मध्य प्रदेश: पार्टी छोड़ कर जा रहे बड़े नेताओं ने कैसे बढ़ा दी है भाजपा की चिंता

कैलाश विजयवर्गीय ने मंगलवार को दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात की

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल

मध्य प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में बीते पांच मई को पार्टी के एक कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बयान ने संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ा दी है.

विजयवर्गीय ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा था, "मुझे ये कहते हुए कोई संकोच नहीं है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी बीजेपी को हरा नहीं सकती है. क्योंकि कांग्रेस में दम नहीं है कि वो बीजेपी को हरा सके. लेकिन अगर हम संगठन की ग़लतियां ठीक नहीं करते हैं तो बीजेपी ख़ुद अपनी हार का कारण बन सकती है."

विजयवर्गीय के बयान ने पार्टी को इसलिए भी चिंता में डाला क्योंकि प्रदेश में विधान सभा के चुनाव दस्तक दे रहे हैं और इससे ठीक पहले नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच से बग़ावत के सुर भी बुलंद होने लगे हैं. प्रदेश के कुछ बड़े नेता अब खुलकर पार्टी और कुछ नेताओं की आलोचना भी करने लगे हैं.

राज्य सभा के पूर्व सांसद और भाजपा के वरिष्ठ नेता रघुनन्दन शर्मा ने भी सार्वजनिक तौर पर संगठन के कार्यकलापों की आलोचना करनी शुरू कर दी है.

उनका आरोप है, "पांच नेताओं को प्रदेश के संगठन को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है. लेकिन वो संगठन चला ही नहीं पा रहे हैं." उन्होंने प्रदेश संगठन के हाल की तुलना 'द्रौपदी' से भी कर डाली.

जो नेता मुखर हो कर पार्टी की आलोचना कर रहे हैं उनमे पूर्व विधायक सत्यनारायण सत्तन, पूर्व विधायक भंवर सिंह शेखावत, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे और पूर्व राज्य मंत्री और पूर्व सांसद अनूप मिश्र, उमा भारती के अलावा जैन समुदाय से आने वाले कद्दावर नेता मुकेश जैन शामिल हैं.

इसी असंतोष को ख़त्म करने के लिए विजयवर्गीय और उनके साथ 13 और नेताओं को नाराज़ नेताओं को मनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है.

कैलाश जोशी के बेटे का जाने का असर

पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से मुलाक़ात करते दीपक जोशी

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लेकिन इसी बीच संगठन को एक बड़ा झटका तब लगा जब पूर्व मुख्यमंत्री और जन संघ संस्थापकों में से एक कैलाश जोशी के पुत्र और तीन बार विधायक रह चुके दीपक जोशी ने औपचारिक रूप से कांग्रेस का हाथ थाम लिया.

जोशी के साथ दतिया के पूर्व विधायक राधेलाल बघेल भी कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल हो गए. दोनों नेताओं को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने पार्टी की सदस्यता प्रदान की.

नए संगठन की सदस्यता लेने के बाद दीपक जोशी बेहद भावुक नज़र आए क्योंकि उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक थे और वो संगठन में एक बड़ा नाम और इज्ज़त रखते थे.

दिलीप जोशी ने पार्टी छोड़ने के बाद उस घटना को याद किया जब उनकी पत्नी की कोरोना की वजह से इंदौर में मौत हो गयी थी.

उन्होंने आरोप लगाया कि जब उनकी पत्नी की तबियात बिगड़ने लगी तो उन्होंने मुख्यमंत्री से मदद की गुहार की थी. लेकिन उनको कोई मदद नहीं मिल सकी और एम्बुलेंस की व्यवस्था नहीं हो पाने की वजह से उनकी पत्नी ने दम तोड़ दिया.

दीपक जोशी का भी मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि 2018 के विधानसभा के चुनावों में उन्हें कांग्रेस के मनोज चौधरी ने हरा दिया था.

लेकिन चौधरी ज्योतिरादित्य के उस समूह में शामिल थे जिसने कांग्रेस को छोड़ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था और प्रदेश में कमलनाथ की सरकार को गिरा दिया था.

जोशी की शिकायत ये भी थी कि उन्हें राज्य इकाई से महत्व मिलना बंद हो गया था.

शिवराज की चुनौती

शिवराज सिंह चौहान

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राज्य में इस साल होने वाले चुनावों की तैयारी के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पूरे प्रदेश का "तूफ़ानी दौरा" कर रहे हैं.

वो हर ज़िले में कोई न कोई बड़ी परियोजना की शुरुआत कर भी रहे हैं. लेकिन घर के अन्दर यानी संगठन में चल रहा असंतोष उनके लिए परेशानी का कारण बना हुआ है.

रविवार को जब वो अचानक दिल्ली गए तो अटकलों का बाज़ार गर्म हो गया. हालांकि मुख्यमंत्री के करीबी सूत्रों का कहना है कि संगठन में चल रहे घमासान से मुख्य मंत्री के दिल्ली दौरे को जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए.

