सिद्धारमैया: कर्नाटक में सियासी जोड़-तोड़ के माहिर मारेंगे बाज़ी?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
सिद्धारमैया अब एक नया रिकॉर्ड बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं. ग्रामीण कर्नाटक पर मज़बूत पकड़ रखने वाले पूर्व सीएम अगर सफल रहे तो ये अपने आप में एक रिकॉर्ड होगा.
सिद्धारमैया के नाम देश में लगातार 13 बजट पेश करने का भी रिकॉर्ड है. लगातार दस बार बजट पेश करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री और केंद्रीय वित्त मंत्री रहे मोरारजी देसाई का नंबर, सिद्धारमैया के बाद ही आता है.
मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल (2013-2018) के दौरान, वो देवराज अर्स (1972-1978) के बाद पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले दूसरे मुख्यमंत्री बने थे.
'पता नहीं क्या वजह है कि अपने रूख़े बर्ताव के बाद भी वो जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हैं. शायद इसकी वजह सामाजिक न्याय के लिए उनका लगातार आवाज़ उठाना रहा है.'
अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर ए. नारायणा कहते हैं कि, '1997-98 के दौरान जे एच पटेल की सरकार में, और उसके बाद 2004 में कांग्रेस-जेडीएस की पहली साझा सरकार के दौरान भी वो जन्मजात बाग़ी बने रहे थे. उस वक़्त सिद्धारमैया जेडीएस में ही थे.'
जनता के बीच इस लोकप्रियता के कारण ही सिद्धारमैया, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार से आगे दिख रहे हैं. जबकि शिवकुमार के बारे में तो विरोधी भी कहते हैं कि 'वो कर्नाटक में सबसे ज़्यादा संसाधन वाले राजनेता हैं.'
कांग्रेस हाई कमान ने भी मुख्यमंत्री पद के दो दावेदारों की ताक़त का अंदाज़ा विधायकों के सीक्रेट बैलट के ज़रिए लगाया था. चुनाव में अपने आख़िरी प्रचार अभियान का आग़ाज़ करने से ठीक पहले बीबीसी के साथ इंटरव्यू में भी सिद्धारमैया ने यही मांग की थी. तब उन्होंने कहा था कि, 'मैं सीक्रेट बैलट से चुनाव चाहता हूं. यही लोकतांत्रिक तरीक़ा भी है.'
ये विडम्बना ही है कि 'जन्मजात बाग़ी' सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री के तौर पर कभी भी बग़ावत का सामना नहीं करना पड़ा था. इस बार चर्चा है कि कांग्रेस हाई कमान सिद्धारमैया को 30 महीने का कार्यकाल देने का मन बनाया है. ऐसी ख़बरें है कि ढाई साल के बाक़ी के कार्यकाल में मुख्यमंत्री का पद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी के शिवकुमार को मिल सकता.
लेकिन अभी अंतिम फ़ैसला होना बाक़ी है.
सीआरपीएफ के रिटायर्ड आईजी और सिद्धारमैया के बचपन के दोस्त अर्केश के. ने बीबीसी को बताया, "सिद्धारमैया के गांव सिद्धारमनहुंडी में सभी लोग दूसरे का नाम लेकर बुलाते हैं. यहां तक कि मां-बाप के नाम के आगे भी कोई सम्मानसूचक शब्द नहीं लगाते.
लेकिन, इसे अहंकार नहीं समझना चाहिए. जब सिद्धारमैया, प्रधानमंत्री मोदी को इस तरह से बुलाते हैं तो लोगों को लगता है कि वो उनके लिए तिरस्कारपूर्ण ज़बान इस्तेमाल कर रहे हैं. असल में सिद्धारमैया इसी तरह बात करते हैं."
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1985 में जब सिद्धारमैया, जनता पार्टी की रामकृष्ण हेगड़े सरकार में पशुपालन मंत्री थे, तो उनकी भारी आवाज़ और उंगलियों पर आंकड़े याद रखने के हुनर ने अफ़सरों को हैरान परेशान कर दिया था.
एक पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह ने बीबीसी हिंदी को बताया कि, 'लेकिन, हमको बहुत जल्दी ये अंदाज़ा हो गया कि आंकड़ों पर और बजट की ज़रूरतों पर उनकी पकड़ ग़ज़ब की है. तुलना करने में सिद्धारमैया की महारत ने बहुत से वरिष्ठ अफसरों को उनका मुरीद बना दिया था.'
सिद्धारमैया की वित्तीय जानकारी का लोहा तो सभी मानते हैं. जब पिछली विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर वो राज्य के बजट पर भाषण देते थे, तो सत्ताधारी बीजेपी के सभी विधायक सदन में मौजूद रहा करते थे. मानो पार्टी ने व्हिप जारी किया हो.
