भारत के आम बेहतर हैं या पाकिस्तान के?

नियाज़ फ़ारूक़ी और तरहब असग़र

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली और मुल्तान से

आम
इमेज कैप्शन, आम का निर्यात भारत और पाकिस्तान दोनों करते हैं

आम भारत के मलीहाबाद का अच्छा है या पाकिस्तान के शहर मुल्तान का? यह सवाल अक्सर विदेश में रहने वालों के लिए 'विराट कोहली बेहतर हैं या बाबर आज़म' जैसी बहस में बदल जाता है.

दक्षिण एशिया के ये दोनों ही देश आम के लिए मशहूर हैं. दुनिया का चालीस प्रतिशत आम भारत में होता है लेकिन निर्यात के मामले में पाकिस्तान और भारत लगभग बराबर हैं.

ऐसे में फलों का राजा कहलाने वाले इस फल की खेती के बारे में भारत और पाकिस्तान दोनों में से कौन आगे है, इस बहस में पड़ने से पहले हमने दोनों देशों के किसानों से बात करके यह जानने की कोशिश की है कि उनके आम की ख़ास बात क्या है.

आमों की चाहत के लिए मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने एक बार कहा था कि आमों में बस दो ख़ूबियां होनी चाहिए; एक तो वो मीठे हों और ढेर सारे हों.

लेकिन भारत के 'मैंगो मैन' कलीमुल्ला ख़ान इसमें इस जुमले का इज़ाफ़ा करते हैं, "इसकी बहुत सारी क़िस्में भी होनी चाहिए" क्योंकि मलीहाबाद में वे इसी वजह से मशहूर हैं.

आम अलग-अलग किस्में उगाने के लिए मशहूर कलीमुल्ला ख़ान कहते हैं कि चौसा, दसहरी और लंगड़ा जैसे मशहूर आमों के आगे भी दुनिया है.

इसके बाद वे नाम गिनाने शुरू कर देते हैं. 'ख़ासुलख़ास, गुलाबख़ास, शम्सुल अस्मार, बदरुल अस्मार, महमूदुल अस्मार, अमीन कलां, अमीन ख़ुर्द, सोरख़ा ख़ालिसपुर, सोरख़ा मुर्शिदाबाद, सोरख़ा शाहाबाद, कच्चा मीठा, गोल भदैयां, रामकेला, फ़जरी, हुस्नआरा, रटौल, जर्दालु, बेगमपसंद, गुलाबजामुन…'

दूसरी ओर, पाकिस्तान के शहर मुल्तान के किसान सोहैल ख़ान बाबर मज़ाक़ करते हुए कहते हैं कि लोग मुल्तान वालों से दोस्ती ही इसलिए करते हैं क्योंकि यहां के आम मशहूर हैं.

आइए, पहले मलीहाबाद चलते हैं और भारत के आमों के बारे में 'मैंगो मैन' से जानते हैं.

कलीमुल्ला ख़ान
इमेज कैप्शन, कलीमुल्ला ख़ान अपने आमों की ख़ासियत के बारे में विस्तार से बताते हैं

आम की तीन सौ से ज़्यादा क़िस्मों वाला पेड़

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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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कई हफ़्तों तक उतार-चढ़ाव वाले मौसम के बाद उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद में आख़िरकार बारिश 'मैंगो मैन' कलीमुल्लाह ख़ान के चेहरे पर ख़ुशी लेकर आई है.

आम के लिए पारंपरिक तौर पर मशहूर इस क्षेत्र में इस साल जाड़े में असामान्य तौर पर गर्मी, गर्मी में असामान्य तौर पर सर्दी और इस दौरान असमय वर्षा ने फलों के राजा की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है.

कलीमुल्ला कहते हैं, "1919 में मलीहाबाद में आम की 1300 क़िस्में थीं लेकिन अब पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में शायद 600 क़िस्में भी नहीं बची हैं और यह नंबर हर दिन कम हो रहा है."

इस बदलाव से बुज़ुर्ग कलीम ख़ान चिंतित नज़र आते हैं लेकिन वह आम के अपने एक प्रायोगिक पेड़ से इस कमी की भरपाई करने की कोशिश कर रहे हैं जिसके बारे में उनका कहना है कि इस पर उन्होंने आम की 300 से अधिक क़िस्में पैदा की हैं.

यह पेड़ 120 साल से अधिक पुराना है और क़लीम खान की ग्राफ़्टिंग (क़लम लगाना) के प्रयोगों की वजह से उसकी लगभग हर टहनी परअलग-अलग प्रकार के आम फलते हैं. वह बताते हैं, "मौसम की वजह से आम की पैदावार प्रभावित होने के बावजूद इस पेड़ पर इस साल 30 सेअधिक प्रकार के आम हुए हैं."

और यह सारे आम एक ही पेड़ पर अलग साइज़, रंग और शक्ल के हैं जिसकी वजह से यह सजावटी और कृत्रिम पेड़ जैसा दिखता है लेकिन असल में यह पेड़ लोगों के स्वाद को बेहतर बनाने में लगे एक व्यक्ति के जुनून की मिसाल है.

