बाल विवाह के ख़िलाफ़ असम सरकार की मुहिम से ख़ौफ़ज़दा लोग-ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मेरा बेटा दिहाड़ी पर काम करता है और रोज़ के 300 रुपये कमाता है. मेरे पति ठेला चलाते हैं. कभी कमाई होती है, कभी नहीं. अब जब बेटे को ही जेल में डाल दिया तो मुक़दमा लड़ने के लिए पैसा कहाँ से लाएं? हमें नहीं पता कि सरकार ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया. इससे अच्छा होता कि हमें मार डालते."
ये बात कहते-कहते 70 साल की परिजान बेग़म की आंखों से आँसू छलक जाते हैं.
गुवाहाटी से क़रीब 50 किलोमीटर दूर मुकलमुआ में रहने वाली परिजान बेग़म के बेटे मोइनुल अली को कुछ ही दिन पहले असम पुलिस ने एक नाबालिग़ लड़की से शादी करने के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिया.
पुलिस का दावा है कि वो शिकायतों के आधार पर कार्रवाई कर रही है.
लेकिन गाँवों में लोगों का कहना है कि पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई कर रही है और बाद में गाँवों के प्रधानों का नाम शिकायतकर्ता के तौर पर लिख रही है.
समझने की बात ये भी है कि जब आर्थिक रूप से कमज़ोर ग्रामीण इलाक़ों के बहुत से परिवारों में बाल-विवाह के मामले मौजूद हैं तो कौन ही किसी की शिकायत करेगा.
ये कार्रवाई असम सरकार के उस अभियान के तहत की गई जिसमें बाल-विवाह करने वाले या उसमें शामिल होने वाले लोगों को गिरफ़्तार किया जा रहा है.

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बाल-विवाह के ख़िलाफ़ मुहिम
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 23 जनवरी को हुई, जब असम सरकार ने कहा कि राज्य में मातृ मृत्यु दर और बाल मृत्यु दर के बढ़ जाने की सबसे बड़ी वजह बाल विवाह है.
सरकार ने ये भी कहा कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक असम में 18 वर्ष की क़ानूनी उम्र से पहले शादी करने वाली महिलाओं की संख्या करीब 32 फ़ीसदी है.
राज्य में क़रीब 12 फ़ीसदी महिलाएं ऐसी हैं जो बालिग़ होने से पहले ही गर्भवती हो जाती हैं और ये दोनों ही आँकड़े राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा हैं.
राज्य सरकार की हरी झंडी मिलते ही असम पुलिस ने उन लोगों की धरपकड़ शुरू कर दी जिन पर बाल विवाह करने या उसमें शामिल होने का इलज़ाम था.
कुछ ही दिनों में चार हज़ार से ज़्यादा मामले दर्ज कर लिए गए और क़रीब 2800 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया. गिरफ़्तार किए गए लोगों में महिलाएं भी शामिल हैं. चूंकि राज्य की जेलें पहले से ही खचाखच भरी हुई हैं इसलिए गिरफ़्तार किए गए लोगों को कई जगह अस्थायी जेलों में रखा जा रहा है.
इस अभियान के तहत ये मामले बाल विवाह निषेध अधिनियम और प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसिस एक्ट या पॉक्सो क़ानून के तहत दर्ज किए गए हैं.

