पाकिस्तान के हैदराबाद में हिंदू परिवार की मशहूर बंबई बेकरी, जहां दूर-दूर से आते हैं लोग केक लेने

बंबई बेकरी
    • Author, रियाज़ सोहैल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, हैदराबाद (सिंध)

पाकिस्तान के सिंध राज्य के शहर हैदराबाद के इलाक़े सदर में लाल रंग की इमारत के बाहर और अंदर लोगों की क़तार लगी हुई है.

लकड़ी के फ़्रेम से बना दरवाज़ा खुलता है तो लाइन में खड़े लोगों में से एक अंदर कमरे में जाता है. एक कमरे में और भी लाइनें लगी हुई हैं जहां एक तरफ़ पैसे दिए जा रहे हैं. तो दूसरी तरफ़ टोकन देकर केक ख़रीदे जा रहे हैं.

यहां हर कोई अपनी बारी का इंतज़ार करता और वापसी में एक या दो डिब्बे केक उठाए चेहरे पर विजयी मुस्कान के साथ बाहर निकलता है.

इस इमारत पर 'बंबई बेकरी' लिखा है और साथ में इसके स्थापित होने का साल- 1911 भी अंकित है. इस बेकरी और इससे जुड़े घराने की कहानी लगभग सवा सदी पुरानी है.

बंगले में बनी मुंबई बेकरी

फलाज राय गंगाराम थदानी ने सन 1911 में हैदराबाद के इलाक़े सदर में बंबई बेकरी की स्थापना की थी. एक बंगले में स्थापित इस बेकरी में आवास भी बनाया गया. फलाज राय अपने तीनों बेटों श्याम दास, किशन चंद और गोपी चंद के साथ यहां रहते थे.

बंबई बेकरी में चॉकलेट से तैयार होने वाले ब्रेड, बिस्कुट और केक बनाए जाते थे और उनमें शुद्ध सामग्री शामिल की जाती थी.

फलाज राय का देहांत सन 1948 में हुआ, जिसके बाद उनके बेटे किशनचंद ने केक और बिस्कुट के स्वाद को बेहतर किया जबकि सन 1960 में किशन चंद की मौत के बाद उनके बेटे कुमार ने चाचा के साथ पारिवारिक कारोबार को संभाला. उनका देहांत जून 2010 में हैदराबाद में ही हुआ.

अंग्रेज़ी दैनिक 'डॉन' ने कुमार थदानी की मौत की ख़बर में लिखा था कि कुमार के दादा यानी बेकरी के संस्थापक फलाज राय ने स्विट्ज़रलैंड की एक महिला से शादी की थी जो अपने घर में बेकरी का सामान बनाती थीं. उनकी लोकप्रियता के बाद उन्होंने बेकरी का कारोबार शुरू किया था.

जब कुलहौड़ा शासकों ने हैदराबाद को अपनी राजधानी बनाई तो थदानी परिवार भी पुरानी राजधानी ख़ुदा आबाद दादू से हटकर यहां आकर बस गया. हैदराबाद के गद्दू मल से भी उनका पारिवारिक संबंध था जिनके नाम से गद्दू बंदरगाह मौजूद है.

बंबई बेकरी

केक बनाने का तरीक़ा जो आज भी है राज़

पिछली सवा सदी से बंबई बेकरी का केक पुराने ढंग से ही तैयार किया जाता है जिसमें किसी मशीन का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि इसमें हाथों का कमाल होता है. मशीन केवल बादाम पीसने के लिए इस्तेमाल होती है जबकि मिक्सिंग आदि पारंपरिक ढंग से की जाती है.

कुमार थदानी बहुत कम मिलने जुलने वाले व्यक्ति थे और उन्होंने जीवन में केवल एक ही बार इंटरव्यू दिया.

उन्होंने रेडियो पाकिस्तान, हैदराबाद के पूर्व स्टेशन मैनेजर नसीर मिर्ज़ा को अपने इंटरव्यू में बताया था कि चॉकलेट, कॉफ़ी और मैक्रोन केक के नुस्ख़े उनके पिता के ही बनाए हुए हैं और उनकी मौत के बाद उन्होंने अंग्रेज़ी किताबों में छपने वाले केक और बिस्कुटों की विधियों को आज़माया जिनको पसंद भी किया गया.