इस पेड़ के मूल आम का नाम 'असरारुल मुकर्रर' है. इसके बारे में कलीम ख़ान कहते हैं कि यह एक पेड़ भी है, बाग़ भी और यह दुनिया के आमों का कॉलेज भी है.

उन्हें उम्मीद है कि उनके प्रयोग आने वाली पीढ़ियों के काम आएंगे.

लेकिन इस 'कॉलेज' के 'प्रिंसिपल' अब 83 साल के हो चुके हैं और रिटायरमेंट की कगार पर हैं लेकिन दूरदराज़ से हर पल उनकी नर्सरी में कोई-न-कोई आमों को चाहने वाला आता है और उनकी 'आम यात्रा' के बारे में सवाल करता है.

कलीम ख़ान आम के बारे में अपने पहले प्रयोग को याद करते हुए बताते हैं कि वह प्रयोग नाकाम हो गया था और जहां पर उन्होंने अपना पहला पेड़ लगाया था वह जगह अब भी ख़ाली है, एक तरह से कह सकते हैं कि वह जगह दाग़दार हो गई.

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इमेज कैप्शन, बेमौसम की आंधी और बारिश से तबाह आम की फ़सल

पाकिस्तान का आम मीठा, भारत का रसदार और ख़ुशबू वाला

कलीम ख़ान की नर्सरी में पाकिस्तान में पाए जाने वाले आम के प्रकार भी मौजूद हैं जिनमें अनवर रटौल, चौसा और लंगड़ा मशहूर हैं.

वह बताते हैं कि पाकिस्तान के सिंधड़ी आम की प्रशंसा सुनने के बाद उन्होंने यह क़िस्म भी वहां से मंगवाकर लगाई है.

लेकिन दोनों देशों के संबंध आम लोगों के बीच हर तरह के लेनदेन को को लेकर सही नहीं हैं, ऐसे में उनके लिए यह पुष्टि करना मुश्किल था कि क्या वह आम निश्चित तौर पर सिंधड़ी ही है.

इसके लिए उन्होंने लोगों से फ़ोन पर जानकारी ली, इंटरनेट पर अध्ययन किया और यूट्यूब पर वीडियोज़ देखीं कि सिंधड़ी आम कैसा दिखता है और उसका ज़ायक़ा कैसा है.

कलीम ख़ान के बेटे नाज़िम कहते हैं, "यह हमारी साख का मामला है. हम इसमें ग़लती नहीं कर सकते."

लेकिन जलवायु परिवर्तन, हानिकारक केमिकल और महंगाई जैसे कारणों के साथ-साथ जैसे-जैसे पीढ़ी दर पीढ़ी बाग़ों के क्षेत्रफल में कमी और दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी हो रही है किसानों की नई पीढ़ी कमाई के दूसरे तरीक़े अपनाने पर मजबूर हो रही है.

नाज़िम कहते हैं कि आम के लिए हर वक़्त लगन की ज़रूरत होती है लेकिन कमाई का कोई ठिकाना नहीं रहता. "यह नई पीढ़ी को नहीं भाता है."

वह कहते हैं कि पाकिस्तान का आम मिठास के हिसाब से तो बेहतर है लेकिन ख़ुशबू और रस में भारत का आम ही बेहतर है.

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इमेज कैप्शन, मंडियों में इस बार आम पहले के मुकाबले कम हैं

पाकिस्तानी आम की विशेषताएँ क्या हैं?

पाकिस्तानी आम की बात करें तो जानने के लिए सीधा मुल्तान जाना ही बेहतर है.

मुल्तान मैंगो रिसर्च सेंटर के प्रिंसिपल वैज्ञानिक अब्दुल ग़फ़्फ़ार ग्रेवाल के अनुसार पाकिस्तानी आम दुनिया भर के आमों से स्वाद और रंग-रूप मेंअलग होता है.

वह कहते हैं, "वैसे तो पाकिस्तान और भारत में एक जैसी ही क़िस्में पाई जाती हैं लेकिन पाकिस्तान ने पिछले कुछ अर्से में कई नई क़िस्में पैदा कर ली हैं जैसे कि सेंसेशन या चिनाब गोल्ड जबकि भारत अपनी पुरानी क़िस्मों पर ही और काम कर रहा है."

वह बताते हैं कि पाकिस्तान में लगभग 200 प्रकार के आम पाए जाते हैं जबकि कमर्शियल इस्तेमाल में अमूमन दस प्रकार के ही आम हैं.

उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के दो राज्यों- पंजाब और सिंध में ही आम की पैदावार होती है. पाकिस्तान का सत्तर प्रतिशत आम पंजाब से और तीस प्रतिशत आम सिंध से आता है.

"पंजाब के जिस क्षेत्र में आम की उपज होती है वह लगभग 470 किलोमीटर में फैला हुआ है जिसमें रहीमयार ख़ान, मुल्तान और बहावलपुर के इर्द-गिर्द के क्षेत्र शामिल हैं."

