कर्नाटक को मिल रहा है कांग्रेस का साथ, पिछड़ गई है बीजेपी

दिल्ली के कांग्रेस दफ़्तर में जश्न शुरू हो गया है.
इमेज कैप्शन, दिल्ली के कांग्रेस दफ़्तर में जश्न शुरू हो गया है.

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में वोटों की गिनती जारी है.

चुनाव आयोग में जारी रुझानों के मुताबिक़ कांग्रेस ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है जबकि बीजेपी काफ़ी पीछे चल रही है.

अब तक आए रुझानों में कांग्रेस 120 से ज्यादा और बीजेपी 65 से ज़्यादा सीटों पर आगे चल रही है. वहीं जेडीएस क़रीब 20 से ज़्यादा सीटों पर आगे है.

कर्नाटक में तगड़े चुनाव प्रचार के बाद 10 मई को मतदान हुआ था.

राज्य के 36 मतगणना केंद्रों पर वोटों की गिनती की जा रही है.

चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस बार राज्य में 73.19 प्रतिशत मतदान हुआ जो कि राज्य के लिए एक रिकॉर्ड है.

दिल्ली कांग्रेस दफ़्तर में हनुमान का रूप धारण करके आया कांग्रेस समर्थक
इमेज कैप्शन, दिल्ली कांग्रेस दफ़्तर में हनुमान का रूप धारण करके आया कांग्रेस समर्थक

न्यूज़ चैनलों के एग्ज़िट पोल्स में राज्य में बीजेपी की हार और कांग्रेस की जीत का अनुमान लगाया गया था.

अब तक के रुझान में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करती नज़र आ रही है.

1985 के बाद राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार लगातार दो बार नहीं बनी है.

रुझानों में एचडी कुमारस्वामी की जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) तीसरी बड़ी पार्टी बनती नज़र आ रही है.

पहले माना जा रहा था कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सरकार बनाने के लिए जेडीएस की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी.

लेकिन अभी के रुझानों में कांग्रेस को मिलती बढ़त को देखते हुए ऐसी संभावना नज़र नहीं आ रही है.

कर्नाटक विधानसभा

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इमेज कैप्शन, कर्नाटक विधानसभा में कुल 224 सीटें हैं और पिछले चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ था

पूर्ण बहुमत का जादुई आंकड़ा

224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के लिए 113 सीटों का जादुई आंकड़ा चाहिए.

मौजूदा विधानसभा में सत्तारूढ़ बीजेपी के 116 विधायक, कांग्रेस के 69, जेडीएस के 29, बीएसपी का एक और निर्दलीय दो विधायक हैं. छह सीटें खाली हैं जबकि एक स्पीकर की सीट है.

लेकिन 2018 में जब चुनाव नतीजे आए थे तो विधानसभा की तस्वीर अलग थी.

बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. कांग्रेस को 80 सीटें और जेडीएस को 37 सीटें मिली थीं.

इसके अलावा बीएसपी और कर्नाटक प्रग्यावंथा जनता पार्टी (केपीजेपी) को एक एक सीटें आई थीं.

हालांकि 38.04 वोट प्रतिशत के साथ कांग्रेस बीजेपी (36.22% वोट प्रतिशत) से आगे थी.

कर्नाटक चुनाव

बीजेपी ने अपना दावा पेश किया और सरकार बन भी गई, लेकिन विश्वासमत में ये सरकार गिर गई और फिर जनता दल (सेक्यूलर) और कांग्रेस के गठबंधन की सरकार बनी. जेडीएस के नेता एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने.

14 महीने की ये सरकार तब गिर गई जब सत्तारूढ़ सरकार के बाग़ी विधायकों ने भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया.

बीजेपी के विधायकों की संख्या 104 से 121 हो गई और उसने सरकार बना ली. हालांकि इस दौरान भाजपा ने दो मुख्यमंत्रियों को बदला.

पहले येदियुरप्पा और फिर उनको हटाकर बासवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया गया.

सीएम बासवराज बोम्मई, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार

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इमेज कैप्शन, सीएम बासवराज बोम्मई, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार.

वो सीटें जिन पर है नज़र

चुनाव में कई सीटें ऐसी हैं जिन पर राजनीतिक दलों के दिग्गज चेहरे चुनाव लड़ रहे हैं.

इनमें प्रमुख नाम है सीएम बासवराज बोम्मई (बीजेपी के टिकट पर शिगांव से), पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया (वरुणा से), कांग्रेस नेता डी शिवकुमार (कनकपुरा), जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी (छन्नापटना) और चुनाव से ठीक पहले बीजेपी से कांग्रेस में आए जगदीश शेट्टार हुबली धारवाड़ सेंट्रल से मैदान में हैं.

इसके अलावा जेडीएस के ही निखिल कुमारस्वामी रामनागरा से, बीजेपी के सीटी रवि चिकमंगलूर से, कांग्रेस के जी परामेश्वरा कोटागीर से, बीजेपी के वी सोमन्ना वरुणा से और बीजेपी से आर अशोका कनकपुरा से अपनी क़िस्मत आज़मा रहे हैं.

कर्नाटक चुनाव अहम माना जा रहा है क्योंकि 2024 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के प्रति जनता के मूड का ये एक संकेत भी हो सकता है.

कांग्रेस के लिए ये चुनाव इसलिए अहम है क्योंकि आम चुनावों से पहले वो एक मज़बूत विपक्षी पार्टी के रूप में उभरना चाहती है और इस बुनियाद पर विपक्षी एकता दावा ठोंक सकती है.

