कर्नाटक चुनावः '91 गालियां' और बजरंग दल जैसे मुद्दों का ज़मीन पर क्या असर है?

रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार के दौरान ननजुंदेश्वरा स्वामी मंदिर भी गए

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए जी-जान लगा दी है.

बीते सात दिनों में उन्होंने 17 रैलियां की हैं और पांच रोड शो किए हैं. दक्षिण भारत के अहम राज्य कर्नाटक के चुनावी नतीजे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों और कई राज्यों की विधानसभा चुनावों के लिए भी अहम होंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर्नाटक में बीजेपी की जीत सुनिश्चित करके उसे आगामी चुनावों के लिए एक प्रतीक के तौर पर भी इस्तेमाल करना चाहते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले नौ दिनों में दो रातें दिल्ली के बाहर गुज़ारी हैं. ये असाधारण बात भी है. उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि वो कर्नाटक में तीन से चार रैलियां और रोड शो कर सकें.

कर्नाटक में चुनाव प्रचार आज शाम पांच बजे समाप्त हो जाएगा और 10 मई को वोट डाले जाएंगे. कर्नाटक के चुनावी नतीजे 13 मई को आएंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कर्नाटक पर इतना ज़्यादा ध्यान देना इसलिए भी अहम है क्योंकि वो उस राज्य में अपनी पार्टी की क़िस्मत बदलना चाहते हैं, जहां 1985 के बाद से कोई सत्ताधारी दल दोबारा सत्ता में वापसी नहीं कर सका है.

ये चुनाव अभियान इस लिहाज से भी अहम है क्योंकि पहला चुनाव है, जब कर्नाटक में बीजेपी के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं.

येदियुरप्पा ने अपने दम पर 2008 में पार्टी को सत्ता दिलाई थी और साल 2018 में त्रिशंकु विधानसभा के बाद 2019 में पार्टी की सरकार बनाने में अहम भूमिका भी निभाई थी.

बैंगलुरु में मोदी का रोड शो

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दोनों मौक़े पर भारतीय जनता पार्टी ने 110 और 104 सीटें हासिल की थीं. दोनों ही बार 224 सदस्यों वाली विधानसभा की जादुई संख्या 113 को पार्टी नहीं छू सकी थी.

इस चुनाव का एक और पहलू ये है कि इस बार बीजेपी को राज्य में सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है.

कई महीने पहले कांग्रेस ने बीजेपी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए इसे 40 प्रतिशत कमिशन वाली सरकार कहा था.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बीजेपी को घेरने के अलावा कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान में चार गारंटी जनता को दी हैं, जो बेरोज़गारी और महंगाई जैसे अहम मुद्दों से जनता को राहत दिलाने का भरोसा देती हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 अप्रैल को राज्य में अपना चुनावी अभियान शुरू किया और कांग्रेस की तरफ़ से अपने आप पर लगाए गए आरोपों को अपने चुनावी अभियान का केंद्र बनाया.

उन्होंने कांग्रेसी नेताओं के 'ज़हरीले सांप', 'नालायक बेटा' जैसे बयानों का हवाला देते हुए कहा कि किस तरह से कांग्रेसी नेता उन्हें गाली देते हैं और उन पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हैं.

इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस के घोषणापत्र में बजरंग दल के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के वादे को भगवान हनुमान (बजरंग बली) के अपमान के तौर पर भी बार-बार दोहराया.

भोपाल की जागरण लेकसाइड यूनिवर्सिटी के प्रो वाइस चासंलर और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर संदीप शास्त्री कहते हैं, "बीजेपी नेताओं रवैये में आत्मविश्वास नहीं झलक रहा है.''

चुनाव अभियान पर हावी रहे मुद्दे

कर्नाटक में रोड शो करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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चुनाव के समय नज़दीक आने तक कर्नाटक में चुनाव अभियान काफ़ी गंभीर रहा है.

हालांकि कांग्रेस के बीजेपी पर 40 प्रतिशत कमिशन सरकार होने के आरोपों को ज़रूर अपवाद के रूप में देखा जा सकता है.

सबसे पहले राज्य में ठेकेदारों और स्कूल के प्रबंधकों ने ये सरकार पर ये आरोप लगाया था और पत्र लिखकर प्रधानमंत्री को इस बारे में जानकारी भी दी थी.

राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना था कि कांग्रेस ने इस बार बीजेपी के आरोपों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय राज्य में चुनाव का एजेंडा तय किया.

मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई के नेतृत्व में सत्ताधारी बीजेपी कांग्रेस के आरोपों का जवाब मज़बूती से नहीं दे सकी.

