हाइपरटेंशन और नमक, कितना ख़तरनाक है ये रिश्ता

नमक, खाना

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    • Author, जेसिका ब्राउन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

पिछले साल तुर्की के शेफ़ नुसरत गोक्से का एक वीडियो ज़बरदस्त वायरल हो गया था. स्टीक (मांस का टुकड़ा) पर नमक छिड़कने का अंदाज़ इस वीडियो के वायरल होने की वजह था.

नमक को लेकर इंसान की ये दीवानगी नई नहीं है. तमाम चेतावनियों के बावजूद पूरी दुनिया भरपूर नमक खाती है. कई बार तो ये नुक़सानदेह होने की हद के पार भी जाता है.

अब नमक को लेकर नए तर्क गढ़े जा रहे हैं. बरसों के शोध को चुनौती दी जा रही है. कहा जा रहा है कि नमक कोई विलेन नहीं, जिसे हमें अपने खाने से मिटा देना है. बल्कि ये ज़रूरी है हमारी सेहत के लिए.

नमक में सबसे अहम तत्व होता है सोडियम. ये हमारे शरीर के लिए बहुत ज़रूरी है. सोडियम इंसान के शरीर में पानी का सही स्तर बनाने से लेकर ऑक्सीजन और दूसरे पोषक तत्व सभी अंगों तक पहुंचाने के काम में मददगार होता है. यही नहीं, सोडियम हमारी तंत्रिकाओं में बिजली सी फुर्ती डालता है. लेकिन, ऐतिहासिक रूप से नमक को कम से कम खाने की सलाह दी जाती रही है.

हिंदुस्तान में व्रत के आहार को नमक के बग़ैर बनाया जाता है. कहा जाता है कि ये तामसी भोजन का हिस्सा होता है. भारत में बहुत से लोग होंगे, जो बिना नमक का खाना खाते हैं. लेकिन, ये मिसालें सीमित हैं. हम सदियों से ख़ूब नमक खाते आए हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय किए हुए मानक से कई गुना ज़्यादा नमक खाते हैं हम. सरकारों की तमाम कोशिशें, नमक की खपत को कम करने में नाकाम रही हैं.

गाइडलाइन्स के मुताबिक़, किसी भी इंसान को दिन भर में छह ग्राम से ज़्यादा नमक नहीं खाना चाहिए. ब्रिटेन में हर नागरिक औसतन 8 ग्राम नमक रोज़ाना इस्तेमाल करता है. वहीं, अमरीका में ये तादाद 8.5 ग्राम है. ऑस्ट्रेलिया के जॉर्ज इंस्टीट्यूट ऑफ़ ग्लोबल हेल्थ के मुताबिक़ औसत भारतीय रोज़ाना क़रीब 11 ग्राम नमक इस्तेमाल करता है, जोकि तय मानक से क़रीब-क़रीब दोगुना ज़्यादा है.

होता यूं है कि हम अपने खाने में जो ख़ुद से मिलाकर नमक खाते हैं, उतना तो खाते ही हैं. बाज़ार से आने वाली तमाम चीज़ों में तय मानक से कहीं ज़्यादा नमक मिला होता है. ब्रेड, सूप और अनाजों में नमक मिला होता है.

दिक़्क़त तब और बढ़ जाती है, जब डिब्बाबंद उत्पादों में नमक के बजाय सोडियम की तादाद लिखी होती है. इससे यूं लगता है कि हम कम नमक खा रहे हैं, जबकि हक़ीक़त इसके उलट होती है. नमक में सोडियम भी होता है और क्लोराइड के आयन्स भी. 2.5 ग्राम नमक में 1 ग्राम सोडियम होता है. मगर, लोग सोडियम को ही नमक की तादाद समझ बैठते हैं.