कुमार थदानी के दोस्त एडवोकेट एम. प्रकाश का कहना था कि अब चौथी पीढ़ी ने इस कारोबार को संभाल लिया है. बंबई बेकरी का केक वैसे तो पूरे पाकिस्तान में मशहूर है लेकिन हैदराबाद की तो यह सौग़ात है.

सिंध के प्रसिद्ध साहित्यकार और शोधकर्ता मदद अली सिंधी कहते हैं, "जब इस बेकरी की स्थापना हुई उस समय कन्फ़ेक्शनरी का रुझान नया-नया था. बंबई बेकरी ने नए-नए फ़्लेवर सामने लाए और तरह-तरह के केक बनाए. उनकी ब्रेड और पेस्ट्रीज़ भी हुआ करती थीं."

वह कहते हैं कि इसकी तैयारी का फ़ार्मूला किसी को बताया नहीं जाताथा, यह बात आम थी कि घर की किसी बुज़ुर्ग महिला के पास उसकी विधि है.

बंबई बेकरी

इमेज स्रोत, M.PRAKASH

इमेज कैप्शन, कुमार थदानी (दाएं) अपने दोस्त एम प्रकाश के साथ

बंबई बेकरी के केक दिन में तीन समय ही मिलते हैं

बेकरी की स्थापना के शुरुआती दिनों में 20 केक बनते थे लेकिन इस संख्या में अब 100 गुना इज़ाफ़ा हो गया है. यहां केक ख़रीदने के लिए निश्चित समय तय है क्योंकि हर समय केक नहीं मिलता.

बेकरी सुबह 8:00 बजे खुलती है लेकिन ग्राहकों की क़तार इससे पहले लग जाती है. फिर भी हर किसी के हिस्से में यह केक नहीं आता. शुरू में बेकरी में दोपहर 2:00 बजे और शाम 7:00 बजे केक मिलते थे, 2:00 बजे चॉकलेट और कॉफ़ी केक और शाम 7:00 बजे क्रीम और मैक्रोन मिलते थे.

बेकरी प्रबंधन के अनुसार शिकायत मिलती थी कि एक समय पर आ रहे हैं तो एक फ़्लेवर मिल रहा है, दूसरे फ़्लेवर के लिए दोबारा आना पड़ रहा है जिसके बाद इसका हल निकाला गया और चारों फ़्लेवर को एक साथ उपलब्ध कराया जाने लगा.

आजकल तीन अलग-अलग समय पर केक मिलते हैं जिनमें सुबह 8:00 बजे, दोपहर 3:00 और शाम 6:00 बजे का समय निर्धारित है जबकि बेकरी 13 घंटे खुलती है.

वीडियो कैप्शन, ईरान से भारत तक...कैसे-कैसे बदला बिरयानी का स्वाद

कुमार थदानी की तरह उनके बेटे सोनू उर्फ़ सलमान शेख़, जिनको उन्होंने गोद लिया और बाद में वह मुसलमान हुए, मीडिया और प्रचार से दूर रहते हैं.

सलमान शेख़ मैं बीबीसी उर्दू के अनुरोध पर मुलाक़ात तो की लेकिन औपचारिक इंटरव्यू के लिए तैयार नहीं हुए.

हाल की जनगणना के नतीजों के अनुसार केवल हैदराबाद डिवीज़न की आबादी सवा करोड़ है. बढ़ती हुई आबादी के साथ बंबई बेकरी के केक की मांग में भी लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है.

कुमार थदानी के दोस्त एम. प्रकाश बताते हैं, "कुमार कहते थे कि फ़ैमिली ने जो सिखाया वही लोगों को उपलब्ध कराता हूं ताकि स्तर और भरोसे में कोई अंतर न आए."

उनके अनुसार, "वह पैसे का लालच नहीं करते थे. उनको कई बार पेशकश की गई कि कराची, लाहौर या इस्लामाबाद में अपनी बेकरी की ब्रांच खोलें लेकिन उन्होंने कभी रुचि नहीं दिखाई. वह कहते थे कि सीमित काम करूंगा लेकिन स्तर बनाए रखूंगा."

कुमार के बाद भी उनका परिवार उनकी इस पॉलिसी को जारी रखे हुए है. केक की उत्पादन संख्या में तो वृद्धि की गई लेकिन सीमित स्तर पर जिसकी वजह यह बताई गई कि केक की तैयारी बिना मशीन के हाथों से की जाती है. बनाने वाले लोगों की संख्या बढ़ाई जाए तो जगह भी ज़रूरत होगी लेकिन वह इस संख्या से ही ख़ुश हैं.

