असम में 'मिया म्यूज़ियम' खोलने वालों के ख़िलाफ़ क्यों हुई कार्रवाई?

- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, असम के धुमेरघाट गांव से
"मेरे बेटे ने ऐसा क्या अपराध किया है जो उसे पुलिस पकड़ कर ले गई. मुझे मेरा बेटा चाहिए. आपसे विनती करती हूं कि आप कुछ ऐसा करें कि वो लोग जल्द से जल्द मेरे बेटे को रिहा कर दें." इतना कहते ही 70 साल की मोहीतोन बीबी फूट-फूट कर रोने लगती हैं.
असम के ग्वालपाड़ा ज़िले के एक छोटे से गांव धुमेरघाट में बीते 23 अक्टूबर को असम मिया (असोमिया) परिषद नामक एक संगठन ने बंगाली मूल के मिया मुसलमान समुदाय की संस्कृति को प्रदर्शित करने के लिए एक निजी 'मिया म्यूज़ियम' का उद्घाटन किया था. असम में बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए अक्सर 'मिया' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.
लेकिन इस म्यूज़ियम को लेकर सत्ताधारी बीजेपी के कई विधायकों ने आपत्ति जताई और अपनी सरकार से इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा. बीजेपी विधायक प्रशांत फूकन ने सबसे पहले इस प्राइवेट म्यूज़ियम को गिराने की मांग की.
इसके बाद ग्वालपाड़ा ज़िला प्रशासन ने म्यूज़ियम को इसके उद्घाटन के दो दिन के अंदर ही सील कर दिया. जबकि म्यूज़ियम को सील करने के एक दिन बाद पुलिस ने असम मिया (असोमिया) परिषद के अध्यक्ष मिया मोहर अली तथा उनके दो अन्य साथियों को गिरफ़्तार कर लिया है.
हालांकि इन तीनों लोगों की गिरफ़्तारी नलबाड़ी ज़िले के घोगरापार थाने में दर्ज एक अन्य मामले (संख्या 163/22) में की गई है जहां पुलिस ने इन लोगों के आतंकी संगठनों से जुड़े होने का दावा किया है.