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क्या कहता है शोध

रिसर्च से ये बात कई बार साबित हुई है कि ज़्यादा नमक खाने से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. इससे दिल का दौरा पड़ने से लेकर दिल की दूसरी और बीमारियां होने का अंदेशा बढ़ जाता है. ज़्यादातर जानकार नमक के नुक़सान को लेकर एकमत हैं. जब हम ज़्यादा नमक खाते हैं, तो हमारे शरीर में पानी ज़्यादा जमा हो जाता है. इसका दबाव गुर्दों पर पड़ता है. उन्हें ये पानी साफ़ करने के लिए ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. लंबे वक़्त तक ऐसा होते रहने पर ज़्यादा दिनों तक ब्लड प्रेशर बढ़ने की शिकायत होती है. इसे हाइपरटेंशन कहते हैं.

दिल के दौरों के 62 फ़ीसद मामलों की बड़ी वजह ये हाइपरटेंशन ही होती है. दिल की नलियों के जाम होने की 49 प्रतिशत बीमारियों का कारण भी हाइपरटेंशन होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, भारत में 23 फ़ीसद लोग कार्डियोवैस्कुलर यानी दिल और धमनियों की बीमारियों से मरते हैं.

तय मानक से पांच ग्राम ज़्यादा नमक रोज़ाना खाने पर दिल और धमनियों की बीमारी का खतरा 17 प्रतिशत बढ़ जाता है. वहीं, दिल का दौरा पड़ने की आशंका 23 फ़ीसद बढ़ जाती है.

रिसर्च से ये भी पता चला है कि नमक खाने की मात्रा घटाने से ब्लड प्रेशर की दिक़्क़त कम हो जाती है. रोज़ 1.4 ग्राम नमक कम खाने से ब्लड प्रेशर बढ़ने की शिकायत 42 फ़ीसद तक कम हो जाती है. ख़तरनाक दिल के दौरों की तादाद भी 40 प्रतिशत तक घट जाती है.

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रिसर्च पर मतभेद

मगर ऐसे रिसर्च के साथ दिक़्क़त ये है कि पक्के तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि ब्लड प्रेशर या दिल के दौरों की आशंका में ये कमी सिर्फ़ नमक खाना कम करने से आई. जो लोग नमक कम खाते हैं, वो आम तौर पर सेहत को लेकर सजग रहने वाले लोग होते हैं. वो नियमित रूप से वर्ज़िश करते हैं. धूम्रपान या शराब नहीं पीते. पीते हैं तो बहुत कम.

ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सिटी के फ्रांसेस्को कैप्पुचियो कहते हैं कि ऐसे गिने-चुने तजुर्बों के आधार पर नमक के शरीर पर सीधे असर का आकलन मुमकिन नहीं.

पर, इस तरह तो मोटापे और धूम्रपान से जुड़े रिसर्च भी नहीं हैं, जो निश्चित रूप से लोगों की मौत का कारण होते हैं.

1960 के दशक में जापान की सरकार ने लोगों से कम नमक खाने की अपील का बड़ा अभियान छेड़ा. अभियान के चलते जापान के लोगों के औसत नमक खाने की तादाद 13.5 ग्राम से घटकर 12 ग्राम प्रतिदिन रह गई. इस दौरान दिल का दौरा पड़ने से मौत और ब्लड प्रेशर की शिकायतों में 80 प्रतिशत तक की कमी आई.

फिनलैंड में रोज़ के नमक की खपत 1970 के दशक में 12 ग्राम थी, जो 2002 में घटकर 9 ग्राम रोज़ाना रह गई. इसका नतीजा ये हुआ कि दिल का दौरा पड़ने समेत दिल की दूसरी बीमारियों में 80 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज हुई.

इस रिसर्च को हर इंसान के लिए सही ठहराना संभव नहीं. वजह ये है कि हर व्यक्ति पर नमक का असर अलग-अलग होता है. ज़ाति, धर्म, समुदाय, उम्र और बॉडी मास इंडेक्स के हिसाब से हर इंसान पर नमक का असर अलग होता है. इसमें हाइपरटेंशन का पारिवारिक इतिहास भी अहम रोल निभाता है.

