अंटार्कटिका में मिलीं 175 साल पुरानी हड्डियों की कहानी

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- Author, मार्था हैनरिकेज़
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर के लिए
अंटार्कटिका को दुनिया का आख़िरी कोना कहा जाता है. ये ऐसा इलाक़ा हैं जहाँ हदे-निगाह तक सिर्फ़ बर्फ़ नज़र आती है.
इस महाद्वीप पर इंसान का रह पाना बहुत मुश्किल है. लेकिन हैरत की बात ये है कि यहाँ की बर्फ़ में इंसानों के कुछ अवशेष मिले हैं जो अपने पास कई राज़ छुपाये हुए हैं.
इस मुश्किल जगह पर बहुत से वैज्ञानिक और खोजकर्ता पहुँचे, लेकिन उनमें से बहुतों के शव तक नहीं मिले. उनकी मौत एक रहस्य ही बनी रही.
अंटार्कटिका पर लिविंगस्टन नाम का एक द्वीप है. यहाँ साल 1980 में चिली के खोजकर्ताओं को एक महिला की खोपड़ी और जांघ की हड्डी मिली जो कि 175 साल पुरानी है.
ये एक दावा है कि वो महिला चिली की स्थानीय निवासी थी. इसकी मौत 21 साल की उम्र में साल 1819 से 1825 के दरमियान हुई थी.
बताया जा रहा है कि अंटार्कटिका पर ये अब तक का सबसे पुराना इंसानी अवशेष है.

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समुद्री खोजकर्ता
जिस जगह पर इस महिला के अवशेष मिले हैं, वो दक्षिणी चिली से क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर है.
सवाल ये उठता है कि आख़िर वो महिला यहाँ तक पहुंची कैसे. क्योंकि डोंगियों के ज़रिए इतना लंबा सफ़र तय करना संभव नहीं है.
चिली के खोजकर्ता विलियम स्मिथ का कहना है कि उत्तरी गोलार्ध से अंटार्कटिका आने वाले समुद्री खोजकर्ताओं के लिए ये महिला स्थानीय गाइड थीं.
अर्जेंटीना की साइंटिफ़िक एंड टेक्निकल रिसर्च काउंसिल के पुरातत्वविद मेलिसा सलर्नो का कहना है कि दक्षिणी चिली के लोगों के साथ सीलरों के अच्छे रिश्ते थे. कभी-कभी वो सील की खाल, अपने तजुर्बे और जानकारियां भी उनसे साझा करते थे.
लेकिन दोनों की संस्कृति एक दूसरे से अलग थी. लिहाज़ा कभी-कभी दोनों के बीच झगड़े भी होते थे.
ये नाविक औरतों को उठाकर ले जाते थे और दूर ले जाकर बेसहारा छोड़ देते थे.
चूंकि उस दौर की घटनाओं के कोई लिखित सबूत नहीं हैं, इसीलिए इस महिला का बारे में कोई पुख्ता जानकारी भी नहीं है.

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ख़ास मौक़ा
लेकिन अंटार्कटिका पर इस महिला की हड्डियां इस बात का सबूत हैं कि उस दौर में यहां इंसान ने आना शुरू कर दिया था.
17 मार्च 1912 को ब्रिटेन के रॉबर्ट फ़ाल्कन स्कॉट 60 खोजकर्ताओं की टीम के साथ दक्षिणी ध्रुव पर रिसर्च के लिए पहुंचे.
उन्हें लगता था कि उनकी टीम इस ध्रुव पर पहुंचने वाली पहली टीम होगी. लेकिन उनके यहां पहुंचने से महज़ तीन हफ़्ते पहले ही नॉर्वे की एक टीम यहां से लौटकर आई थी.
जब स्कॉट की टीम को ये बात पता चली तो उनका मनोबल टूट गया. लेकिन, देशवासियों की उम्मीदों का दबाव इतना ज़्यादा था कि वो अपने कदम पीछे नहीं हटा सके.
ख़ुद इन खोजकर्ताओं के लिए भी ये मौक़ा बहुत ख़ास था.