एक चर्चित पेमेंट एप के प्रचार अभियान का सहारा लेते हुए कांग्रेस ने राज्य में मुख्यमंत्री को घेरने के लिए 'पेसीएम' अभियान चलाया, जिसका तोड़ बीजेपी नहीं खोज सकी.

चुनाव आयोग के राज्य में चुनावी कार्यक्रम घोषित करने से पहले ही कांग्रेस पार्टी ने सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों के इर्द-गिर्द अपना चुनावी अभियान तैयार कर लिया था.

कांग्रेस ने कई कल्याणकारी योजनाओं का खाका भी पेश किया जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेवड़ी संस्कृति कहकर आलोचना भी की.

कांग्रेस पार्टी ने ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले प्रत्येक परिवार के लिए हर महीने दस किलो चावल, ग़रीबी रेखा से नीचे के परिवार की महिला मुखिया के लिए हर महीने दो हज़ार रुपए की आर्थिक मदद और स्नातक पास और डिप्लोमाधारी बेरोज़गारों के लिए दो साल तक बेरोज़गारी भत्ता देने की लोकलुभावन घोषणाएं कीं.

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भारतीय जनता पार्टी ने इन वादों को खोखला बताते हुए ख़ारिज किया और कहा कि इन्हें पूरा नहीं किया जा सकता.

वहीं पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लोकलुभाव के बजाए इन योजनाओं को आर्थिक कार्यक्रम बताकर इनका बचाव किया.

बीबीसी हिंदी को दिए एक साक्षात्कार में इन प्रस्तावित योजनाओं का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा करना संभव है क्योंकि इन योजनाओं से सिर्फ़ 50 हज़ार करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा.

उन्होंने कहा कि राज्य के 3.10 लाख करोड़ रुपए के सालाना बजट से हर साल 20 से 25 हज़ार करोड़ रुपए जुटाए जा सकते हैं.

वहीं दूसरी तरफ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में ग़रीबी रेखा से नीचे हर परिवार के लिए साल में तीन मुफ़्त गैस सिलिंडर देने का वादा किया है. ये सिलिंडर उगाडी, गणेश चतुर्थी और दीपावली वाले महीनों में देने का वादा पार्टी ने किया.

बीजेपी ने हर नगर परीषद वार्ड में अटल आहार केंद्र स्थापित करने का वादा भी किया है. इन आहार केंद्रों में लोगों को सस्ती दरों पर भोजन दिया जाएगा. इसके अलावा पार्टी ने हर दिन आधा किलो नंदिनी दूध, हर महीने पांच किलो मोटा अनाज और बेघर ग़रीबों के लिए दस लाख घर बनाने का वादा भी किया.

आक्रामक हुआ चुनाव अभियान

नरेंद्र मोदी मंच पर बजरंग बली की मूर्ति स्वीकार करते हुए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में बजरंग बली का नारा लगा रहे हैं

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इमेज कैप्शन, नरेंद्र मोदी मंच पर बजरंग बली की मूर्ति स्वीकार करते हुए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में बजरंग बली का नारा लगा रहे हैं

लेकिन कांग्रेस के घोषणा पत्र के एक छोटे से पैराग्राफ़ ने उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निशाने पर ला दिया.

दरअसल कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में बजरंग दल, पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) और अन्य संगठनों पर कार्रवाई का वादा किया है.

बीजेपी कांग्रेस पर बजरंग दल की तुलना प्रतिबंधित संगठन पीएफ़आई से करने को लेकर हमलावर हो गई है. पीएफ़आई पर 'कथित आतंकवादी संगठनों' से फंड लेने के आरोप भी लगे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों की शुरुआत जय बजरंग बली का नारा लगाकर की.

नरेंद्र मोदी ने लोगों से कहा कि जब वो मतदान करने जाएं तो जय बजरंग बली का नारा लगाकर वोट डालें.

कांग्रेस ने इसके जवाब में साल 2014 में गोवा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के श्रीराम सेना संगठन पर प्रतिबंध लगाने की तुलना करके दिया.

मनोहर पर्रिकर बीजेपी के ही मुख्यमंत्री थे. कांग्रेस ने तर्क दिया, 'क्या जब गोवा में श्रीराम सेना पर प्रतिबंध लगाया गया था तब प्रधानमंत्री ने इसे भगवान राम का अपमान कहा था.'