पिछली बार कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने वाली स्थानीय पार्टी जनता दल सेक्युलर ने इस चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी दोनों से समान दूरी बनाए रखी है.

चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण शुरू होने और ख़त्म होने के समय बजरंग बली का नाम ज़रूर लेते थे.

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इमेज कैप्शन, चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजरंग बली का मुद्दा उठाकर कांग्रेस को घेरने की पूरी कोशिश की.

चुनाव में ये मुद्दे छाए रहे

कर्नाटक में फिर से वापसी करने के लिए ज़ोर लगा रही कांग्रेस पार्टी ने भ्रष्टाचार का मुद्दा ज़ोर शोर से उछाला. राज्य सरकार में कथित भ्रष्टाचार को निशाना बनाते हुए उसने '40 परसेंट की सरकार' का अभियान चलाया.

साथ ही पांच वायदे किए गए जिनमें पुरानी पेंशन बहाल करने, 200 यूनिट तक बिजली फ़्री देने, 10 किलो अनाज मुफ़्त देने, बेरोजग़ारी भत्ता देने और परिवार चलाने वाली महिला मुखिया को आर्थिक मदद की बात कही गई.

जबकि बीजेपी ने बीपीएल परिवारों को हर साल तीन गैस सिलेंडर मुफ़्त देने, हर ग़रीब परिवार को रोज़ाना आधा लीटर नंदिनी दूध का पैकेट देने, एससी/एसटी परिवारों के लिए 10,000 रुपये तक एफ़डी पर उतना ही पैसा जमा कराने, कर्नाटक की अर्थव्यवस्था मज़बूत करने, 10 लाख नौकरी के अवसर पैदा करने जैसे कई वायदे किए.

लेकिन प्रचार अभियान में तब एक नया मोड़ आ गया जब कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में नफ़रत फैलाने वाले संगठनों पर बैन लगाने की बात कही और उसमें बजरंग दल और पीएफ़आई का उदाहरण दिया.

बीजेपी प्रचार अभियान की अगुवाई कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भगवान बजरंग बली का अपमान क़रार दिया और इसके बाद बीजेपी की ओर से इसे प्रमुख मुद्दा बनाया गया.

कर्नाटक चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 अप्रैल को प्रवेश किया था और अगले हफ़्ते भर में चुनावी रैलियों, सभाओं और रोड शो से बीजेपी के चुनावी अभियान में जान फूंक दी.

मोदी की औसतन हर दिन तीन से चार चुनावी सभाएं होती थीं. अंतिम दिनों में चुनाव प्रचार का मुख्य मुद्दा बजरंग बली के इर्द-गिर्द बना रहा.

बहुत दिनों से चुनाव प्रचार से दूर रही कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी भी चुनाव प्रचार करने पहुंचीं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी प्रचार अभियान में अपनी ताक़त लगाई.

भाजपा का घोषणापत्र जारी करते हुए सीएम बासवराज बोम्मई, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा

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इमेज कैप्शन, भाजपा का घोषणापत्र जारी करते हुए सीएम बासवराज बोम्मई, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा

कर्नाटक भाजपा का दक्षिण में प्रवेश द्वार कैसे बना?

बात साल 1983 की है, जब भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा की 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसमें से वो 18 जीतने में कामयाब हो गई थी.

उसने 7.9 प्रतिशत का अपना वोट शेयर हासिल किया था.

इन जीते हुए विधायकों में से नौ ऐसे थे, जो तटवर्ती इलाक़े के रहने वाले थे, जहाँ जनता दल के रामकृष्ण हेगड़े और उन्हीं के दल के अब्दुल नज़ीर का ख़ासा प्रभाव हुआ करता था.

ऐसे में ये पहला मौक़ा था, जब भाजपा ने हेगड़े या यूँ कहें जनता दल के क़िले में सेंध मार दिया था.

भाजपा ने हेगड़े की सरकार को समर्थन भी दिया था.

लेकिन बाद के दिनों में कुछ साल भाजपा को अंदरूनी कलह का सामना करना पड़ा था, जब अनंत कुमार और वी धनंजय कुमार जैसे दिग्गज आपस में ही भिड़ गए थे.

कर्नाटक कांग्रेस
इमेज कैप्शन, बैंगलोर में कांग्रेस पार्टी के दफ़्त के बाहर का नज़ारा

ये बात हो रही है साल 1987-88 की, जब इन दोनों नेताओं के बीच सुलह कराने के लिए बीएस येदियुरप्पा को संगठन ने प्रदेश अध्यक्ष चुना.

यहाँ से कर्नाटक की राजनीति में येदियुरप्पा के राजनीतिक सितारे का उदय होने लगा.

वर्ष 1989 में भारतीय जनता पार्टी ने फिर चुनाव लड़ा था और उसने 119 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए. लेकिन बीजेपी को सिर्फ़ चार सीटों पर ही जीत मिल सकी थी.

वर्ष 1990 से मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों से उपजे आंदोलन और राम जन्मभूमि के आंदोलन की वजह से भाजपा ने फिर से अपना आधार मज़बूत करना शुरू कर दिया.

लेकिन वो साल 2004 के विधानसभा चुनाव ही थे, जहाँ से भाजपा ने ख़ुद को पूरी तरह स्थापित कर लिया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

भाजपा को विधानसभा की 224 सीटों में से 71 सीटों पर विजय हासिल हुई थी. फिर उसी साल भाजपा ने लोकसभा की 18 सीटों को भी जीत लिया था.

कहा जाता है कि भाजपा की इस उड़ान का श्रेय यहाँ के लिंगायत समुदाय को जाता है, जिसने बीजेपी का जमकर समर्थन किया.

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