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आधी रात को पुलिस की दस्तक
परिजान बेग़म आज भी उस रात को याद कर सहम जाती हैं.
वे कहती हैं, "पुलिस रात 12 बजे आई थी. उस समय हम सो रहे थे. पुलिस हमें जगाने लगी. मैं पुलिस को देख कर बहुत डर गई थी. वो लोग दरवाज़ा पीटने लगे. वो दरवाज़ा तोड़ना चाहते थे. फिर उन्होंने ताला तोड़ दिया और मुझे घसीट कर ले गए."
"मुझे थाने में दो दिन और दो रात रखा गया. मैं रोती रही. पुलिस ने कहा कि अपने बेटे को बुलाओ वरना तुम्हें नहीं छोड़ेंगे. मैंने कहा मैं जेल जाने के लिए तैयार हूँ."
दो दिन बाद जब मोइनुल पुलिस के सामने हाज़िर हुआ तब जाकर परिजान बेग़म को छोड़ा गया. मोइनुल को बाल-विवाह करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.
परिजान बेगम के घर से कुछ ही दूर 70 साल के साम्बोर अली ये उम्मीद खो चुके हैं कि उनका बेटा रफ़ीक़ जेल से छूट कर वापस आ जायेगा.
वे कहते हैं, "मुझे मेरा बेटा चाहिए, उसके बिना घर नहीं चलता. हमारे पास पैसे की ताक़त नहीं है इसलिए बेटे को छुड़ाना बहुत मुश्किल है."
"ये सब पैसे का खेल है. जिस दिन मेरे बेटे को पकड़ कर ले गए उसी दिन पता चला कि पुलिस ने कई लोगों को पकड़ा है. क्या कर सकता हूँ. क़िस्मत में जो लिखा है वो तो होना ही है. मैं नहीं कह सकता कि वो लौट कर आएगा या नहीं. मैं तो कहीं आ-जा नहीं सकता."
साम्बोर अली बीमार रहते हैं. जिस रात पुलिस उनके घर आई तो वो आवाज़ें सुन कर जब तक उठकर आए तब तक पुलिस उनके बेटे को ले जा चुकी थी.

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'सरकार अन्याय कर रही है'
रफ़ीक़ की भाभी अंजुम कहती हैं कि रफ़ीक़ की गिरफ़्तारी के बाद उनका घर बिखर गया है क्यूंकि घर रफ़ीक़ की कमाई से ही चलता था.
अंजुम कहती हैं, "रफ़ीक़ की शादी 6 महीने पहले हुई है. पिता बीमार है, पत्नी गर्भवती है... घर कैसे चलेगा? क्या सरकार ने ये अच्छा काम किया है? सरकार ने बाल विवाह क़ानून बनाया है तो वो इतने सालों से क्या कर रही थी."
"सरकार सो रही थी क्या? बिना नोटिस दिए सरकार कैसे किसी को घर से उठा कर ले जा सकती है. हमने कोई अन्याय नहीं किया. सरकार अन्याय कर रही है.
वे कहती हैं, "मुझे पता नहीं कि किस वजह से सरकार ने ये कार्रवाई की है."
असम के दूर-दराज़ गांवों में एक मातम भरा माहौल छाया हुआ है. अशिक्षा और गरीबी से जूझ रहे इन इलाक़ों में पीढ़ियों से चली आ रही बाल-विवाह की प्रथा नई नहीं है बल्कि काफ़ी समय से चली आ रही है.
अब असम सरकार के अभियान के तहत जब सैंकड़ों परिवारों के बेटों को गिरफ्तार कर लिया गया है तो ये लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि उनका क़सूर क्या है और क्यों ये कार्रवाई इतनी अचानक से हुई.

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'ये लोग ख़ूंखार अपराधी नहीं हैं'
असम सरकार की इस कार्रवाई से पूरे राज्य में मचे हाहाकार पर बहुत से सवाल भी उठ रहे हैं.
गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील अंगशुमन बोरा कहते हैं, "देखिए, बाल विवाह अवैध है. इसमें कोई शक़ नहीं है. साल 2006 से बाल विवाह क़ानून का जो प्रावधान है उसके मुताबिक ये एक अपराध है. लेकिन सरकार 2006 से कुछ नहीं कर रही थी."
"अचानक से इतने सालों बाद अब सरकार लोगों को गिरफ़्तार कर रही है. ये सब ग़रीब लोग हैं जिन्हें पता ही नहीं है कि इस तरह का क़ानून मौजूद है."
बोरा कहते हैं, "ये लोग ख़ूंखार अपराधी नहीं हैं. इनमें जागरूकता की कमी है लेकिन वो ख़ूंखार या आदतन अपराधी नहीं हैं जो इसी तरह के अपराध को बार-बार करेंगे. तो इन लोगों को गिरफ़्तार करने की क्या ज़रुरत थी, मुझे ये समझ में नहीं आ रहा है. सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश हैं कि गिरफ़्तारी अंतिम उपाय होना चाहिए"
इसी बीच राजनीतिक हलक़ों में इस बात की सुगबुगाहट है कि असम सरकार की कार्रवाई मुसलमानों को निशाना बना रही है.
सरकार इस बात का खंडन कर चुकी है और सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर कुल गिरफ़्तार किए गए लोगों में क़रीब 60 फ़ीसदी मुसलमान हैं तो बाकी 40 फ़ीसदी हिन्दू भी हैं.

