कर्नाटक चुनाव: भारतीय राजनीति पर क्या होगा असर?

बीजेपी

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बीबीसी हिंदी
  • 10 मई को कर्नाटक में मतदान होगा और 13 मई को मतगणना होगी.
  • नामाकंन दाखिल करने की आख़िरी तारीख़ 20 अप्रैल.
  • कर्नाटक अलग राज्य के रूप में पहली नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया.
  • 1973 से पहले इसे मैसूर के नाम से जाना जाता था.
  • कर्नाटक की आबादी लगभग 6.5 करोड़ है.
  • यहाँ पर विधानसभा की 224 सीटें हैं, जबकि लोकसभा की 28 और राज्यसभा की 12 सीटें हैं.
  • पूरे देश की जीडीपी में कर्नाटक का योगदान आठ प्रतिशत का है.
  • कर्नाटक की कुल आबादी में 16 से 17 प्रतिशत लोग लिंगायत समुदाय के हैं.
  • वोक्कालिगा का प्रभाव दक्षिण कर्नाटक की लगभग 11 लोकसभा सीटों पर है.
  • कांग्रेस के पास विधानसभा में 70 विधायक हैं, जबकि जनता दल (सेक्यूलर) के पास 30.
  • अब बीजेपी के पास 121 विधायक हैं. इस दौरान भाजपा को अपना मुख्यमंत्रियों बदलना पड़ा.
बीबीसी हिंदी

मई में होने जा रहे कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में मिलने वाली जीत या हार से राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की तुलना में कांग्रेस के प्रभावित होने की उम्मीद ज़्यादा है.

हालांकि जानकारों की मानें तो इसका ये मतलब कतई नहीं है कि बीजेपी को इस चुनाव में चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ रहा है.

चुनाव विश्लेषक संजय कुमार और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की मानें तो कर्नाटक में यदि कांग्रेस को जीत मिली तो, यह इस साल दूसरे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के लिए बूस्टर डोज़ साबित हो सकती है.

दक्षिणी भारत के राज्यों ने अक्सर उत्तरी भारत के राज्यों की तुलना में अलग तरीके से मतदान किया है. वैसे कर्नाटक के चुनाव महाराष्ट्र या तेलंगाना जैसे पड़ोसी राज्यों को प्रभावित नहीं करते. हालांकि जानकार इससे बिल्कुल राय रखते हैं.

कांग्रेस

इमेज स्रोत, Twitter/INC

बीजेपी से ज़्यादा कांग्रेस के लिए अहम

सेंटर फॉर डेवलपिंग सोसाइटीज़ (CSDS) के पूर्व निदेशक डॉ. संजय कुमार कहते हैं, ''मान लें कि इस चुनाव में बीजेपी हार जाती है, तो इससे कांग्रेस और विपक्ष को एक नया जीवन मिलेगा. इन दलों को इससे और ऊर्जा मिलेगी.''

उनके अनुसार, ''यह हार हालांकि बीजेपी के लिए एक झटका होगी, लेकिन उस पर इसका ज़्यादा असर नहीं होगा. दूसरी ओर, 2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से यह हार कांग्रेस के लिए एक तरह का गतिरोध साबित होगी.''

उनका मानना है, ''कांग्रेस को जल्द से जल्द एक नैरेटिव तैयार करना होगा. यदि वो चुनाव दर चुनाव हारती जाती है, तो वो अपने पक्ष में पॉज़िटिव नैरेटिव तैयार नहीं कर पाएगी. यही कारण है कि ये चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत अहम है.''

कर्नाटक में इस बार 10 मई को मतदान होना है और इसके नतीज़े 13 मई को आएंगे. ये चुनाव तय करेगा कि क्या बीजेपी को 2019 की तरह इस बार भी 'ऑपरेशन कमल' चलाना पड़ेगा या नहीं.

बीजेपी ने चार साल इस ऑपरेशन के सहारे ही विधायकों का दल बदल करवाकर कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) की सरकार को सत्ता से बाहर किया था.

बीजेपी ने 2008 में 110 और 2018 में 104 सीटें जीती थीं. 2019 के लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों के बीजेपी में शामिल हो जाने के बाद जेडीएस-कांग्रेस का गठबंधन टूटा था.

वैसे डॉ. योगेंद्र यादव का मानना है कि कर्नाटक में चुनाव परिणाम के मायने बहुत बड़े होंगे.

वो कहते हैं, ''कर्नाटक में बीजेपी को कभी भी अपने दम पर बहुमत नहीं मिला. यदि इस बार ऐसा हो गया, तो वो पूरे देश में ढिंढोरा पीटेगी कि उसके पास दक्षिण भारत में चुनावी स्वीकार्यता का सबूत है. वो ये साबित करने की कोशिश भी करेगी कि कांग्रेस की 'भारत जोड़ो' यात्रा का कोई असर नहीं हुआ.''

वो कहते हैं, ''इससे समूचे विपक्ष का मनोबल गिरेगा, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर प्रदेश के विधानसभा नतीज़ों का उनके मनोबल पर पड़ा था.''

योगेंद्र यादव कहते हैं, ''सबसे अहम बात ये होगी कि इससे देश में सकारात्मक राजनीति का रास्ता साफ़ होगा. इससे साबित होगा कि मतदाताओं को हिजाब और अजान से विचलित नहीं किया जा सकता. उनके लिए आम जनजीवन से जुड़ा शासन ही मायने रखता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि ये एक बहुत ही अहम चुनाव है.''

