कर्नाटक: गाय की बात कर क्या कांग्रेस मंत्री ने बीजेपी को मुद्दा दे दिया

इमरान क़ुरैशी

बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

गाय

इमेज स्रोत, ANI

हाल में संपन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों में बहुमत से जीत हासिल करने के चार सप्ताह बाद कांग्रेस के एक नेता ने ये कह कर बीजेपी के हाथों में एक अहम मुद्दा दे दिया है कि "अगर भैंसों को काटा जा सकता है तो गायों को क्यों नहीं?"

कर्नाटक सरकार की गो हत्या रोकथाम एवं मवेशी संरक्षण क़ानून 2020 में बदलाव करने की योजना के विरोध में वहां विपक्ष में मौजूद बीजेपी ने दो दिन के राज्यव्यापी प्रदर्शन की घोषणा की है.

हाल में हुए विधानसभा चुनावों में 122 सीटों पर रही बीजेपी 66 सीटों तक सिमट आई थी और वो अब राज्य में विपक्ष की भूमिका में है.

बीजेपी प्रवक्ता एमजी महेश ने बीबीसी से कहा है, "हमारा विरोध प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य सरकार किस तरह काम करती है."

बीजेपी के शासन के दौरान राज्य में इस क़ानून में बदलाव किया गया था. इसके तहत गोहत्या पर पूरी तरह से रोक लगाई गई थी, साथ ही कहा गया था कि भैंस और सांड को उनके 13 साल का होने के बाद मारा जा सकता है.

क़ानून में बदलाव करते वक्त इसमें कड़ी सज़ा का भी प्रावधान किया गया. दोषी पाए जाने पर इसके तहत तीन से सात साल की सज़ा और पांच हज़ार से लेकर पांच लाख तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया. दोबारा उसी मामले में दोषी पाए जाने पर सात साल की सज़ा और एक लाख से लेकर दस लाख तक के जुर्माने का प्रावधान था.

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गाय बनाम भैंस

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ये मुद्दा उस वक्त सुर्खियों में आया जब एक रिपोर्टर ने राज्य के पशुधन मंत्री के. वेन्कटेश से सवाल किया कि क्या उनकी सरकार गोहत्या की रोकथाम के लिए क़ानून में बदलाव के बारे में विचार कर रही है.

रिपोर्टर का कहना था कि राज्य में खेती से जुड़े लोगों के लिए बूढ़े हो रहे मवेशियों को पालना और मरे पशुओं का निपटारा करना मुश्किल हो रहा है.

अपने जवाब में पशुधन मंत्री के. वेन्केटश ने कहा कि गोहत्या पर लगे बैन का बुरा असर किसानों पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा, "अगर बांझ हो गए भैंसों और सांडों को काटा जा सकत है तो गायों को काटने में क्या समस्या है?"

इस दौरान वेन्कटेश ने अपना निजी अनुभव भी साझा किया. उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी मरी गायों के शव उठाने के लिए बुलडोज़र किराए पर लेना पड़ा था.

उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इस क़ानून में ऐसा बदलाव लाने की योजना बना रही है, जो किसानों के हित में होगा. लेकिन अपने इस बयान के बाद वो विवादों में फंस गए और बीजेपी के कई नेताओं ने उनकी कड़ी आलोचना की.

पूर्व मुख्यमंत्री बासवरज बोम्मई ने कहा, "गायों के साथ भारतीयों का भावनात्मक जुड़ाव है, वो मां के तौर पर गाय की पूजा करते हैं."

कर्नाटक

बीजेपी प्रवक्ता एमजी महेश ने कहा कि कांग्रेस पार्टी, "अपने वोटबैंक को खुश करने की कोशिश कर रही है. गाय की अपनी उपयोगिता है. ये केवल धार्मिक भावना की बात नहीं है कि गाय को काफी सम्मान की नज़र से देखा जाता है. लेकिन हमारे देश में कोडागु जिले के कुशालनगर और हसन रोड पर बस हादसे में लोगों की जान जाने से बचाने वाले पत्थर के कलवर्ट (पहाड़ी नालों पर बने पुल) को भी लोग पूजते हैं."