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इमेज कैप्शन, आम की फ़सल को बहुत देखरेख की ज़रूरत होती है

पाकिस्तानी किसान आम की पैदावार में क्या नया कर रहे हैं?

सोहैल ख़ान बाबर मुल्तान के रहने वाले हैं और पंद्रह साल की उम्र से अपने आम के बाग़ों की देखभाल कर रहे हैं. उनको यह काम करते हुए लगभग पचास साल हो गए हैं.

"आम के बाग़ को संभालना ऐसा ही है जैसे आप अपने बेटे को पालते हैं. आम को पेड़ से उतारना भी एक कला है. अगर थोड़ा ज़ोर से उतार कर नीचे रखोगे तो इस पर चोट आ जाती है और यह काला पड़ जाता है."

सोहैल ख़ान के बाग़ों में दस से पंद्रह प्रकार के आम हैं जिनमें चौसा, अनवर रटौल और सिंधड़ी समेत दूसरे प्रकार शामिल हैं.

उनके बाग़ों में कई ऐसे पेड़ भी हैं जो चालीस साल पुराने हैं जबकि उन्होंने कई ऐसे पुराने आम के पेड़ काटे हैं जो बहुत बड़े हो गए थे. ऐसे में यह सवाल बनता था कि उन्होंने यह क़दम क्यों उठाया?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि वह यूएचडी टेक्नोलॉजी की ओर चले गए हैं.

"पहले आम के पेड़ उगाने और फिर उस पर फल लगने में पांच से छह बरस लगते थे लेकिन अब वही आम का पेड़ तीन साल में आपको उतने ही आम की उपज देता है जितना बड़ा पेड़ देता है. यही नहीं बल्कि उन पेड़ों का साइज़ भी छोटा होता है."

सोहैल ख़ान ऐसे अकेले किसान नहीं जो नए और आधुनिक ढंग से आम की उपज बढ़ा रहे हैं.

ग़ुलाम क़ादिर जलालपुर पीरवाला से संबंध रखते हैं और वह भी ऐसे आम उगाने की कोशिश करते हैं जिनकी पैदावार में कम-से-कम खाद और दूसरे केमिकल इस्तेमाल हों.

वह यह दावा भी करते हैं कि पिछले तीन साल में उन्होंने जो आम अपने बाग़ में उगाए हैं वे ऑर्गेनिक हैं.

उन्होंने बताया कि वह न तो खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं और न ही पानी का ज़्यादा इस्तेमाल करने की ज़रूरत हो रही है. "पहले यह होता था कि हम पेड़ को पानी देते थे जो उसके आसपास जमा हो जाता था जिससे पेड़ ज़रूरत से ज़्यादा पानी सोखता था. इससे फल पर भी ख़राब असर पड़ता था और पानी जमा होने की वजह से काई भी लग जाती थी."

"अब हम पेड़ के चारों तरफ़ मिट्टी से घेरा बना देते हैं जिससे वहां पानी जमा नहीं होता. इससे फल का भी नुक़सान नहीं होता."

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान का सिंधड़ी आम दुनिया भर में एक्सपोर्ट होता है

पाकिस्तान की 'मैंगो डिप्लोमेसी'

आजकल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ के अधिकतर विदेशी दौरों के जो वीडियो सामने आए हैं उनमें वह दूसरे देशों के प्रमुखों से अक्सर यह कहते पाए गए हैं, "मैं आपके लिए पाकिस्तान के बेहतरीन आम लाया हूँ."

उनके इस काम को अधिकतर लोग 'मैंगो-डिप्लोमेसी' का नाम दे रहे हैं.

क्या शाहबाज़ शरीफ़ पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हैं जो दूसरे देशों से अच्छे संबंध बनाने के लिए आम का तोहफ़ा दे रहे हैं?

वास्तव में 1968 में उस समय के पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने अपने चीन के दौरे के दौरान चेयरमैन माओ को पाकिस्तानी आम पेश किए थे. चीनी नेता ने उस तोहफ़े को इतिहास में असाधारण बना दिया था.

हुआ यह कि उन दिनों चीन में सांस्कृतिक क्रांति का आंदोलन चल रहा था और माओ ने यह फल खुद खाने की बजाय अपने कार्यकर्ताओं को भिजवा दिए जिन्होंने उसे विशेष फल समझकर सुरक्षित कर लिया था.

चीन का परिचय आम से कराने वाला पाकिस्तान आज इस फल के उत्पादन में चीन से पिछड़ चुका है, दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश भारत है, चीन चौथे और पाकिस्तान पाँचवे नंबर पर है.

आम के बाग़ के मालिक ग़ुलाम क़ादिर अधिकतर आम निर्यात करते हैं. उन्होंने बताया पाकिस्तान में पाया जाने वाला सबसे अच्छा आम अधिकतर पाकिस्तान से बाहर भेजा जाता है. इसकी क़ीमत भी पाकिस्तान में मिलने वाले आमों से अधिक होती है.

"जिन देशों में हमारे आम सबसे अधिक बिकते हैं उनमें ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, अफ़ग़ानिस्तान, चीन और यूरोप समेत दूसरे देश शामिल हैं."

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