कोई जोड़ा कैसे बनता है 'दो जिस्म एक जान'?

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- Author, क्रिस्चियन जैरेट
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
यूं तो क़ुदरत का विधान ये है कि तमाम जीव अपने पूरे जीवन चक्र में कई साथियों के साथ यौन संबंध बनाते हैं. लेकिन, बहुत सी प्रजातियां ऐसी भी हैं, जो एक साथी के प्रति वफ़ादार होती हैं. जैसे चिचाइल्ड मछली. या फिर कोकाटिएल पक्षी.
इन जीवों के संबंध की बारीक़ी से पड़ताल करें, तो, पता ये चलता है कि ये जीव ऐसे साथी चुनते हैं, जिनसे उनका मिज़ाज बहुत मिलता है. तभी वो जीवनभर का साथ निभा पाते हैं.
इंसान से भी ऐसी ही उम्मीद की जाती है कि वो एक साथी के प्रति वफ़ादार रहे. ऐसा तभी मुमकिन है, जब साथी का मिज़ाज उनसे मेल खाये.
बरसों से मनोवैज्ञानिक कहते आए हैं कि अगर दो लोगों के बीच समानता हो, तो संबंध ज़्यादा स्थायी होता है. क्योंकि तब दो लोग साथ रहते हुए अपनी पसंद की फ़िल्में देखेंगे. खान-पान को लेकर मतभेद नहीं होंगे. पसंद-नापसंद का झगड़ा नहीं होगा.
ये विचार जितना सहज है, व्यवहार में उतना ही नामुमकिन. रिसर्च से ये बात साबित करना बहुत मुश्किल काम है.
पर, अब शायद नीदरलैंड की एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने रिसर्च से ये पता लगाया है कि समान बर्ताव किस तरह से रिश्तों को मज़बूती देता है.

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एक जैसा मिज़ाज
वैसे, ये रिसर्च सिर्फ़ एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी ने किया हो, ऐसा भी नहीं है. हाल में कई ऐसे रिसर्च हुए हैं, जिनसे ये साबित होता है कि एक जैसे मिज़ाज वाले जीवनसाथी हों तो ज़िंदगी और रिश्ते में स्थायित्व रहता है.
अब जैसे कि आप सुबह उठने की आदत वाले हैं. और आप का साथी 'नाइट आउल' यानी रतजगा करने वाला. तो, ज़ाहिर है झगड़े होंगे ही. आप चाहेंगे कि आपका जीवनसाथी सुबह उठे. साथ में चाय पिए और गप्पें लड़ाए. मगर, ठीक उसी वक़्त वो गहरी नींद में होगा.
इसी तरह, अगर आप की विचारधारा राष्ट्रवादी है और आपके साथी की सोच भी वैसी है, तो घर में राजनीति को लेकर बहसें कम होंगी.
जब आप एक जैसे मिज़ाज के साथी के साथ रहते हैं, तो दोनों की साझा पहचान विकसित होती है.
सवाल ये उठता है कि क्या किसी भी जोड़े का हर गुण, पसंद-नापसंद एक जैसी हो, तभी रिश्ता मज़बूत होता है?

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एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी की मैनन वान शेपिन्जेन और उनकी टीम ने ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की. उन्होंने ये जानने का प्रयास किया कि क्या कुछ ख़ास गुण, साझा पहचान विकसित करने में मददगार होते हैं, या फिर, पूरे किरदार में ही मेल होना ज़रूरी है?
अब जैसे कि अगर दोनों जीवनसाथी ईमानदार हैं, तो एक-दूसरे के साथ रहने में आसानी होगी. पर, अगर कोई साथी ईमानदारी को लेकर लापरवाह है. तो, दूसरा साथी अगर पक्का ईमानदार है, तो वो अपने जीवनसाथी के किरदार की कमी दूर करेगा. संतुलन बनाकर रखेगा.
शेपिन्जेन और उनकी टीम ने अमरीका के हज़ारों दंपत्तियों की ज़िंदगी की पड़ताल की. उनकी पसंद-नापसंद और सियासी झुकाव को परखा.
रिसर्च से ये बात सामने आई कि जीवनसाथी के मिज़ाज का सीधा असर पड़ता है. अगर कोई जोड़ा एक-दूसरे की बात से अक्सर सहमत रहता है, साफगोई पसंद है, झिक-झिक कम करता है, तो वो ज़्यादा ख़ुश रहेंगे.