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नमक कम खाने से नुकसान

अब तो बहुत से वैज्ञानिक ये भी कह रहे हैं कि बहुत कम नमक खाने से भी ब्लड प्रेशर की शिकायत हो सकती है. ऐसे लोगों का कहना है कि रोज़ 5.6 ग्राम से कम नमक खाना भी दिल के दौरे की वजह बन सकता है. इसका सेहत पर बुरा असर पड़ना तय है.

एक लाख 70 हजार लोगों पर किए गए रिसर्च के मुताबिक़, प्रतिदिन 7.5 ग्राम से कम नमक खाने से दिल की बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है. वहीं 12.5 ग्राम नमक रोज़ खाने से ये हालात बेहतर हो जाते हैं. जबकि ब्रिटेन में ये तय मानक से दोगुना नमक है.

कम नमक के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाली इस रिसर्च के अगुवा एंड्र्यू मेंते, ओंटैरियो यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. वो ये कहते हैं कि कम नमक खाने से ब्लड प्रेशर की शिकायत होने की आशंका तो कम होती है लेकिन इससे सेहत को सीधा कोई फ़ायदा नहीं होता.

एंड्र्यू मेंते कहते हैं कि बहुत ज़्यादा या बहुत कम नमक खाने के बजाय हमें बीच का रास्ता चुनना होगा. ज़्यादा नमक भी ज़हर है और कम नमक भी नुक़सानदेह. यानी रास्ता बीच का ही बचता है.

लेकिन, एंड्र्यू मेंते की बात से सभी सहमत नहीं हैं. वारविक यूनिवर्सिटी के कैप्पुचियो कहते हैं कि नमक कम खाने से ब्लड प्रेशर कम होता है. वो ज़्यादा नमक खाने की वक़ालत करने वालों की रिसर्च को अधकचरी बताते हैं.

ब्रिटिश न्यूट्रिशन फाउंडेशन की सदस्य सारा स्टैनर कहती हैं कि नमक की मात्रा कम करने से ब्लड प्रेशर से लेकर दिल के दौरे तक की दिक़्क़त कम होती है. ऐसे बहुत ही कम लोग होंगे, जो 3 ग्राम से भी कम नमक रोज़ाना खाते होंगे. ये तादाद ही ख़तरे की निशानी है.

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बाहर के खाने से दिक्कत

सारा स्टैनर कहती हैं कि आज की तारीख़ में इतना कम नमक खाना नामुमकिन सा है. क्योंकि हम बहुत सारी चीज़ें बाहर से ख़रीदकर खाते हैं, जिसमें काफ़ी नमक होता है. ज़रूरत इस बात की है कि बाज़ार में बिकने वाले खाने-पीने के सामान में नमक की तादाद घटाई जाए.

जानकारों की राय इस बात पर भी बंटी है कि ज़्यादा नमक खाने के बाद उसे वर्ज़िश या नियमित रूप से एक्सरसाइज़ कर के घटाया जा सकता है.

सारा स्टैनर कहती हैं कि हरी सब्ज़ियों, फलों, मेवों और दूध से बने उत्पाद खाकर भी नमक के बुरे असर को कम किया जा सकता है क्योंकि इनमें पोटैशियम होता है.

लैंकैस्टर यूनिवर्सिटी के स्यू मेटियस कहते हैं कि हमें डिब्बाबंद और पैकेटबंद सामान में होने वाले नमक की फिक्र ज़्यादा करनी होगी. जो नमक हम ख़ुद से डाल कर खाते हैं, वो बहुत कम होता है. रोज़मर्रा की हमारी ज़रूरतों को पूरी करता है.

स्यू मैटियस कहते हैं, ''बहुत ज़्यादा या बहुत कम नमक खाना, दोनों ही हमारे लिए ठीक नहीं.''

मैटियस सलाह देते हैं, ''ज़्यादा नमक नुक़सान करता है पर इसे खाने से पूरी तरह से परहेज़ भी ठीक नहीं.''

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(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी कैपिटल के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं. )

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