मामले में गिरफ़्तारियां
मोहीतोन बीबी मोहर अली की मां हैं और अब वो घर के बाहर अपने बेटे की रिहाई का इंतज़ार कर रही हैं. इस म्यूज़ियम को खोलने से जुड़ी घटना पर वो केवल इतना कहती हैं, "मेरे बेटे ने कोई अपराध नहीं किया है. उसने जो भी किया है उसके लिए ऐसी सज़ा देना किसी भी तरह से सही नहीं है. सरकार से गुज़ारिश है कि वो मेरे बेटे को छोड़ दे."
पुलिस ने मोहर अली, अब्दुल बातेन शेख़ और तनु धदुमिया को ग़ैरक़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम तथा भारतीय दंड संहिता धारा 120 बी/121/121ए/122 के तहत गिरफ़्तार किया है. अब्दुल बातेन शेख़ असम मिया (असोमिया) परिषद के महासचिव हैं, वहीं तनु धदुमिया ने बीते रविवार को इस म्यूज़ियम का उद्घाटन किया था.
इस बीच असम पुलिस के स्पेशल डीजीपी जी.पी. सिंह ने भी एक ट्वीट कर इन तीनों लोगों की गिरफ़्तारी के बारे में जानकारी साझा की थी.
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बंगाली मुसलमानों में डर
लेकिन सरकार की इस सख़्त कार्रवाई से निचले असम के ख़ासकर बंगाली मूल के मुसलमानों में काफ़ी डर देखने को मिल रहा है.
गुवाहाटी से ग्वालपाड़ा के रास्ते नेशनल हाइवे 37 पर क़रीब 230 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद लखीपुर सर्कल के तहत धुमेरघाट गांव पहुंची बीबीसी की टीम ने जब कुछ गांव वालों से म्यूज़ियम के बारे में पूछा तो ज़्यादातर लोगों ने बात करने से मना कर दिया.
ब्रह्मपुत्र और जिंजीराम नदी से घिरे इस गांव के जिस इलाके़ में यह म्यूज़ियम खोला गया था वो जगह हर साल क़रीब चार महीने तक बाढ़ के पानी में डूबी रहती है. गांव में इस म्यूज़ियम वाली जगह पहुंचने के लिए न तो सड़क है और ना ही इस इलाके में बिजली-पानी की कोई व्यवस्था देखने को मिलती है.
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क्या कहते हैं गांव के लोग
इस म्यूज़ियम को लेकर धुमेरघाट गांव के कुछ लोग दबी ज़ुबान में सिर्फ़ इतना कहते हैं कि म्यूज़ियम के लिए सरकार के समक्ष पहले बात रखनी चाहिए थी. इसी गांव के मैदान अली कहते हैं कि अगर सरकार हमारी मांग मानती है तो ही म्यूज़ियम खोलना चाहिए था.
वहीं पास खड़े 38 साल के मोहम्मद शाहीद अली का कहना है कि म्यूज़ियम से पहले हमें गांव में रास्ते और बिजली चाहिए.
उधर, 106 साल के शेर अली कहते हैं, "म्यूज़ियम को लेकर विवाद होने के बाद यहां आए दिन कोई न कोई आ रहा है, लेकिन सालों से इस गांव की बदहाली देखने कोई नहीं आया."
साल 1994 में बनाए गए असम मिया (असोमिया) परिषद के मौजूदा अध्यक्ष मोहर अली ने अपने जिस मकान में यह म्यूज़ियम खोला था, दरअसल वह मकान उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना- ग्रामीण के तहत 2017 में रहने के लिए दिया गया था.
लिहाज़ा इस घर को सील करने के बारे में ज़िला प्रशासन का कहना है कि एक सरकारी योजना के तहत आवंटित परिसर का ग़लत इस्तेमाल किया गया है.
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सोशल मीडिया पर इस विवाद को लेकर चल रही बहस में कुछ लोगों का कहना है कि इस मिया म्यूज़ियम में दिखाए गए पारंपरिक कृषि उपकरण जैसे हल, लकड़ी के सामान तथा हाथ से बुने हुए परिधान, पारंपरिक गमछा और बांस से बने मछली पकड़ने के सामान असमिया जाति से चुराए गए हैं.
इस म्यूज़ियम को सील करने के बाद मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, "मुझे समझ नहीं आ रहा है कि यह किस तरह का म्यूज़ियम है.
वहां जो खेत जोतने के लिए हल दिखाया गया है वो तो असमिया लोगों का हल है. मछली पकड़ने के जो बांस के सामान दिखाए गए हैं वो हमारे अनुसूचित जाति के लोग अतीत से इस्तेमाल करते आ रहे हैं."

कुछ लोग म्यूज़ियम खोलने को ग़लत क्यों बता रहे हैं
"जिस गमछे को दिखाया गया है वो हमारे देसी लोगों का गमछा है. उसमें थोड़ा बदलाव कर वो लोग इसे मिया लोगों का गमछा बता रहे हैं. पहनने वाली लूंगी को छोड़कर वहां क्या नई चीज़ रखी गई है."
'मिया म्यूज़ियम' खोलने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर मुख्यमंत्री ने कहा "असमिया सामग्री ले जाकर अगर मिया म्यूज़ियम खोला है तो उन पर मामला दर्ज होगा. जब मैंने मिया कविता की बात कही थी तो उस समय मुझे सांप्रदायिक कहा गया, लेकिन अब मिया कविता आ गई है, मिया स्कूल बनाया गया है और मिया म्यूज़ियम खोल दिया गया है."
असम के नदी तट वाले इलाकों में बसे बंगाली मूल के मुसलमानों के बीच असमिया संस्कृति को बढ़ावा देने का काम कर रहे चर चापौरी परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर हाफ़िज़ अहमद इस मिया म्यूज़ियम को खोलने के काम को एक ग़लत क़दम बताते हैं.
मिया म्यूज़ियम से उत्पन्न डॉक्टर अहमद कहते हैं, "जिन लोगों ने मिया म्यूज़ियम' खोला है उन लोगों ने इस समुदाय के किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति से कोई सलाह मशविरा नहीं किया.
इसलिए इसे मिया म्यूज़ियम नहीं कहा जा सकता. मिया समुदाय का इतिहास देखें तो असम में इनके बसने से लेकर बीते क़रीब डेढ़ सौ सालों में इन्हें काफ़ी उत्पीड़न से गुज़रना पड़ा है. यही एक वजह है कि ये लोग अपनी पहचान को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं."