मोदी अमित शाह और नड्डा

इमेज स्रोत, PRAKASH SINGH/AFP

बीजेपी के लिए चुनौती

कांग्रेस की तुलना में बीजेपी के लिए इस चुनाव की अहमियत कम होने की बात समझाने के लिए डॉ. संजय कुमार एक उदाहरण का सहारा लेते हैं.

वो कहते हैं कि कैसे कोई टॉपर किसी विषय में अच्छा प्रदर्शन न करने के बावजूद अपनी टॉप पोज़ीशन नहीं खोता.

वहीं अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर ए नारायण भी डॉ संजय कुमार की राय से सहमत हैं. वो कहते हैं कि इस चुनाव में यदि कांग्रेस की हार होती है, तो ये उसके लिए बहुत बड़ा झटका साबित हो सकती है.

नारायण कहते हैं, ''यदि इस चुनाव में बीजेपी हारती है, तो इसका मतलब ये होगा कि वो दक्षिण भारत में कोई प्रगति नहीं कर पाई है. लेकिन यदि बीजेपी जीतती है, तो इस जीत से दक्षिणी पड़ोसी राज्यों तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कार्यकर्ताओं को पर्याप्त ऊर्जा मिलेगी.''

वो कहते हैं, ''दक्षिणी भारत के दरवाज़े बीजेपी के लिए अभी ठीक से नहीं खुले हैं. वो कर्नाटक के छोर से इस दरवाज़े को सिर्फ धकेलने की कोशिश कर रहा है.''

कर्नाटक के मतदाता कुछ समय बाद हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग दलों को जीत दिला चुके हैं.

हिजाब

इमेज स्रोत, Getty Images

बीजेपी अब उतनी मज़बूत नहीं

1984 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी को पूरे देश में ज़ोरदार जीत मिली थी, लेकिन उसके कुछ ही महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में उन्हीं वोटरों ने जनता पार्टी के रामकृष्ण हेगड़े का चुनाव किया.

ऐसे में इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कितना फायदा होने की उम्मीद है?

इस सवाल के जवाब में डॉ. संजय कुमार कहते हैं, ''लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक के बाद एक जीतते रहने की बीजेपी की क्षमता दो-तीन साल पहले बहुत मज़बूत थी. लेकिन उसकी यह क्षमता अब कम हो गई है.''

उनके अनुसार, ''राज्य सरकार ने चाहे अच्छा प्रदर्शन किया हो या नहीं, लगातार विधानसभा चुनाव जीतने के मामले में बीजेपी अब उतनी मज़बूत नहीं रही. वैसा दौर 2015 से 2019 के बीच का था. सरकार ने यदि अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, तो उसे चुनौती का सामना करना पड़ा है.''

कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं. 1999 से अब तक के हर चुनाव में बीजेपी वहां दोहरे अंकों में सीटें जीतती रही है. उस समय अपनी लोक शक्ति पार्टी को एनडीए में शामिल करके हेगड़े ने अपना लिंगायत वोट बैंक बीजेपी को ट्रांसफर करवा दिया था. 1999 में 13 सीटों से बढ़ते बढ़ते 2019 में बीजेपी 25 सीटों तक जा पहुंची.

बीजेपी और कांग्रेस दोनों के शासनकाल में कर्नाटक को केंद्रीय मंत्रिमंडल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलता रहा है. विदेशी मामलों के अलावा उसे रेलवे, सामाजिक न्याय, श्रम, खाद्य प्रसंस्करण जैसे कई अहम मंत्रालय मिल चुके हैं.

कर्नाटक के सीएम बासवराज बोम्मई

इमेज स्रोत, BASAVARAJ S BOMMAI

इमेज कैप्शन, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई

लोकतंत्र के लिए कर्नाटक चुनाव का महत्व

योगेंद्र यादव कर्नाटक विधानसभा चुनावों के कहीं अधिक व्यापक प्रभाव देखते हैं.

वो कहते हैं, ''मेरा एक गंभीर दावा है कि हम अपने गणतंत्र का विघटन होता देख रहे हैं. समान नागरिकता का संवैधानिक प्रावधान पहले ही नकारा जा चुका है. स्वतंत्रता के अधिकार से पहले से ही समझौता कर लिया गया है."

"संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है. इसलिए, अभी लोकतंत्र के लिए ही नहीं बल्कि गणतंत्र के लिए भी चुनौती है. क्योंकि अभी भारत कही जानी मानी राजनीतिक इकाई को ही तोड़ा जा रहा है.''

उन्होंने कहा, ''यही कारण है कि गणतंत्र को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है. और यह होना तभी शुरू हो सकता है, जब कर्नाटक में बीजेपी की निर्णायक हार हो जाए. 'भारत जोड़ो' यात्रा ने एक गति तो पैदा की है. इसने एक तरह से बीजेपी के एकछत्र राज पर सवाल उठाकर प्रभुत्व और विध्वंस की प्रक्रिया रोक दी. उस गति को आगे बढ़ाने का फैसला कर्नाटक के मतदाताओं द्वारा तय होगा.''

ये भी पढ़ेंः-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमेंफेसबुक,ट्विटर,इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)