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कभी-कभी नहीं बनती बात
लेकिन, ये कहानी का एक ही पहलू है.
रिसर्च से पता चला कि अगर जोड़ा परफेक्ट मैच है, तो बात उतनी मज़ेदार नहीं. अब अगर दोनों जीवनसाथी घुमंतू हैं. बाहरी लोगों से मेल-जोल में यक़ीन रखते हैं, तो बात नहीं बनने वाली. इनमें से एक का कम बहिर्मुखी होना ही फ़ायदेमंद होगा.
यही बात काम के प्रति ईमानदारी को लेकर है. अगर मर्द और औरत दोनों का कर्तव्यनिष्ठा का भाव एक जैसा है, तो टकराव होगा. थोड़ा कम-ज़्यादा होने से टकराव की आशंका कम होगी.
हां, अगर किसी जोड़े में नए विचारों को लेकर खुलापन एक जैसा ही है, तो बात फ़ायदे की होती है. फिर दोनों नए तजुर्बे करने से नहीं झिझकते.
मिज़ाज का खुलापन इसलिए काम आता है कि इससे राजनैतिक विचारधाराओं का टकराव नहीं होता. लोग तरक़्क़ीपसंद हो जाते हैं. झगड़े कम होते हैं.
जर्मनी की जीसिस लीबनिज़ यूनिवर्सिटी में भी रिश्तों में समानता के असर को लेकर रिसर्च हुई. इसे बीट्रिस रैमस्टेड ने किया. जर्मनी के पांच हज़ार जोड़ों की ज़िंदगी की निगरानी की गई. नतीजा ये निकला कि जिस जोड़े के मिज़ाज में समानता होती है, वो ज़्यादा स्थायी रिश्ता बनाते हैं.
सिर्फ़ यही नहीं कई और रिसर्च से ये पता चला है कि अगर महिलाओं की सोच अपने साथियों जैसी खुले ज़हन की है, तो इसका फ़ायदा महिलाओं को होता है.

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दो जिस्म एक जान
पोलैंड की वारसॉ यूनिवर्सिटी में भी ऐसी ही एक रिसर्च हुई. जिसमें पाया गया कि अगर महिलाएं और पुरुष एक जैसे मिज़ाज के होते हैं, तो महिलाएं ज़्यादा ख़ुश होती हैं, जैसे कि अगर दोनों सुबह उठने वाले होते हैं, तो उनकी ज़िंदगी ज़्यादा ख़ुशनुमा होती है.
यही बात सेक्स के मामले में भी पायी गई. समान ख़यालात होने पर यौन संतुष्टि ज़्यादा मिलने की बात देखी गई है.
एक और रिसर्च के मुताबिक़ अगर किसी दंपति की राजनीतिक सोच मिलती है, तो उनके बीच झगड़े बहुत कम हो जाते हैं. वो ख़ुले ज़हन के होते हैं.
मिज़ाज का मेल होने पर कोई भी जोड़ा मानो दो जिस्म एक जान बन जाता है. वो एक दूसरे पर भरोसा करते हैं. उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में उठा-पटक कम होती है.
एक जैसा मिज़ाज और एक जैसे जीवन मूल्य होने पर जीवनसाथी को लगता है कि वो एक-दूसरे के प्रतिबिंब हैं. एक-दूसरे में समाए हुए एक ही इंसान हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि जीवनसाथी का मिज़ाज अगर ख़ुद से मिले, तो शानदार होगा.
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