कर्नाटक चुनाव में हार से बीजेपी क्या सबक लेगी, एन. राम ने क्या बताया

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- Author, मुरलीधरन काशीविश्वनाथन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तमिल सेवा
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है. कांग्रेस ने बहुमत से क़रीब दो दर्जन ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल की है.
कांग्रेस की इस जीत पर बीबीसी की तमिल सेवा ने द हिंदू समूह के निदेशकों में से एक और वरिष्ठ पत्रकार एन. राम से बातचीत की और चुनाव के नतीजे को समझने की कोशिश की.
कांग्रेस की जीत पर में किन बातों का योगदान रहा?
यह कांग्रेस के लिए बड़ी जीत है. आप कह सकते हैं कि कांग्रेस अपने सबसे निचले स्तर पर है, इस जीत से उनका हौसला बढ़ेगा.
लेकिन यह अपने आप नहीं हुआ, इसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है. बीजेपी यहां सत्ता में थी, इसलिए एंटी इनकंबेंसी का भी कुछ योगदान रहा है.
दूसरी तरफ़ कांग्रेस के अंदर भी गुटबाज़ी थी. इस बात को लेकर भी विवाद था कि कांग्रेस की जीत पर मुख्यमंत्री कौन बनेगा. फिर उन्होंने एकजुट होकर चुनाव लड़ा और यह कांग्रेस नेतृत्व की जीत है.
कर्नाटक राज्य कांग्रेस में सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार जैसे दो बड़े नेता हैं. सिद्धारमैया बहुत प्रभावशाली रहे हैं, वहीं शिवकुमार काफ़ी मेहनती हैं. इन चुनावों में दोनों ने मिलकर काम किया है.
इस कामयाबी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की बड़ी भूमिका रही. प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने भी जमकर चुनाव प्रचार किया. इस चुनाव पर राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' का भी असर रहा.

चुनाव के बाद के सभी सर्वे में कांग्रेस को बढ़त दिखाई गई थी. कांग्रेस को क़रीब 43 फ़ीसदी वोट मिले हैं. भारत में हाल में हुए चुनावों को देखते हुए महत्वपूर्ण है.
बीजेपी को क़रीब 36 फ़ीसदी वोट मिले हैं. हालांकि उसके वोट प्रतिशत में ज़्यादा कमी नहीं आई है, लेकिन बीजेपी की तुलना में कांग्रेस को सात फ़ीसदी ज़्यादा वोट मिले हैं.
कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में दो नेता हैं. लेकिन इस पद के लिए कौन होगा पार्टी की पसंद?
प्रदेश के लिए नया मुख्यमंत्री चुनना निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेता इसे संभाल लेंगे.
मौजूदा समय में सिद्धारमैया का दावा मज़बूत दिख रहा है, लेकिन डी.के. शिवकुमार को भी उपयुक्त पद देना होगा. उन्होंने कई कुर्बानियां दी हैं. जेल जाने के बाद भी वे बिना किसी डर या हिचक के, कांग्रेस के साथ रहे.
अगर उन्हें पद नहीं मिलता है तो उनके समर्थक मायूस हो सकते हैं. मुझे लगता है कि ये दोनों नेता मिलकर काम करेंगे.
कर्नाटक में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला है, लेकिन क्या आने वाले वक्त में 'ऑपरेशन कमल' जैसे अभियानों की संभावना है?
यहां लोगों ने इसके लिए कोई मौक़ा नहीं दिया है. कांग्रेस ने 224 में से 135 सीटें जीती हैं. इसके अलावा कई जगहों पर जनता दल (सेक्युलर) की भी जीत हुई है.
बीजेपी के पास महज 66 सीटें हैं. इसलिए कर्नाटक में दोबारा कमल खिलने की संभावना नहीं है. इतनी कम सीटें मिलने के बाद मुझे नहीं लगता कि वे सरकार बनाने की कोशिश भी करेंगे.
ऐसा करने की किसी कोशिश का लोगों में ग़लत संदेश जाएगा. ऐसी स्थिति तब आती जब दोनों दल बहुमत के आसपास होते.