बॉम्बे बेकरी

बेकरी के दशकों पुराने वफ़ादार ग्राहक

बंबई बेकरी के कई ख़रीदार बचपन से बूढ़े होने तक यहां के ही केक पसंद करते आए हैं और आज भी कहीं और जाने के लिए तैयार नहीं.

सिविल अस्पताल हैदराबाद के पूर्व मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉक्टर हादीबख़्श जतोई हमें बेकरी के बाहर मिले तो उन्होंने हाथ में दो केक उठा रखे थे.

डॉक्टर हादी बख़्श जतोई ने हमें बताया कि वह पिछले 60- 65 वर्षों से यहां से केक ले रहे हैं.

उनका कहना था कि जब उन्होंने केक खाना शुरू किया था तो यहां से ही ख़रीदा था, आज भी उसका वही दशकों पुराना ज़ायक़ा है. इस परिवार की चौथी पीढ़ी ने भी उस ज़ायक़े को बरक़रार रखा है.

डॉक्टर हादी बख़्श जतोई के साथ मौजूद आज़म लेग़ारी ने बताया कि उनकी उम्र इस समय 73 वर्ष है जबकि उन्हें बचपन से यह केक पसंद रहा है.

वह बताते हैं, "मेरी बहू ऑस्ट्रेलिया के शहर सिडनी से आई थी. उन्होंने यहां के बिस्कुट, विशेषकर जिंजर बिस्कुट खाए तो उनको इतने पसंद आए कि वह वापसी पर न केवल पांच किलो अपने साथ लेकर गई बल्कि वहां से दोबारा भी मंगवाए.

बंबई बेकरी
इमेज कैप्शन, अम्मार बिन मालिक कहते हैं जब बचपन में वो बंबई बेकरी का केक मांगते थे और अब उनके बच्चे यह फ़रमाइश करते हैं.

"सालगिरह हो या कोई त्योहार केक यहां से ही जाता है"

यहां केक लेने वालों की लाइन में मौजूद अम्मार बिन मालिक कराची से आए थे. उन्होंने बताया कि जब वह बच्चे थे तो बंबई बेकरी का केक मांगते थे और अब उनके बच्चे यह फ़रमाइश करते हैं.

"ईद हो, शब-ए-बरात हो, बर्थ डे या कोई और त्योहार केक यहां से ही लेकर जाना पड़ता है."

उनके अनुसार, ऐसा भी नहीं कि यह केवल बच्चों की ज़िद है बल्कि यहां की बेकरी का ज़ायक़ा बड़ा अलग है. वह कहते हैं कि कराची में बहुत सी बेकरियां हैं जहां "इससे कहीं अधिक दाम के बाद भी हम उनके स्तर से संतुष्ट नहीं होते."

बिलाल अकबर ने यहां से केक के दो डिब्बे लिए हैं. उन्होंने बताया कि वह कराची से फ़ैसलाबाद जा रहे हैं. उन्होंने बंबई बेकरी के केक के बारे में बहुत सुन रखा था, इसलिए यहां आ गए.

मोहम्मद इमरान लाइन में 35 मिनट के इंतज़ार के बाद केक काउंटर पर पहुंचे. मोहम्मद इमरान ने कहा कि जब से होश संभाला यहां के ही केक खाए हैं, किसी और बेकरी के पास तो भटकते भी नहीं.

बंबई बेकरी में चॉकलेट, कॉफ़ी, लेमन केक के अलावा मैक्रोन, फ़्रूट केक और बिस्कुट तैयार किए जाते हैं. उन पर न तो डिज़ाइन बने होते हैं और न ही कस्टमर की फ़रमाइश पर केक पर डिज़ाइन बनाए जाते हैं. केक की तरह पैकिंग का डिब्बा भी सादा है. सफ़ेद रंग के डिब्बे पर लाल और हरी छपाई है जिस पर 'शॉप इन बैंगलो' (बंगले में बनी दुकान) लिखा है.

केक के डिब्बे की हरे रंग की रिबन को जब खोलते हैं तो अंदर से मक्खन से तैयार किए गए केक की ख़ुशबू आती है.

बंबई बेकरी
इमेज कैप्शन, बंबई बेकरी

बंबई बेकरी के मालिकों की दरियादिली

भारत के विभाजन से पहले सिंध के शहर हैदराबाद में अधिकतर हिंदू समुदाय व्यापार करता था. विभाजन के बाद यहां से कई परिवार भारत चले गए लेकिन बंबई बेकरी अकेला कारोबार है, जो यहां जारी है.