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बीजेपी का क्या कहना है?
असम में भारतीय जनता पार्टी के नेता प्रमोद स्वामी कहते हैं, "कोई भी निर्वाचित सरकार ये नहीं देख सकती कि उनके राज्य में जो कम उम्र की बच्चियां हैं उनकी मौत बाल विवाह की वजह से हो. आज पूरे भारत में बाल विवाह का अनुपात 23 फ़ीसदी है और असम में ये अनुपात 32 फ़ीसदी है."
"ये एक चिंताजनक विषय है और जो लोग महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं उनके लिए भी ये सोचने का विषय है कि जब भी सरकार कोई सुधार लेकर आती है तो फिर उसमें वो जाति और धर्म ढूंढने लग जाते हैं."
मुकलमुआ पुलिस थाने में एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके इलाक़े में बाल-विवाह से जुड़ी 250 शिकायतें आई थी. 23 जनवरी को अभियान की घोषणा होने के बाद से अब तक 104 शिकायतें सही पाई गईं और मुक़द्दमे दर्ज किए गए.
पुलिस अधिकारी ने कहा, "इन 104 मामलों में हमने अब तक 21 लोगों को गिरफ़्तार किया है जिनमें से दो हिन्दू हैं और बाक़ी मुसलमान."
जबकि कुछ इलाक़ों में लोगों का दावा था कि कोई शिकायत न होने के बावजूद पुलिस ने स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई कर लोगों को गिरफ़्तार किया और बाद में गाँव के प्रधान को मामले में शिकायतकर्ता बना दिया.
गांव के प्रधान का कहना था कि पुलिस ने उन्हें कुछ दस्तावेज़ों पर दस्तख़त करने के लिए कहा. कागज़ पर काफ़ी कुछ अंग्रेजी में लिखा था और वो समझ भी नहीं पाए कि क्या लिखा है.
बाद में उन्हें पता चला कि उन्हें एक मामले में शिकायतकर्ता बना दिया गया है. प्रधान की पहचान छुपाने के लिए उनका नाम नहीं दिया गया है. उन्हें डर है कि अगर उनका नाम छप गया तो पुलिस बाद में उन्हें परेशान करेगी.
बीबीसी ने इन आरोपों पर बात करने के लिए असम पुलिस के आईजी (लॉ एंड आर्डर) प्रशांत कुमार भूयां से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने समय नहीं दिया.

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कैसे हो रही है अभियुक्तों की पहचान?
इन गिरफ़्तारियों को लेकर ये सवाल भी उठ रहा है कि आख़िर किस तरह पुलिस ने अभियुक्तों की पहचान की. नाम न छापने की शर्त पर कुछ पुलिस अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि इस अभियान को शुरू करने से कई महीने पहले से इसकी तैयारी शुरू कर दी गई थी.
एक पुलिस अधिकारी ने कहा, "हमने अस्पतालों में हुए प्रसव के बारे में जानकारियां इकठ्ठा की. इन जानकारियों से पता चल गया कि कितने प्रसव नाबालिग़ महिलाओं के थे. चूंकि इन महिलाओं के बारे में सारी जानकारी अस्पतालों में उपलब्ध थी तो उनके पतियों तक पहुंचना आसान हो गया."
कुछ पुलिस अधिकारियों का कहना था कि कुछ मामलों में अभियुक्तों के दस्तावेज़ों को देखकर ही साफ़ हो गया कि उन्होनें बाल-विवाह किया है.
सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि इस कार्रवाई में 2020, 2021 और 2022 में हुए बाल-विवाहों के अभियुक्तों को ही गिरफ़्तार किया जा रहा है.
क़ानूनी विशेषज्ञों की माने तो इसकी वजह ये है कि क़ानून के मुताबिक अगर बाल-विवाह होने के तीन साल के भीतर पुलिस चार्जशीट नहीं दायर करती है तो अदालतें उन मामलों में कोई कार्रवाई नहीं कर सकतीं.
क़ानून के जानकार कहते हैं कि अभी भी इस बात की संभावना है कि असम सरकार के अभियान के तहत गिरफ़्तार किए गए बहुत से अभियुक्त छूट जाएंगे क्यूंकि उनकी शादी तीन साल से ज़्यादा पुरानी है.