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क्या कर्नाटक की जनता ने बीजेपी के हिंदुत्व को खारिज कर दिया है?
अवश्य कह सकते हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी वहां जाने पर हनुमान के नारे लगाए. यह चुनाव संबंधी नियमों के ख़िलाफ़ था.
वो कह सकते हैं कि लोग कहते हैं कि स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इससे वे विचारधारा की असफलता से बच नहीं सकते. यह हिन्दुत्व विचारधारा की भी नाकामी है.
अब पूरे दक्षिण भारत में बीजेपी सत्ता से बाहर है. कर्नाटक में बीजेपी अब घटकर 64 स्थानों पर आ गई है, जो सबसे ख़राब स्थिति है.
दक्षिण भारत में हिंदुत्व के ख़िलाफ़ अब एक मजबूत दीवार खड़ी हो गई है, इसके लिए कांग्रेस ने काफ़ी मेहनत की है. कांग्रेस नेताओं ने अच्छे से अभियान चलाया.
पीएम मोदी का प्रचार केवल बेंगलुरु में रंग लाया. एक बात और है, लोगों ने फ़िलहाल बीजेपी की राजनीति को खारिज़ कर दिया है. लेकिन, इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि लोकसभा चुनाव के नतीजे कैसे आएंगे.
कर्नाटक में बीजेपी की ओर से अधिकांश फ़ैसले बी.एल. संतोष ने लिए. वहीं प्रदेश में सरकार का नेतृत्व बासवराज बोम्मई कर रहे थे, जबकि पीएम मोदी ने यहां ज़ोरदार प्रचार किया- ऐसे में सवाल उठता है कि इस हार की ज़िम्मेदारी किसकी है?
पूरी पार्टी को हार की ज़िम्मेदारी लेनी होगी. सब मिलकर काम करते हैं, लेकिन हार की प्रमुख वजह राज्य सरकार का रवैया रहा है. लोगों को यह सरकार पसंद नहीं आई.
इस नाकामी में केंद्रीय नेतृत्व की भी भूमिका है. कुल मिलाकर लोगों ने बीजेपी को नापसंद किया है.

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आगामी चुनावों पर क्या असर होगा?
आगामी चुनावों के लिए यह संकेत हो सकता है. लेकिन जहां तक लोकसभा चुनाव का सवाल है, ऐसे नतीजों की उम्मीद नहीं की जा सकती.
कई राज्यों में विधानसभा चुनाव परिणाम और संसदीय चुनाव परिणाम अलग-अलग रहे हैं. इस चुनावी हार को देखते हुए कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत में बीजेपी के ख़िलाफ़ लहर है.
कांग्रेस के लिए, गठबंधनों को ठीक से संभालने की ज़रूरत है. गठबंधन को सही से चलाने में कांग्रेस की दिलचस्पी कम हो गई है.
सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए इसे बखूबी निभाया. उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राजनीति को लोकतांत्रिक तरीके से निभाया. अब आगे ऐसा होगा या नहीं, देखना बाक़ी है.
जहां तक गठबंधन की बात है, राहुल गांधी का नज़रिया अलग है. उदाहरण के लिए समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है, लेकिन कांग्रेस उनके ख़िलाफ़ प्रचार कर रही है. अगर इस प्रवृत्ति को उलटा जा सके तो कांग्रेस एक बड़ी ताक़त के रूप में फिर से उभरेगी.
इसके लिए उसे राज्य में तीसरे स्थान पर रहे जनता दल सेक्युलर के साथ भी संबंध रखने होंगे.
आने वाले समय में राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव है. क्या हम कह सकते हैं कि कर्नाटक चुनाव की जीत ने कांग्रेस की उम्मीदों को बढ़ा दिया है?
एन. राम कहते हैं, "मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास मौक़ा होगा. मुझे नहीं पता कि राजस्थान में एंटी इनकंबेंसी का फ़ैक्टर कितना बड़ा है."
"लेकिन वहां पार्टी मजबूत है. सचिन पायलट ने अशोक गहलोत से मतभेदों के बाद भी पार्टी नहीं छोड़ी है."

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बीजेपी को क्या सबक मिला है?
वे कोई सबक नहीं लेते हैं. वे कहते हैं कि हम भविष्य को ध्यान में रखकर काम करते हैं. वे केवल अपने काम करने के तरीक़े को बदलेंगे, लेकिन हिंदुत्व संबंधी अपनी विचारधाराओं को नहीं छोड़ेंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में चुनाव आयोग, स्पीकर और राज्यपाल पर कई अहम फ़ैसले दिए हैं. ऐसे में लोगों को और अदालतों को भी ग़लत करने से बचना चाहिए.
कोर्ट ने अपने कई फ़ैसलों ने एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य में संविधान की भूमिका की ओर इशारा किया है. उनका स्वागत होना चाहिए.
जहां तक भाजपा नेताओं का सवाल है, अगर सुप्रीम कोर्ट रोक लगाती है तो वे पीछे हट जाएंगे. अवरोध दूर होने पर फिर वे अपने रास्ते पर आ जाएंगे यानी वे कोई सबक नहीं लेंगे.
अमित शाह ने कहा है कि वे अगले 15-20 साल को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं. इसलिए इस हार का बीजेपी पर बहुत असर नहीं होगा.
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