछे का प्रमुखता से उपयोग किया था.
'गमछा फाड़ा नहीं बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव के लिए जोड़ा था'
बांग्ला साहित्य सभा के संयुक्त सचिव संदीपन दत्ता पुरकायस्थ इस पूरे विवाद और संगठन की तरफ़ से जारी किए गए लिखित माफ़ीनामे पर बीबीसी को बताते हैं, "दरअसल हमने असमिया और बंगाली समुदाय के बीच सांस्कृतिक समन्वय के लिए दोनों गमछों को मिलाकर एक बनाया था. हमने असमिया गमछे को बीच में से फाड़ा नहीं था बल्कि बंगाली गमछे के साथ जोड़ा था. फिर भी जाने-अनजाने में किसी की भावना को ठेस पहुंची है तो हमने लिखित में खेद व्यक्त किया है. हमने प्रेस में बयान जारी कर आहत लोगों को यह भी सुनिश्चित किया है कि आगे ऐसा कभी नहीं होगा."
इस विवाद में राज्य में बसे हिंदू बंगालियों से जुड़ी किसी भी तरह की राजनीति से इनकार करते हुए पुरकायस्थ ने कहा, "बांग्ला साहित्य सभा को बने महज़ दो साल हुए हैं और हम पूरी तरह एक ग़ैर राजनीतिक संगठन हैं. हमारा प्रमुख उद्देश्य असमिया और बंगाली समुदाय में साहित्य के ज़रिए एक मज़बूत समन्वय तैयार करना है."

कार्यक्रम के दौरान विरोध नहीं हुआ
जिस कार्यक्रम में इस्तेमाल किए गए गमछे को लेकर पूरा विवाद हुआ उसमें राज्य के शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री की मां भी शामिल थीं लेकिन उस दौरान किसी ने उसका विरोध नहीं किया बल्कि शिक्षा मंत्री ने तो बाकायदा बधाई संदेश देते हुए एक ट्वीट भी किया था.
बांग्ला साहित्य सभा के संयुक्त सचिव संदीपन दत्ता पुरकायस्थ भी कहते हैं, "हमारे उस कार्यक्रम में शिक्षा मंत्री से लेकर असम साहित्य सभा के अध्यक्ष समेत बड़े पदाधिकारी उपस्थित थे. इसके अलावा असम साहित्य सभा से जुड़ी मुख्यमंत्री की मां मृणालिनी देवी भी उपस्थित थीं लेकिन किसी ने भी उस दौरान उस गमछे को लेकर कोई आपत्ति नहीं की. हमने खेद व्यक्त किया है और पुलिस ने भी अभी इस मामले में हमारे किसी भी पदाधिकारी से कोई संपर्क नहीं किया है. हम चाहते है कि यह विवाद अब यहीं खत्म हो."
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राज्य के शिक्षा मंत्री पेगू ने उस कार्यक्रम में भाग लेने के बाद एक ट्वीट कर बांग्ला साहित्य सभा को शुभकामनाएं देते हुए बराक और ब्रह्मपुत्र वैली के बीच समन्वय को मज़बूत करने के इरादे से राज्य के बांग्ला भाषी असमिया लोगों द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की सराहना की थी.
असम में 'स्वदेशी' असमिया और 'प्रवासी' बंगालियों (हिंदू और मुस्लिम) के बीच का टकराव काफ़ी पुराना है. साल 1985 में असम समझौते के बाद भी इनको लेकर यहां राजनीति लगातार होती रही है.
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