एक और रिटायर्ड अधिकारी ने कहा, 'प्रशासन पर सिद्धारमैया की पकड़ बेहद मज़बूत है और वो जिस तरह फाइलें पढ़ते हैं, वो तरीक़ा भी ज़बरदस्त है. अगर उनको लगता है कि किसी अधिकारी का सुझाव सही है, तो वो इस पर खुलकर बात करते हैं. वो सियासी जमा-जोड़ का भी ख़ूब ख़याल रखते हैं. कई बार वो अधिकारियों से कहा करते थे कि वो किसी अधिकारी के रवैये के ख़िलाफ़ कैबिनेट में अलग स्टैंड लेंगे. लेकिन, अधिकारी को इसका बुरा नहीं मानना चाहिए.'



ग्रामीण इलाक़े में अच्छी पकड़
सिद्धारमैया पर सबसे गहरा असर प्रोफ़ेसर एमडी नंजुंदास्वामी का पड़ा है. उन्होंने सिद्धारमैया को मैसुरू के लॉ कॉलेज में पढ़ाया था. प्रोफ़ेसर नंजुंदास्वामी ने कर्नाटक राज्य रैयत संघ (किसानों का संगठन) बनाया था.
अर्केश कहते हैं कि, 'हर शनिवार की शाम हम लोगों की बैठकें होती थीं, जिसमें सभी को बोलने और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने की छूट होती थी…. तभी हमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों के बारे में पता चला... समानता की भावना, बोलने की आज़ादी और संविधान के बारे में भी हमारी समझ उन्हीं बैठकों में बनी.'
इन बैठकों ने सिद्धारमैया को इस बात का साहस दिया कि वो तालुका डेवेलपमेंट बोर्ड (TDB) का चुनाव लड़ें और जीतें. अर्केश कहते हैं कि, 'सिद्धारमैया की सामाजिक पृष्ठभूमिक को देखते हुए हम ये कह सकते हैं कि इन बैठकों के बग़ैर उनमें इतना आत्मविश्वास शायद ही आया होता. क्योंकि, सिद्धारमैया के पिता तो पढ़े लिखे और अमीर नहीं थे. हक़ीक़त तो ये है कि सिद्धारमैया, पढ़ने के लिए स्कूल भी बहुत देर से गए थे.'
लेकिन, गणित में महारत रखने वाले सिद्धारमैया का हुनर हमेशा से ज़ाहिर था. अर्केश एक राज़ की बात बताते हैं कि, 'आपको पता है कि वो कार्ड के बड़े अच्छे खिलाड़ी थे. वो रमी का कोई भी मुक़ाबला नहीं हारे.'
राजनीतिक दांव-पेच

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सियासी तौर पर सिद्धारमैया को 'चतुर और बहुत नाप-तोल के चलने वाला' कहा जाता है.
कुरुबा (या गड़रिया) समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाले सिद्धारमैया ने पिछड़े तबक़े के बीच अपना आधार अहिंदा (AHINDA यानी अल्पसंख्यक, अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित) मंच के ज़रिए बढ़ाया, ताकि वो अपने पुराने उस्ताद एचडी देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्यूलर) से अलग हो सकें.
2013 कांग्रेस को जीत दिलाने के बाद, सिद्धारमैया ने जो पहला क़दम उठाया था, वो एक सदस्यीय कैबिनेट मीटिंग में अन्न भाग्य योजना के तहत हर इंसान को हर महीने पांच किलो चावल देने का था. बाद में इसे बढ़ाकर सात किलो कर दिया गया था.
उनकी कल्याणकारी योजनाओं का ख़र्च 4410 करोड़ रुपए था. जिसमें दुग्ध उत्पादकों को सब्सिडी, दलितों/ आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को एक बार क़र्ज़ माफ़ी और ग़रीबों के पुराने बिजली के बिल माफ़ करना शामिल था.
हालांकि, मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धारमैया ने कुछ विवादित मसलों को लेकर जैसा रवैया अपनाया, वो उनके ख़िलाफ़ गया.
2018 में उनका बेहद विवादित फ़ैसला लिंगायतों की मांग के मुताबिक़ उन्हें अलग धर्म का दर्जा देने की सिफ़ारिश करने का रहा था. उन्होंने इसका एलान तो कर दिया, लेकिन लोगों को ये नहीं समझाया कि इससे लिंगायत समुदाय को फ़ायदा क्या होगा.
इससे बीजेपी को ये प्रचार करने का मौक़ा मिल गया कि सिद्धारमैया, लिंगायत समुदाय को बांटने की कोशिश कर रहे हैं.
उनका एक और फ़ैसला अपनी पुरानी सीट चामुंडेश्वरी से चुनाव लड़ने का था. जबकि 2008 के बाद से सिद्धारमैया ने वहां कभी क़दम तक नहीं रखा था. चुनाव में सिद्धारमैया बुरी तरह हारे. जबकि, अपनी दूसरी सीट बादामी से वो बमुश्किल 1600 वोट से जीत पाए थे.
लेकिन, हाल के चुनाव अभियान के दौरान सिद्धारमैया की लोकप्रियता साफ़ तौर पर दिखी थी. कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि, 'उनकी सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए हमें कभी भी पैसे नहीं ख़र्च करने पड़ते थे. वो जहां भी जाते थे लोग ख़ुद उनका स्वागत करने और सुनने के लिए जमा हो जाते थे.'
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