उन्होंने कहा कि "ये दलील कि इससे किसानों की आर्थिक स्थिति में बदलाव आएगा. ये एकमात्र दलील नहीं है, इससे जुड़ी कई और दलीलें भी हो सकती हैं. ये भी एक अपवाद है कि हिंदुओं में भी कई लोग हैं जो बीफ़ खाना पसंद करते हैं. लेकिन हमें एक आदर्शवादी रुख़ अपनाने की ज़रूरत है और गोहत्या रोकना है."

उन्होंने कहा कि जिस दौर में मैसूर की राजशाही का विलय भारत में हुआ था उस वक्त भी गोहत्या का विरोध होता था. उन्होंने कहा, "मैसूर के महाराज ने केंद्र सरकार के सामने एक ही शर्त रखी थी, वो ये थी कि राज्य में कहीं गोहत्या नहीं होगी."

हालांकि मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या ने सवाल उठाने वाली बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि नैतिक तौर पर इस मुद्दे पर सवाल उठाने का उसे हक नहीं है.

बुधवार को बेंगलुरु में होने वाले बीजेपी के विरोध प्रदर्शन से जुड़े एक सवाल के उत्तर में सिद्धारमैय्या ने कहा कि कैबिनेट में अब तक इस मुद्दे पर चर्चा तक नहीं हुई है.

उन्होंने कहा, "बेचारे, अब जब हम चुनाव के समय दी गई पांच गारंटियों को लागू कर रहे हैं तो उनके पास बोलने को कुछ नहीं बचा. इस तरह का मुद्दा उठाने का उनके पास क्या नैतिक हक़ है? उन्होंने हर घर 10 घंटे बिजली, कृषि ऋण माफ़ करने और सिंचाई के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपये के आवंटन का वादा किया था. वो अपने इन वादों पर खरे नहीं उतर पाए. ये जन विरोधी पार्टी है. जब वो लोग सत्ता में थे उन्होंने कमिशन के ज़रिए राज्य को लूटा."

सिद्धारमैय्या

क्या कहते हैं विश्लेषक?

हालांकि इस मुद्दे पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय अलग है.

राजनीतिक विश्लेषक एमके भास्कर राव ने बीबीसी हिंदी से कहा, "एसएल बायरप्पा, जिन्हें बीजेपी राजगुरु मानती है उन्होंने पूर्वा नाम की एक मोटी क़िताब लिखी है. कई भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है. इसमें एक जगह पर उन्होंने महाभारत काल की उस घटना का ज़िक्र किया है जिसमें जब कुछ ऋषि पांडवों से मुलाक़ात करने गए तो द्रोपदी ने उन्हें खाने में बछड़े का मांस परोसा था. इसका मतलब ये है कि महाभारत काल से गाय का मांस खाया जाता रहा है."

उन्होंने कहा, "खाना व्यक्ति की पसंद का मामला है. हाथी मांस नहीं खाता जबकि शेर या बाघ मांस के सिवा कुछ नहीं खाते. कर्नाटक में आज राजनीतिक स्थिति ऐसी हो गई है कि बीजेपी के पास उठाने के लिए कोई मुद्दा नहीं बचा. लेकिन ये भी सच है कि के. वेन्कटेश ने मरे जानवरों के निपटारे की किसानों की समस्या पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय खुद बीजेपी के हाथों में एक मुद्दा दे दिया है."

वहीं अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर ए. नारायण ने बीबीसी हिंदी से कहा कि राज्य सरकार कोई फ़ैसला ले उससे पहले ही बीजेपी जल्दबाज़ी के मोड में आ गई है.

उन्होंने कहा, "बीजेपी न केवल राज्य सरकार के किसी तरह का फ़ैसला लेने से पहले इस मामले में जल्दबाज़ी कर रही है, बल्कि कांग्रेस नेताओं के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और पार्टी पर हमला करने को बीजेपी ने अपनी आदत बना लिया है. वेन्कटेश ने अपने बयान में कहा था कि जब बांझ बैलों को मारा जा सकता है तो बांझ गायों को क्यों नहीं."

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