बृजभूषण शरण सिंह की सियासी ताक़त बढ़ने की कहानी- प्रेस रिव्यू

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भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ़्तारी की मांग को लेकर पहलवान पिछले छह दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
महिला पहलवानों के कथित यौन उत्पीड़न मामले में दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण के ख़िलाफ़ दो एफ़आईआर दर्ज की हैं.
पिछले कई दिनों से वह सुर्खियों में बने हुए हैं. हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार ने उनकी राजनीति से लेकर अखाड़े तक के सफर पर खबर की है. आज की प्रेस रिव्यू में पहली ख़बर यही पढ़िए.
दशकों से राम मंदिर आंदोलन का मुख्य केंद्र रहे कारसेवकपुरम से क़रीब 15 किलोमीटर दूर चमकती सफेद हवेली बृजभूषण शरण सिंह की है. दो मंज़िला विशाल हवेली में साफ़-सुथरे लॉन हैं और चमकती गाड़ियां खड़ी हैं.
सरयू नदी के पार नवाबगंज कस्बे में स्थित इसी घर से छह बार के सांसद बृजभूषण शरण सिंह, क़रीब तीन दशकों से अपनी राजनीति चला रहे हैं.
अख़बार ने राजनीति के जानकार इरशाद इल्मी के हवाले से लिखा है कि उनके क्षेत्र में काफ़ी समर्थक हैं. राम मंदिर के साथ उनके जुड़ाव ने लोगों के बीच बृजभूषण सिंह की लोकप्रियता को भी बढ़ाने का काम किया है, लेकिन उनके राजनीतिक भविष्य के बारे में फ़िलहाल अनुमान लगाना मुश्किल है.

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अखाड़े से शुरू हुआ सफ़र
अख़बार के मुताबिक़ आठ जनवरी, 1957 को नवाबगंज में जन्मे, बृजभूषण किशोरावस्था में ही अखाड़े में शामिल हो गए थे और स्थानीय स्तर पर अच्छी कुश्ती लड़ने वालों में जाने जाते थे.
राजनीति में उनका करियर अयोध्या के साकेत कॉलेज में छात्र जीवन के दौरान शुरू हुआ.
इस दशक में अयोध्या शहर उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था, तब राम मंदिर आंदोलन ने धीरे-धीरे आकार लिया, जिससे शक्ति का भंवर बना और इस भंवर में बृजभूषण जैसे युवाओं ने ख़ुद को राजनेताओं की तरह पेश किया, जिसमें वह कामयाब भी हुए.
1991 में राम मंदिर आंदोलन अपने उफान पर था. बृजभूषण सिंह ने अपना पहला लोकसभा चुनाव बीजेपी की टिकट पर लड़ा और कांग्रेस के आनंद सिंह को क़रीब एक लाख मतों से हराया. तब बीजेपी ने पहली बार उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी.
अगले ही साल बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया, जिसके बाद उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त किया गया.
अख़बार लिखता है कि बृजभूषण सिंह ने सार्वजनिक रूप से दावा किया उन्होंने बाबरी मस्जिद को गिराने में मदद की.
उन्होंने दावा किया कि वे उस इलाक़े से पहले व्यक्ति थे जिन्हें आंदोलन के समय मुलायम सिंह सरकार ने गिरफ्तार किया और बाबरी विध्वंस के बाद सीबीआई ने.
बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ बृजभूषण सिंह को भी सीबीआई ने अभियुक्त बनाया लेकिन 2020 में उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया.
1990 के दशक में उन्हें अक्सर संतों और राम मंदिर आंदोलन के नेताओं के साथ देखा जाता था, जिसके चलते उन्होंने ख़ुद को एक तेजतर्रार हिंदू नेता के रूप में पेश किया.