इसके संस्थापक फलाज राय का देहांत भी पाकिस्तान बनने के एक साल बाद हैदराबाद में ही हुआ था.

फलाज राय के पोते और बंबई बेकरी के मालिक कुमार थदानी ने ब्रॉडकास्टर नसीर मिर्ज़ा को दिए गए एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें यहां से दूसरी जगह जाने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई क्योंकि जब सिंध में ख़ून ख़राबा और फ़साद हुआ था तो उस समय हैदराबाद में कम ही दंगे हुए थे. उन्होंने हैदराबाद के इस इलाक़े में एक लाश भी गिरते नहीं देखी थी, इसलिए उन्होंने अपनी धरती नहीं छोड़ी थी.

कुमार थदानी हिंदू धार्मिक पुस्तकों, गुरु ग्रंथ के साथ-साथ क़ुरान का भी अध्ययन करते थे. वह ख़ुद को गुरु नानक और सिंध के सूफ़ी शायर शाह अब्दुल लतीफ़ भट्टाई का चेला क़रार देते थे.

पाकिस्तान में बंबई बेकरी की पहचान इसका केक है लेकिन हैदराबाद के लोगों के लिए इसकी एक पहचान इसके मालिकों की दरियादिली भी है.

कुमार थदानी की ज़िंदगी में केक खरीदने वालों के अलावा ज़रूरतमंदों की भी लाइन लगी हुई होती थी. वह न केवल लोगों को व्यक्तिगत तौर पर मदद करते थे बल्कि श्मशान घाट से लेकर दिल के अस्पताल तक को, और रेडियो पाकिस्तान में म्यूज़िक को बचाए रखने के लिए दान दिया करते थे.

अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि जब हम पर कोई मुश्किल या बीमारी आती है तो हम समझते हैं कि हम ख़ुदा की राह में कम दे रहे हैं, इसको बढ़ा देते हैं तो मुश्किल कम हो जाती है.

बंबई बेकरी
इमेज कैप्शन, बंबई बेकरी की चारदीवारी पहले छोटी थी जिसको 1980 के दशक में हैदराबाद में होने वाले भाषाई हंगामे के बाद ऊंचा किया गया.

बंबई बेकरी को राष्ट्रीय विरासत घोषित करने की सिफ़ारिश

बंबई बेकरी की इमारत का रंग पहले सफ़ेद था, जिसको अब लाल रंग से पेंट किया गया है. उसकी चारदीवारी छोटी थी जिसको 1980 के दशक में हैदराबाद में होने वाले भाषाई हंगामे के बाद ऊंचा किया गया.

इस इमारत में अंदर जाने के लिए केवल एक दरवाज़ा था. अब दो खिड़कियों को भी दरवाज़ों की शक्ल दी गई है. इमारत में केक सजाने के लिए मौजूद शीशे के शोकेस सागवान की लकड़ी के बने हैं और दरवाज़े भी पुराने हैं जिनमें से कुछ को बदला गया है.

ख़रीदारी के कमरे में पहले एक लाइन होती थी अब चार लाइनें लगती हैं जिनमें महिला ग्राहकों को प्राथमिकता दी जाती है.

ख़रीदारी के कमरे के साथ वाले कमरे में भट्टी लगी है जिनकी संख्या तीन है जबकि मार्बल लगी हुई टेबल पर एक दर्जन के लगभग लोग बड़ी बड़ी छुरियों से केक के एक हिस्से पर मक्खन लगाते हुए नज़र आए.

भट्टी वाले कमरे के साथ रिहायशी कमरे हैं. बेकरी से लेकर आवास तक एक ही बरामदा है. सवा एकड़ क्षेत्रफल में एक बड़ा लॉन और रिहायशी कमरों के साथ एक छोटा बग़ीचा है.

सिंध सरकार के पुरातत्व विभाग ने बंबई बेकरी को राष्ट्रीय विरासत घोषित करने की सिफ़ारिश की है. राज्य के संस्कृति व दुर्लभ विरासत के मंत्री सरदार अली शाह का कहना है कि बेकरी के 100 साल, इसकी इमारत, परंपरा और ऐतिहासिक हैसियत के कारण यह फ़ैसला लिया गया है.

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