मिया समुदाय का इतिहास
डॉक्टर अहमद कहते हैं, "इस समुदाय में 65 से 70 लाख लोग हैं, लेकिन आज भी जिन इलाकों में वो रहते है वहां शिक्षा-स्वास्थ्य का स्तर बेहद ख़राब है.
ताज़ा विवाद में इतनी सख़्त कार्रवाई करने का मक़सद बहुसंख्यक लोगों को यह दिखाना है कि मिया लोग वृहत्तर असमिया समाज के एकमात्र दुश्मन हैं."
ब्रिटिश शासन के दौरान 1890 के दशक के अंत में बंगाली मूल के मुसलमानों को व्यावसायिक खेती के लिए असम में लाकर बसाया गया था. असम में मिया का अर्थ है बांग्लादेशी.
इस समुदाय का कोई नाम नहीं है. पहले कुछ लोग इन्हें चरुवा कहकर बुलाते थे तो कुछ लोग पोमपोमवा कहते थे. आजादी के बाद इन लोगों को नौ असमिया कहा गया. फिर मिया शब्द का इस्तेमाल होने लगा.
असम में ख़ासकर 1979 से 1985 तक चले असम आंदोलन के बाद मियां शब्द एक गाली के तौर देखा जाने लगा. डॉक्टर अहमद के अनुसार, विदेशी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए असम आंदोलन हुआ. उस समय असमिया राष्ट्रीयता में यक़ीन करने वाले मिया शब्द को एक गाली के तौर पर इस्तेमाल करते थे.

असम में मिया म्यूज़ियम की बात कांग्रेस से निलंबित विधायक शेरमान अली अहमद ने साल 2020 में पहली बार उठाई थी. उस समय हिमंत बिस्वा सरमा राज्य के शिक्षा मंत्री थी और उनकी सरकार ने इस विचार को तत्काल ख़ारिज कर दिया था.
मिया म्यूज़ियम का मुद्दा फिर से उठने के बाद विधायक शेरमान अली अहमद ने कहा, "असम में क़रीब 1 करोड़ मिया मुसलमान हैं. मैंने 2020 में एक मांग की थी कि अगर हमलोग असमिया हैं तो कलाक्षेत्र में दूसरी जनजातियों की तरह मिया समुदाय की संस्कृति और विरासत से जुड़ी कोई चीज़ शोकेस क्यों नहीं की जाती.
सरकार ने इसके ख़िलाफ़ बहुत बुरी तरह से प्रतिक्रिया दी थी. जहां तक प्राइवेट मिया म्यूज़ियम खोलने की बात है तो मुझे उन लोगों की ईमानदारी पर शक़ है. इस तरह सरकारी आवास में महज़ कुछ लोगों को लेकर म्यूज़ियम खोल देना कहीं से भी सही नहीं है."

बीजेपी का क्या कहना है
ग्वालपाड़ा में खोले गए मिया म्यूज़ियम को ग़लत क़दम बताते हुए असम मिया (असोमिया) परिषद के संस्थापक अध्यक्ष तथा सलाहकार मिया गयासुद्दीन हज़ारिका ने कहा, "मैंने बतौर सलाहकार उन लोगों से कहा था कि यह समय ठीक नहीं है और अभी मिया म्यूज़ियम खोलने की ज़रूरत नहीं है."
वहीं बीजेपी का कहना है कि कुछ लोग मिया म्यूज़ियम के नाम पर दो समुदाय के बीच विवाद खड़ा करने का काम कर रहे हैं.
असम बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता ने अपनी सरकार पर लगे तमाम आरोपों का जवाब देते हुए कहा, "अगर किसी समुदाय के पास सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ी कोई चीज़ है तो उसे म्यूज़ियम में रखा जाता है, लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हो रहा है.
म्यूज़ियम के नाम पर वो लोग किसी अन्य समुदाय की पारंपरिक चीज़ों को दिखाकर विवाद खड़ा करने का काम कर रहे हैं. पुलिस जांच कर रही है और जो दोषी होगा उसे सज़ा मिलेगी और जो निर्दोष होगा वो छूट जाएगा."
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