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कई महीने जेल में बिताने पड़े
अख़बार के मुताबिक 1992 में उन पर गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम के सहयोगियों की कथित रूप से मदद करने के आरोप में आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी टाडा लगाया गया.
इस मामले में उन्हें कई महीने दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहना पड़ा. ये साल 1999 का समय था. इतना सब कुछ हो रहा था लेकिन उनके प्रभाव में कोई कमी नहीं आ रही थी.
अगले 15 सालों के दौरान बृजभूषण सिंह ने राजनीति के मैदान में ख़ुद को ऐसे स्थापित कर लिया जिसे हराया न जा सके. वे कभी-कभी राज्य सरकार के फ़ैसलों को सीधी चुनौती देते थे.
अख़बार लिखता है कि गोंडा के स्थानीय लोगों को अभी भी याद है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने गोंडा का नाम बदलकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण नगर करने की कोशिश की थी.
बृजभूषण सिंह ने इस कोशिश का कड़ा विरोध किया और उन्होंने मायावती को चुनौती देते हुए पदयात्रा भी निकाली थी. यहां तक की अटल बिहारी वाजपेयी को भी इस मुद्दे में हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने मायावती को अपना फ़ैसला वापिस लेने के लिए कहा.
बृजभूषण सिंह ने 2009 के आम चुनावों से पहले बीजेपी को छोड़कर समाजवादी पार्टी का रुख़ किया और अपनी सीट पर जीत दर्ज की, लेकिन 2014 के चुनावों से पहले वे फिर से बीजेपी में लौट आए.
गोंडा के नंदिनी नगर में वे कुश्ती का जो भी कार्यक्रम आयोजित करते हैं तो वह एक राजनीतिक घटना बन जाता है. कुश्ती के इन कार्यक्रमों में बृजभूषण एसयूवी गाड़ियों के काफिले के साथ पहुंचते हैं, जहां 'नेता जी' जिंदाबाद के नारों के बीच उन्हें मंच पर लगी ऊंची कुर्सी पर बिठाया जाता है.
बृजभूषण कुश्ती के अखाड़े में कभी-कभी रेफरी के पीछे तक चले जाते हैं, पहलवानों को कभी डांटते हैं तो कभी उन्हें सलाह देते हुए नजर आते हैं. अखबार के मुताबिक़ इस तरह के कार्यक्रम उन्हें लोगों से मिलना का मौक़ा देते हैं जिससे उनकी राजनीतिक शक्ति में काफी इजाफा होता है.
इन कार्यक्रमों में न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि विधायक, पंचायत प्रमुख और इलाके के प्रभावशाली लोग हिस्सा लेते हैं.
अखबार लिखता है कि उन्होंने साल 2022 में एक न्यूज वेबसाइट को इंटरव्यू देते हुए माना था कि उन्होंने एक व्यक्ति की हत्या की थी.
2019 में उनके चुनावी हलफनामे में चार मामले लंबित हैं, जिसमें हत्या का प्रयास जैसा मामला भी शामिल है.

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एससीओ में क्या बोले राजनाथ
शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों ने शुक्रवार को दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और उससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा की.
सम्मेलन में भारत, रूस, ईरान, बेलारूस, कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के रक्षा मंत्रियों ने व्यक्तिगत रूप से हिस्सा लिया.
इस खबर को द हिंदू अखबार ने पहले पन्ने पर जगह दी है. सम्मेलन में बोलते हुए राजनाथ सिंह ने सदस्यों देशों से सामूहिक रूप से आतंकवाद का सफाया करने और इसका समर्थन करने वालों पर जवाबदेही तय करने की अपील की.
उन्होंने कहा कि किसी भी तरह का आतंकवाद या उसे समर्थन देना मानवता के खिलाफ एक बड़ा अपराध है.
राजनाथ सिंह ने कहा, "शांति और समृद्धि इस खतरे के साथ मिलकर नहीं रह सकती है."
उन्होंने कहा, "अगर कोई देश आतंकवादियों को आश्रय देता है तो यह न केवल दूसरों के लिए बल्कि खुद के लिए भी खतरा पैदा करता है. युवाओं को कट्टरवाद की तरफ ले जाना न सिर्फ सुरक्षा की नजर से चिंताजनक है बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक प्रगति के रास्ते में भी एक बड़ी रुकावट है."
"अगर हम एससीओ को एक मजबूत और अधिक विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय संगठन बनाना चाहते हैं तो हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता आतंकवाद से मजबूती से निपटने की होनी चाहिए."
सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के विशेष रक्षा सलाहकार मलिक अहमद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुए थे.

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अदानी ग्रुप मामले में जांच कहां तक पहुंची
अदानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग रिपोर्ट में जो आरोप लगाए गए हैं उनकी जांच पूरी करने के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) अभी और समय ले सकता है.
ये खबर बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार ने पहले पन्ने पर लगाई है. अखबार ने इस मामले से जुड़े दो लोगों के हवाले से बताया है कि सेबी सुप्रीम कोर्ट में एक्सटेंशन याचिका दायर कर सकती है.
सेबी को सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दो मई तक जमा करनी थी. कोर्ट ने 3 मार्च के अपने आदेश में सेबी को जांच पूरी करने के लिए दो महीने का समय दिया था.
अखबार ने सेबी से जुड़े एक अन्य सूत्र के हवाले से कहा कि अदानी समूह की विदेश में स्थित इकाइयों के बारे में अहम जानकारी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं है.
यह जानकारी और संबंधित डेटा इस जांच में अहम साबित हो सकते हैं. इसलिए नियामक यह सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त समय मांग सकता है कि जांच के निष्कर्ष सटीक और शीर्ष अदालत के निर्धारित दायरे के अनुरूप हो.
अपने आदेश में कोर्ट ने छह सदस्यीय विशेषज्ञ पैनल भी बनाया था, जिसका काम विनियामक विफलता की जांच करने और निवेशकों को जागरूक कैसे किया जा सकता है उस पर काम करने के लिए कहा था.
कोर्ट ने पैनल को दो महीने के अंदर सीलबंद कवर में अपनी रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया था.
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