कर्नाटक में जीत के बाद क्या विपक्षी एकता की धुरी बन पाएगी कांग्रेस

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद राहुल गांधी ने कहा कि ये नफ़रत के ख़िलाफ़ मोहब्बत की जीत है

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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नाचते-गाते कांग्रेसी कार्यकर्ता, मीडिया के कैमरों के सामने हंसकर बात करते नेता और जीत का जोश. कांग्रेस दफ़्तर पर कई साल बाद ये नज़ारा दिखा है.

कांग्रेस में कर्नाटक की प्रचंड जीत की तरफ़ बढ़ने के बाद मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि 2024 में राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे.

कांग्रेस ने अपने सोशल मीडिया के ज़रिए राहुल गांधी को कर्नाटक की जीत का श्रेय दिया. कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भी राहुल गांधी का नाम लेते नज़र आए.

दक्षिण भारत का द्वार कहे जाने वाले कर्नाटक में बीजेपी का क़िला ध्वस्त करके कांग्रेस निश्चित रूप से मज़बूत स्थिति में आई है. किसी बड़े राज्य में लंबे समय बाद कांग्रेस को जीत हासिल हुई है.

कांग्रेस की जीत के बाद दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा, "कर्नाटक में नफ़रत का बाज़ार बंद हुआ है, मोहब्बत की दुकानें खुली है. ये सबकी जीत है, सबसे पहले ये कर्नाटक की जनता की जीत है."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुआंधार चुनाव प्रचार और आक्रामक अभियान के बावजूद कांग्रेस कर्नाटक में अपने मुद्दों पर टिकी रही और एक बड़ी जीत हासिल की है.

विश्लेषक मानते हैं कि इस जीत के बाद निश्चित तौर पर कांग्रेस का मनोबल बढ़ेगा. केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक रूप से बेहद मज़बूत है और आगामी लोकसभा चुनावों में बीजेपी से टक्कर लेने के लिए विपक्ष को एकजुट करने की आवाज़े उठती रहीं हैं.

विपक्षी एकता की बात तो बार-बार होती है लेकिन बीजेपी के नरेंद्र मोदी जैसे ताक़तवर नेता के सामने विपक्ष का चेहरा कौन होगा इसे लेकर संशय बना रहता है.

कांग्रेस का दावा होगा मज़बूत?

हाल ही में राहुल गांधी ने नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव से दिल्ली में मुलाक़ात की थी

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विश्लेषक मानते हैं कि कर्नाटक में जीत के बाद अब विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने का कांग्रेस का दावा और भी मज़बूत होगा.

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता कहती हैं, "अभी तक जो चुनावी नतीजे आए थे उनमें कांग्रेस बैकफुट पर ही रही थी लेकिन कांग्रेस का विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने का दावा इस जीत से मज़बूत होगा क्योंकि ये जीत एक बड़े राज्य में और बड़े अंतर से हुई है."

हालांकि पहले से ही कई राज्यों में विपक्षी दल एकजुट हैं. बिहार में कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड का महागठबंधन सत्ता में हैं. झारखंड में भी झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राजद का गठबंधन सत्ता में है. महाराष्ट्र में पिछले साल सत्ता परिवर्तन होने से पहले तक शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का महाविकास अघाड़ी गठबंधन सत्ता में था.

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का गठबंधन बनाने की कोशिशें तो हो रही हैं लेकिन इसे अभी कोई स्पष्ट रूप नहीं दिया जा सका है.

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ अलग-अलग राज्यों में पहले से ही गठबंधन मौजूद है और जहां अन्य क्षेत्रीय पार्टियां नहीं हैं वहां सीधे मुक़ाबला कांग्रेस और बीजेपी में है.

क्या कर्नाटक की जीत से विपक्ष के गठबंधन में कांग्रेस का दावा और मज़बूत होगा इस सवाल पर उर्मिलेश कहते हैं, "कांग्रेस अगर कर्नाटक में ना भी जीतती तो भी वह कई क्षेत्रीय पार्टियों के मुक़ाबले में मज़बूत ही रहती. कांग्रेस कर्नाटक की जीत से पहले भी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है."

"अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं. इन तीनों ही राज्यों में बीजेपी बनाम कांग्रेस मुक़ाबला होता है. अगर इन राज्यों में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो ये कांग्रेस को और मज़बूत करेगा. विपक्ष के गठबंधन की धुरी कांग्रेस ही रहेगी, इसमें कोई राय नहीं है."

उर्मिलेश कहते हैं, "ये कहा जा सकता है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ पहले से ही विपक्ष राज्य स्तर पर एकजुट है, इसे राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की ज़रूरत है. लेकिन ये कहना है कि पूरे भारत में बीजेपी के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ विपक्ष का एक ही उम्मीदवार हो, ये भारत जैसे विविध राष्ट्र में व्यवहारिक नहीं है."

हालांकि उर्मिलेश कहते हैं कि अभी तक विपक्ष के किसी नेता ने ये नहीं कहा है कि गठबंधन का चेहरा वही होगा, सभी एकजुटता के लिए प्रयास ज़रूर कर रहे हैं.

