मां की गोद की जगह लेने आ गई ये मशीन

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- Author, हेलेन शूमाकर
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
जो लोग नए-नए मां-बाप बनते हैं, उन्हें सबसे पहले अपनी नींद गंवाकर इस ख़ुशी की क़ीमत चुकानी पड़ती है.
धरती पर नई-नई अवतरित हुई ज़िंदगी की देख-भाल में नींद ख़राब होती है. क्योंकि बच्चा कभी भी उठ सकता है. कभी भी उसकी ज़रूरतें हो सकती हैं.
मज़बूत से मज़बूत रिश्ते में इसकी वजह से दरार आ सकती है. ये मां-बाप की ज़िंदगी का सबसे बड़ा तनाव होता है. इससे उनकी सेहत पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है.
अगर आप का बच्चा दुनिया का सबसे शांत बच्चा है. ज़्यादातर वक़्त सोचता रहता है. इसके बाद भी रात में कभी भी उसकी देख-भाल के लिए आपको उठना पड़ सकता है. ऐसा पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता आया है.
पर, क्या इक्कीसवीं सदी में इस सदियों पुरानी चुनौती का हल ढूंढ़ लिया गया है.
इसका जवाब है-स्नू.
कुछ ख़ास है ये चारपाई?
ये एक ऐसी चारपाई है, जो ख़ुद से हिल सकती है. आपके बच्चे को सुला सकती है. तकनीकी तरक़्क़ी का ये एक फ़ायदा है, जो किसी नवजात के मां-बाप को सुकून से सोने में मददगार बन सकता है.
स्नू की ख़ूबी ये है कि ये बच्चे को गर्भ में रहने वाला एहसास दे सकती है.
ये चारपाई उसी तरह का सेन्सेशन, शोर और एक झिल्ली से घिरे होने का एहसास बच्चे को कराती है, जो बच्चे ने मां के गर्भ में महसूस की होती है.

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लेकिन, सवाल ये भी है कि क्या ये चारपाई किसी इंसान के छूने का एहसास दे सकती है?
जब इस चारपाई को बच्चे के रोने की आवाज़ 'सुनाई' पड़ती है, तो ये अपने डेटा में दर्ज़ सबसे शांत शोर और हिलाने-डुलाने के विकल्प को चुन कर बच्चे को शांत करती है.
स्नू बनाने वालों का दावा है कि ये गर्भ के भीतर के एहसास को समेटे हुए उपकरण है. इससे बच्चे की नींद में एक घंटे या इससे भी ज़्यादा का इज़ाफ़ा हो जाता है.
बच्चों को सुलाने का हुनर
स्नू बच्चे को तसल्ली भी देती है. इसमें सोने का एक अलग हिस्सा है, जो बिस्तर से जुड़ा हुआ है. वो बच्चे को हिलाता भी है और उन्हें पीठ के बल लिटाए भी रखता है, ताकि वो आराम से सो सकें.
अमरीकन एकेडेमी ऑफ़ पेड्रियाटिक्स कहती है कि बच्चों को पीठ के बल ही सुलाना चाहिए. ब्रिटिश एनएचएस से जुड़ी संस्थाएं भी यही सलाह देती हैं.
बच्चे अगर पेट के बल लेटते हैं तो उनकी अचानक से होने वाली मौत यानी सडेन इनफैंट डेथ सिंड्रोम के शिकार होने का ख़तरा रहता है.

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वैसे तो ब्रिटेन में इस सिंड्रोम से नवजातों की मौत में पिछले एक दशक में काफ़ी गिरावट आई है.
लेकिन अमरीका में अभी भी हर साल इस सिंड्रोम से 3500 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो जाती है.
'बदल रही हैं ज़िंदगियां'
स्नू को स्विस डिज़ाइनर येव्स बेहर ने बनाया है. उन्हें अपने आविष्कार पर बहुत गर्व है.
बेहर कहते हैं कि, 'स्नू ज़िंदगियों को वाक़ई बदल रही है. इसकी तकनीक में इंसानी जज़्बात भी पैबस्त हैं. ये मां-बाप और बच्चों दोनों के लिए वरदान है.'
बेहर कहते हैं कि ये बहुत चतुर डिज़ाइन है. उनके मुताबिक़, 'पहली चुनौती ये थी कि तकनीक का इस्तेमाल इस तरह हो कि इसमें इंसानी जज़्बात भी हों और ये ज़्यादा ख़लल डालने वाली भी न हो.'
स्नू की डिज़ाइन ऐसी है कि इसके सेंसर, रोबोटिक अक़्ल और माइक्रोफ़ोन ऐसे छुपे हैं, कि दिखाई ही नहीं देते. ये बच्चे को एक मुलायम और धोए जा सकने वाले कंबल में लपेट कर सुरक्षित रखती है. देखने में भी स्नू दिलकश है.