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एक डायरी
मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मैक्स जॉन्स का कहना है कि मौसम की सख़्त मिज़ाजी देखते हुए फॉल्कन खुद आश्वस्त नहीं थे कि वो जिस काम के लिए निकले हैं वो उसे पूरा पाएंगे. लेकिन टीम का हौसला अटल था.
लिहाज़ा वो आगे बढ़ते गए. लेकिन वापसी का रास्ता आसान नहीं रहा. टीम के साथियों की हिम्मत जवाब देने लगी.
फ़रवरी महीने में टीम के साथी ईगर ईवान और लॉरेंस ओट्स की मौत हो गई. उन्हें वहीं बर्फ़ में दफ़ना दिया गया.
फॉल्कन को डर सताने लगा था कि शायद वो अपने सभी साथियों के साथ देश वापिस नहीं लौट सकेंगे. वो एक डायरी में अपनी पूरी यात्रा का विवरण लिख रहे थे.
फॉल्कन की डायरी से ही पता चलता है कि उन्होंने कितना मुश्किल भरा वक़्त गुज़ारा था.
उन्होंने लिखा है कि टीम जानती थी कि टेंट से 18 किलो मीटर की दूरी पर उन्हें ख़ुद को बचाने का बंदोबस्त मिल जाएगा. लेकिन बर्फ़ीले तूफानों ने बाहर निकलने का मौक़ा ही नहीं दिया.
सभी लोग अपने तंबुओं में क़ैद हो गए और कमज़ोरी की वजह से एक-एक करके दम तोड़ने लगे.
कई महीने बाद सर्च टीम को विल्सन, हेनरी और स्कॉट के शव और सामान तो मिल गए, लेकिन ईगर ईवान और लॉरेंस ओट्स के शव कभी नहीं मिले.
स्कॉट की डायरी में आखिरी एंट्री 29 मार्च 1912 की है. हो सकता है इसी दिन उनकी मौत हुई हो.
अंटार्कटिका की ज़मीन बर्फ़ की चादर है और इसमें पड़ी दरारें मौत के कुएं.
साल 1965 में ऐसी ही एक दरार ने तीन वैज्ञानिकों को ख़ुद में समा लिया था.
हैली रिसर्च स्टेशन के ये चारों वैज्ञानिक मसकेज ट्रैक्टर से वेडेल सागर से गुज़र रहे थे.

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बर्फ़ीली ज़मीन में दरारें
मसकेज ट्रैक्टर ख़ास तरह के होते हैं जो दलदल और बर्फ़ीले इलाक़ों में चलते हैं. इनके साथ एक स्लेज जुड़ी होती है और एस्किमो कुत्तों की टीम साथ चलती है.
तीन वैज्ञानिक कैब में बैठे थे जबकि जॉन रोस स्लेज पर थे. जेरेमी बेली, ट्रैक्टर चला रहे थे और बर्फ़ की मोटाई माप रहे थे.
डेविड वाइल्ड और जॉन विल्सन आगे की बर्फ़ देख रहे थे. अचानक स्लेज रूक गई और बर्फ़ में धंसने लगी.
रोस ने अपने साथियों को क़रीब 20 मिनट तक आवाज़ दी तब कहीं बेली की आवाज़ आई कि डेविड मर चुका है और जेरी बर्फ़ में फंसा हुआ है.
रोस ने इन्हें बचाने की कोशिश की लेकिन कुछ देर बाद बेली की आवाज़ आनी भी बंद हो गई. अंटार्कटिका की बर्फ़ीली ज़मीन में ऐसी दरारें बहुत हैं.
अगस्त 1982 में एंब्रोस मॉर्गन, केविन ऑक्लेटन और जॉन कोल नाम के तीन रिसर्चरों ने अंटार्कटिका यात्रा शुरू की.
सर्दी का मौसम शुरू हो चुका था और अंटार्कटिका के समंदर में अच्छी खासी बर्फ़ थी. ये तीनों आसानी से पीटरमन द्वीप पर पहुंच गए और यहां उन्होंने समंदर किनारे अपना कैंप बना लिया.

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एक रेडियो ट्रांसमिशन
लेकिन दूसरे ही दिन भीषण तूफ़ान ने सब कुछ तबाह कर दिया.
ग़नीमत थी कि इनके पास महीने भर से ज़्यादा का राशन था. जिसके सहारे उनका गुज़ारा चलता रहा.
लेकिन बाहरी दुनिया से इनका संपर्क पूरी तरह टूट चुका था. सिर्फ़ एक रेडियो ट्रांसमिशन था जिसकी बैट्री धीरे-धीरे कमज़ोर हो रही थी.
हालात बिगड़ने शुरू हो चुके थे. टीम बीमार हो गई थी. 15 अगस्त 1982 के दिन एक बार फिर तेज़ बर्फ़ीले तूफ़ान ने समुद्र की बर्फ़ को ख़त्म कर दिया. और इसके बाद इन तीनों को कभी नहीं देखा गया.
हालांकि इनके शव तलाशने की काफ़ी कोशिश की गई लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
अंटार्कटिका की बर्फ़ में जिस किसी ने भी अपने अज़ीज़ों को खोया है उनके लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है कि वो उन्हें आख़री सलाम तक पेश नहीं कर पाए.

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कैंप के निशान
ब्रिटेन की भू-वैज्ञानिक क्लिफोर्ड शैले ने 1976 में अपने दोस्तों को ऐसे ही खोया था.
इनके तीनों दोस्त माउंट पियर पर चढ़ाई कर रहे थे तभी वो बर्फ़ीले तूफ़ान में फंस गए.
इनके कैंप के निशान तो मिले लेकिन तीनों के शव कहीं नहीं मिले.
अंटार्कटिका में जान गंवाने वाले रिसर्चरों की याद में स्कॉट पोलर रिसर्च इंस्टिट्यूट, कैम्ब्रिज में ओक पेड़ के तने के दो खंबे गाड़े गए हैं.
ये दोनों खंबे एक दूसरे की और झुके हुए हैं और ऊपर की ओर एक दूसरे से मिलते हुए मालूम देते हैं.
लेकिन इन दोनों के बीच मामूली-सी दूरी है जो इस बात का प्रतीक है कि मरने वाले दूर होकर भी पास हैं.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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