उन्होंने कह कि विपक्ष की एकता को कई बार इस तरह पेश कर दिया जाता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्ष का एक ही उम्मीदवार हो.

'बॉस बनने की कोशश ना करे कांग्रेस'

बैंगलोर में कांग्रेस पार्टी के दफ़्त के बाहर का नज़ारा
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वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी मानते हैं कि कर्नाटक में इस जीत से कांग्रेस को संजीवनी ज़रूर मिली है लेकिन कांग्रेस को विपक्ष का बॉस बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

त्रिवेदी कहते हैं, "ये कहना थोड़ा जल्दबाज़ी है कि विपक्ष के गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए कांग्रेस का दावा मज़बूत होगा. कांग्रेस विपक्षी एकता को मज़बूत करने की भूमिका में ज़रूर आ सकती है. ये कहा जा सकता है कि इन नतीजों से कांग्रेस को एक संजीवनी मिली है."

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "लेकिन कांग्रेस को ये नहीं समझना चाहिए कि वो अब विपक्ष के गठबंधन की बॉस बन जाएगी."

जीत के बाद कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी को जीत का श्रेय दिया. हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि कर्नाटक में जीत का पूरा श्रेय राहुल गांधी को देना सही नहीं है.

स्मिता गुप्ता कहती हैं, "कर्नाटक में जीत के लिए कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व को अधिक श्रेय दिया जाना चाहिए. डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के हाथ में नेतृत्व था. मल्लिकार्जुन खड़गे कर्नाटक से हैं और इसी साल पार्टी के अध्यक्ष बनें. कर्नाटक में जो नतीजे आए हैं उसके पीछे स्थानीय नेतृत्व है."

"स्थानीय नेतृत्व ने स्थानीय मुद्दों पर ये चुनाव लड़ा और बड़ी जीत हासिल की. हालांकि कांग्रेस इस जीत का श्रेय भारत जोड़ो यात्रा और राहुल गांधी को दे रही है. लेकिन तथ्यात्मक रूप से ये सही नहीं है. कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को सिर्फ़ इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने स्थानीय नेताओं पर भरोसा किया."

वहीं उर्मिलेश कहते हैं कि इस साल फ़रवरी में छत्तीसढ़ में हुए अधिवेशन के बाद से कांग्रेस का नज़रिया बदला है और वो और उसका प्रबंधन बेहतर हुआ है.

उर्मिलेश कहते हैं, "कांग्रेस ने सामाजिक न्याय के मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल किया है. छत्तीसगढ़ अधिवेशन में कांग्रेस ने जो एजेंडा बनाया था उसे वो लागू कर रही है और यह भी उसके बेहतर प्रदर्शन का एक कारण है."

राहुल गांधी की छवि होगी मज़बूत?

राहुल गांधी

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वहीं विजय त्रिवेदी मानते हैं कि कर्नाटक में जीत से राहुल गांधी की छवि मज़बूत होगी.

त्रिवेदी कहते हैं, "भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी ने जो छवि गढ़ी है, इस जीत से उसमें इज़ाफ़ा ही होगा. लेकिन कर्नाटक में राहुल गांधी का स्ट्राइक रेट 35 प्रतिशत रहा है, यानि जिन सीटों पर उन्होंने प्रचार किया उनमें से 35 प्रतिशत सीटें ही पार्टी ने जीती हैं. बावजूद इसके ये कहा जा सकता है कि राहुल गांधी ने कर्नाटक में कांग्रेस के लिए एक मोमेंटम बनाया."

विश्लेषक मानते हैं कि कर्नाटक में कांग्रेस की ये जीत अप्रत्याशित नहीं हैं और इसका बड़ा कारण बीजेपी की सरकार का बुरी तरह नाकाम रहना है.

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "कांग्रेस की ये जीत अप्रत्याशित नहीं है. कांग्रेस को बड़ा बहुमत मिला है, इस नज़रिये से ज़रूर कहा जा सकता है कि ये जीत बड़ी है. कर्नाटक में कांग्रेस ने एकजुट होकर काम किया. पूरी कांग्रेस राज्य में एकजुट रही लेकिन अगर गहनता से विश्लेषण किया जाये तो ये कहा जा सकता है कि इन नतीजों का बड़ा कारण बासवराज बोम्मई की सरकार का बुरी तरह नाकाम होना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धुआंधार प्रचार किया और तटीय कर्नाटक पर सांप्रदायिक मुद्दों का असर रह. अगर ऐसा नहीं होता तो बीजेपी की हालत और भी ख़राब होती."

वहीं उर्मिलेश मानते हैं कि कर्नाटक में लोगों ने हिंदुत्व की राजनीति को नकार दिया और यही कांग्रेस की जीत का बड़ा कारण है.

उर्मिलेश कहते हैं, "दक्षिण भारत हमेशा हिंदुत्ववादी राजनीति के विरुद्ध रहा है. कर्नाटक इसका अवपाद रहा है. कर्नाटक में भी बीजेपी ने सरकारें ज़रूर बनाई हैं लेकिन स्पष्ट बहुमत कभी हासिल नहीं हुआ है. दक्षिण में कर्नाटक का द्वार अब ध्वस्त हो गया है."

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