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक प्रेस वार्ता में कहा, "तब ऐसा कुछ नहीं कहा गया था. अब तोड़ मरोड़कर इसे पेश किया जा रहा है. बजरंग दल की तुलना बजरंग बली से नहीं की जा सकती है और ना ही बजरंग दल बजरंग बली बन सकता है."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कर्नाटक में चुनाव अभियान शुरू करने से एक दिन पहले कांग्रेस के सबसे गंभीर नेताओं में शामिल किए जाने वाले पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी के ख़िलाफ़ बयान देते हुए उन्हें 'ज़हरीला सांप' कह दिया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी अब तक 91 बार उन्हें गाली दे चुकी है और इसके अगले दिन अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "उन्होंने मुझे सांप कहा है, लेकिन सांप भगवान शिव के गले का हार है. मैं इस देश के लोगों और कर्नाटक के लोगों को शिव मानता हूं. ऐसे में इस बयान का स्वागत करता हूं."

इसके अगले दिन प्रियांक खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी को नालायक बेटा कह दिया. इससे प्रधानमंत्री मोदी को एक और आसान मुद्दा मिल गया. प्रियांक खड़गे चित्तापुर विधानसभा सीट से दोबारा चुने जाने के लिए मैदान में हैं.

क्या कांग्रेस के सामने चायवाला विवाद जैसी स्थिति हो गई है?

मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव अभियान का मुद्दा बनाया

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साल 2014 के आम चुनावों से पहले जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था उसके कुछ दिन बाद ही कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी को चायवाला कह दिया था.

इसके बाद बीजेपी ने कांग्रेस के ख़िलाफ़ चाय पर चर्चा नाम से एक आक्रामक चुनावी अभियान शुरू कर दिया था. कांग्रेस को चुनाव में इसका नुक़सान उठाना पड़ा था.

ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस में उठे ताजा राजनीतिक विवादों का कांग्रेस और बीजेपी के लिए चुनावों में क्या असर हो सकता है.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इसका चुनावों पर कोई ख़ास असर नहीं होगा. राजनीतिक विश्लेषक डी उमापथी कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान शुरू करने से बहुत पहले ही बीजेपी राज्य में ध्रुवीकरण के अपने अभियान को छोड़ चुकी थी. पार्टी ने धार्मिक ध्रुवीकरण के अपने एजेंडे को राज्य में छोड़ा क्योंकि पार्टी को अहसास हो गया था कि इससे बहुत फ़ायदा नहीं होने जा रहा है. लोगों के सामने रोज़ी-रोटी और महंगाई का सवाल था, बेरोज़गारी बड़ा मुद्दा थी. इसके अलावा सरकार विरोधी लहर का सामना भी बीजेपी कर रही है."

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर ए नारायण भी डी उमापथी की बात से सहमत नज़र आते हैं.

प्रोफ़ेसर नारायण कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि इस तरह के विवादों का ज़मीनी स्तर पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा. हाल के दिनों में मैंने गांवों में लोगों से बात की है और मुझे ये समझ आया है कि बजरंग दल या ऐसे ही दूसरे मुद्दों का ज़मीनी स्तर पर कोई ख़ास असर नहीं है. लोग कोई सवाल करने से पहले ही राज्य में बीजेपी सरकार की आलोचना शुरू कर देते हैं."

प्रियंका गांधी ने अपने चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि मोदी मुद्दों की बात नहीं करते बल्कि किसी बच्चे की तरह शिकायत करते रहते हैं कि उन्हें गाली दी जा रही है

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इमेज कैप्शन, प्रियंका गांधी ने अपने चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि मोदी मुद्दों की बात नहीं करते बल्कि किसी बच्चे की तरह शिकायत करते रहते हैं कि उन्हें गाली दी जा रही है

वहीं प्रोफ़ेसर शास्त्री ने इससे पहले एक साक्षात्कार में कहा था कि चुनाव अभियान के अंतिम सप्ताह में पता चलेगा कि कांग्रेस बीजेपी की आक्रामकता का मुक़ाबला कर पाती है या नहीं. शास्त्री कहते हैं, "अब ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने बीजेपी के हमलों को झेल लिया है."

प्रोफ़ेसर शास्त्री लोकनीति नेटवर्क के सह-निदेशक भी हैं. लोकनीति नेटवर्क ने सीएसडीएस के साथ एनडीटीवी चैनल के लिए चुनावी सर्वे किया है. इस सर्वे से संकेत मिले हैं कि राज्य में बीजेपी को 61 प्रतिशत सरकार विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है.

इसके अलावा 57 फ़ीसदी लोग बीजेपी की सरकार की वापसी नहीं चाहते हैं और मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे पसंदीदा नेता सिद्धारमैया हैं.

मुख्यमंत्री बसावराज बोम्माई को 22 प्रतिशत लोग वापस चाहते हैं जबकि जेडीएस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी को 15 प्रतिशत लोग पसंद करते हैं. येदियुरप्पा इस बार मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं. राज्य के पांच प्रतिशत लोग चाहते हैं कि वो मुख्यमंत्री बनें जबकि कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार 4 प्रतिशत लोगों की पसंद हैं.

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