स्नू को बनाने वाले इसे निजी सहायक कहते हैं. 'ये चौबीसों घंटे आपके बच्चे का ख़याल रख सकती है.' हालांकि इसकी निगरानी ज़रूरी है.
वैसे किसी मशीनी आया का आपके बच्चे पर लगातार निगाह रखने का और उसे सुलाने का ख़याल चौंकाने वाला है. लेकिन, कुछ लोगों को इससे परेशानी भी हो सकती है.

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मां की जगह ले सकती है तकनीक?
क्या तकनीक, इंसानी पहलू का विकल्प बन सकती है? क्या स्नू मां-बाप की तरह संवेदनशील हो सकती है?
लंदन के विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम मे द फ्यूचर स्टार्ट्स हेयर के हिस्से की देखभाल करने वाली मारियाना पेस्ताना कहती हैं कि, "एक तरफ़ तो स्नू एक शानदार आविष्कार है. लेकिन, इससे इस बात की परेशानी भी है कि हम अपने बच्चे की देख-भाल का ज़िम्मा मशीन के हवाले कर रहे हैं."
घरों में तकनीक हमारी ख़ूब ख़िदमत कर रही है. एसी है जो हमारे मन का तापमान बनाए रखते हैं. निजी अस्टिटेंट हैं, जो हमारा हुक्म बजा लाते हैं. टीवी जो हमारे इशारे पर चलता है.
पेस्ताना कहती हैं, "तकनीक हमें इस बात का एहसास कराती है कि वो हमारा ख़याल रखती है. लेकिन ये ख़याल कोई इंसान नहीं रखता कि इसमें जज़्बात नहीं हैं. बस, कुछ गुणा-गणित से चलने वाली मशीन है."
मशीन के सामने होंगी कैसी चुनौतियां?
बच्चों के पास अपनी बात कहने का एक ही तरीक़ा होता है. वो रोने लगते हैं. बच्चे के रोने के कई मतलब हो सकते हैं. वो भूखे हो सकते है. अपनी नैपी बदलने के लिए कह सकते है.
कई बार बच्चे सिर्फ़ आपका ध्यान खींचने के लिए रोते हैं. कोई बच्चा अगर इसलिए रो रहा है कि वो बीमार है या डर गया है, तो क्या ऐसे हालात में मां-बाप अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी किसी मशीन को सौंपना चाहेंगे?

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स्नू ने इन चुनौतियों का जवाब तलाशने की भी कोशिश की है. अगर बच्चा इस मशीनी चारपाई की सहलाने-सुलाने की कोशिशों के तीन मिनट बाद भी रोता रहता है, तो ये मशीन रुक जाएगी. ताकि बच्चे को इंसानी तवज्जो मिल सके.
हम बरसों से तकनीक की मदद लेते आए हैं. बच्चों के तमाम खिलौने, झूले और पालने बने हैं.
वीडियो मॉनिटर सिस्टम से बच्चों की निगरानी भी होती है. ज़्यादातर मां-बाप इन तकनीकी सहयोगियों को खुले दिल से स्वीकार लेते हैं.
स्नू को नवजात बच्चों की देख-भाल का गेम चेंजर कहा जा रहा है. जिन लोगों ने इसे इस्तेमाल किया है, वो स्नू को बड़े काम की चीज़ बताते हैं. कई कंपनियां तो स्नू को अपने उन कर्मचारियों को तोहफ़े में दे रही हैं, जो नए मां-बाप बने हैं. अस्पतालों में इस पर रिसर्च हो रही है.
अमरीका की केंटकी यूनिवर्सिटी ने 150 ऐसी चारपाइयों को बच्चों के लिए इस्तेमाल किया है. इस प्रोजेक्ट से जुड़ी लोरी शूक कहती हैं कि, 'हर मां-बाप को ये बिस्तर पसंद आया. बच्चे इसमें बड़े आराम से सोते हैं.'
स्नू को बनाने वाले येव्स बेहर कहते हैं कि, 'तकनीक ऐसी होनी चाहिए, जो इंसानों के साथ क़दमताल मिला कर चल सके. डिज़ाइन करने वालों की यही ज़िम्मेदारी है कि मशीन और इंसान के बीच के रिश्ते में तालमेल बनाए रखे. जो इंसानों की मददगार हो, उसका विकल्प नहीं.'
कहते हैं कि एक बच्चे को पालने के लिए पूरे गांव को जुटना पड़ता है. बहुत से उनींदे मां-बाप अपने बच्चे की परवरिश के लिए मदद का हर हाथ मंज़ूर कर लेंगे.
पर, अगर तकनीक इतनी चालाक हो जाए कि आप को किसी की मदद की ज़रूरत ही न पड़े. तो क्या होगा?
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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