प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल कहते हैं कि दीपक जोशी के संगठन से चले जाने का कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि "40 लाख भाजपा के कार्यकर्ता कैलाश जोशी जी के सपनों को आगे बढाने का काम करेंगे."

हालांकि अग्रवाल ने अफ़सोस जताते हुए कहा कि "कैलाश जोशी ने आपातकाल के समय 19 महीनों तक जेल काटी थी और कांग्रेस की यातनाएं झेलते रहे थे."

बीजेपी में सबको साथ लेकर चलने की चुनौती

दीपक जोशी हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं

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इसी बीच मध्य प्रदेश के दौरे पर आए केंद्रीय इस्पात राज्यमंत्री फग्गन सिंह का कहना था कि भारतीय जनता पार्टी का संगठन विशाल है और यही वजह है कि इसमें सभी को समायोजित कर पाना बहुत मुश्किल काम है.

पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में राजनीति का जो चरित्र है वो उत्तर प्रदेश और बिहार के जैसा नहीं है. मध्य प्रदेश में जिस नेता ने संगठन का साथ छोड़ा वो कुछ कर नहीं पाया. इतिहास इस बात का साक्षी है."

वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना मानते हैं कि भाजपा माने या ना माने, इस बार उसे न सिर्फ़ सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है बल्कि पार्टी के अन्दर की बग़ावत ने भी चिंता बढ़ा दी है.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "मध्य प्रदेश में भाजपा के लगातार सत्ता में रहने के कारण संगठन न केवल कमज़ोर हुआ है, बल्कि उसकी सत्ता पर निर्भरता भी बढ़ गई है. जिस पार्टी को कुशाभाऊ ठाकरे, कैलाश जोशी, नारायण प्रसाद गुप्ता, प्यारेलाल खंडेलवाल और सुंदर लाल पटवा ने प्रदेश में खड़ा किया था वो शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में सत्ता के इशारों पर काम करने को मजबूर हो गयी है."

संजय सक्सेना के मुताबिक मध्य प्रदेश में भाजपा की सत्ता और उसके संगठन में समन्वय की कमी साफ़ दिखने लगी है.

राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि भारतीय जनता पार्टी को फिलहाल संगठन के असंतुष्ट नेताओं से निपटने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है जिसे पूरा किए बिना उन्हें चुनावों में बेहतर परिणामों की कोई गारंटी नहीं मिल सकती.

सक्सेना के मुताबिक प्रदेश भाजपा में मौजूदा समय में 'कैडर की बजाय गुट' चलने लगे हैं.

बीजेपी ने मध्य प्रदेश में भीतरघात से निबटने की ज़िम्मेदारी कैलाश विजयवर्गीय को दी है

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वो कहते हैं, "फ़िलहाल भाजपा में तीन गुट तो प्रमुख तौर पर दिख रहे हैं. पार्टी का संगठन, शिवराज सिंह चौहान का खेमा और ज्योतिरादित्य सिंधिया का खेमा. एक गुट उन लोगों का भी बन रहा है जो संगठन में अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगे हैं."

विश्लेषकों को लगता है कि सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के सामने इस बार ये है कि विधानसभा में उनकी 127 सीटों में से 18 ऐसी सीटें हैं जिन पर कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर आए विधायक हैं. इसके अलावा नौ सीटें ऐसी हैं जिन पर कांग्रेस से दल बदल कर आए हुए नेता उपचुनाव के हारने के बाद भी फिर से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषक राशिद किदवई कहते हैं कि इसमें कोई शक़ नहीं कि इस बार भाजपा के सामने विधानसभा के चुनावों को लेकर काफ़ी चुनौतियां हैं.

उन्होंने बताया, "पिछले कई सालों से भाजपा शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर चुनाव लड़ती रही है. वही मुख्यमंत्री बनते आए हैं और उन्हें सत्ता विरोधी लहर का सामना भी करना पड़ेगा. ये भी सच है कि पिछली विधानसभा के चुनावों में जनादेश उनके साथ नहीं था. पिछली बार मध्य प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को सत्ता की कुंजी सौंपी थी."

किदवई बताते हैं, "चुनाव आ गए हैं और इसी लिए अब एक छीना झपटी का माहौल शुरू हो गया है. कुछ नेता भाजपा छोड़ कर जा रहे हैं, कुछ जाने वाले हैं. यूं समझिए जैसे प्रवासी पक्षियों के साथ होता है जो एक ख़ास मौसम में प्रवास पर निकल जाते हैं, वैसे ही चुनाव में भी प्रवासी नेताओं का दौर शुरू हुआ है. इसे एक मौसमी फ्लू की तरह भी देख सकते हैं जो कोई नयी बात नहीं है. कुछ चुनाव से पहले जाते हैं. कुछ चुनाव होने के बाद."

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