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गाँव दर गाँव वही कहानी
बाईहटा इलाक़े के गरका गाँव में हमने पाया कि दो हिन्दू युवकों के ख़िलाफ़ बाल विवाह का मामला दर्ज हुआ है जिनमें से एक को गिरफ्तार भी कर लिया गया है.
यहाँ के लोगों से बात करके लगा जैसे मुकलमुआ की परिजान बेग़म की कहानी गाँव दर गाँव खुद को दोहरा रही है.
सबिता बैश्य ने हमें बताया कि किस तरह देर रात पुलिस उनके घर में घुसी और उनके बेटे जयदेव के बारे में पूछने लगी. जयदेव के न मिलने पर पुलिस उनके पति को पकड़ कर ले गई. दो दिन बाद जब जयदेव पुलिस के सामने हाज़िर हुआ तभी सबिता के पति को छोड़ा गया.
सबिता बैश्य ने कहा, "अगर सरकार बाल विवाह के ख़िलाफ़ पहले से ही कार्रवाई करती तो कोई बाल-विवाह करता ही नहीं. बेटे की कमाई से ही घर चलता है."
"बहू आठ महीने के गर्भ से है. अगर उसे कुछ हो गया तो कौन ज़िम्मेदार होगा. मैं कुछ नहीं जानती. मुझे मेरा बेटा चाहिए. बेटे के बिना घर कैसे चलेगा?"
जयदेव की नाबालिग गर्भवती पत्नी हमसे बात करते हुए अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई. उन्होंने कहा, "एक पत्नी से अगर उसके पति को अलग कर दिया जाए तो कैसा लगता है ये बात सरकार नहीं समझ सकती."
"मैं बहुत परेशान हूँ. मेरे पति को छोड़ दिया जाए. अगर पहले से पता होता कि ऐसा होगा तो हम शादी नहीं करते. मैं यही सोचती रहती हूँ कि मेरा पति कब वापस आएगा."
जहां एक तरफ सरकार से जुड़े लोग इस कार्रवाई को न्यायोचित ठहरा रहे हैं वहीं इस बात पर भी बहस हो रही है कि क्या बाल-विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के लिए क़ानूनी सख़्ती की बजाय सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की कोशिश से निपटा जाना चाहिए था.
भाजपा नेता प्रमोद स्वामी कहते हैं, "सामाजिक जागरूकता की ज़रूरत है लेकिन देश तो संविधान और क़ानून से चलेगा. तो देश में जो संविधान और क़ानून है क्या उसका पालन नहीं किया जाना चाहिए?"
"इसका मतलब तो ये हो जायेगा कि अगर देश में कोई हत्या करता है तो उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, कोई क़ानून ही नहीं होना चाहिए. तो जब देश में एक क़ानून है और सरकार उसका पालन करती है तो उस पर इतनी हाय तौबा मचाने की तो कोई आवश्यकता नहीं है."
इस बात में कोई दो राय नहीं कि इस मामले में असम सरकार मौजूदा क़ानूनों को ही लागू कर रही है. सवाल ये है कि क्या बाल विवाह की समस्या से निपटने का यही एक रास्ता था?
वकील अंगशुमन बोरा कहते हैं, "मुझे लगता है ये ज़रूरी नहीं था. वो जो सन्देश देना चाहते थे, वो सन्देश अलग तरीक़ों से लोगों को गिरफ्तार किए बिना दिया जा सकता था. क़ानून समाज के लिए है. समाज क़ानून के लिए नहीं है."
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले ही कह चुके हैं कि ये अभियान साल 2026 तक चलेगा. चूँकि असम विधानसभा का अगला चुनाव साल 2026 में होना है, इसलिए सरकार के आलोचक इस कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित मान रहे हैं.
वहीँ इस सब के बीच असम के बेहद वंचित और आर्थिक रूप से कमज़ोर हज़ारों डरे सहमे परिवार बस इसी उम्मीद में जी रहे हैं कि उनके उजड़े हुए घर फिर एक बार बस जाएँ और उनके बेटे किसी तरह उन्हें वापस मिल जाएं.
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