कर्नाटक विधानसभा चुनाव: कांग्रेस जीती तो कौन बनेगा मुख्यमंत्री?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कर्नाटक में समस्या की जड़ को पकड़ते हुए सीधे अपनी पार्टी के नेताओं को कड़ा संदेश दिया है.
खड़गे ने कहा कि कर्नाटक के कांग्रेस नेता इस बात की फ़िक्र न करें कि 10 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद कौन मुख्यमंत्री बनेगा. ये चिंता करने के बजाय उन्हें अपना ध्यान हर हाल में 150-160 सीटें जीतने पर लगाना चाहिए.
खड़गे ने कड़ा संदेश देने वाला ये भाषण, कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दो उम्मीदवारों, प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की मौजूदगी में दिया. उस वक़्त मंच पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे.
ये जनसभा कोलार में उसी जगह हुई थी, जहां पर राहुल गांधी ने अपनी वो चर्चित तक़रीर की थी, जिसके बाद लोकसभा की उनकी सदस्यता चली गई.
खड़गे ने उस जनसभा में कहा था कि, 'मै सबको ये बात साफ़ कर देना चाहता हूं. मैं इस बात को लेकर ज़रा भी परेशान नहीं हूं कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा. मेरी एक ही चिंता है कि कांग्रेस को सत्ता में वापस आना चाहिए, जिससे इंदिरा कैंटीन, छात्रों को पढ़ने के लिए मुफ़्त किताबें देने और जनता के बीच लोकप्रिय अन्य योजनाएं फिर से शुरू की जा सकें. मुख्यमंत्री का चुनाव आलाकमान और विधायकों के फ़ैसले से होता है. आप सिर्फ़ जनता के बारे में सोचें और बाक़ी फ़ैसले आलाकमान पर छोड़ दें.'
ये पहली बार है जब मल्लिकार्जुन खड़गे ने कर्नाटक में चल रही नेतृत्व की लड़ाई पर कुछ बोला था और वो भी सार्वजनिक रूप से.
ये भी पहली बार ही था कि कांग्रेस अध्यक्ष ने साफ़ साफ़ कह दिया कि वो नीलम संजीव रेड्डी की तरह मुख्यमंत्री पद की रेस में नहीं हैं. 1962 में नीलम संजीव रेड्डी कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए मुख्यमंत्री पद की होड़ में शामिल थे.

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सबके लिए संदेश
खड़गे का ये बयान, प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के लिए भी संदेश था, जिन्होंने पिछले हफ़्ते मीडिया से कहा था वो मल्लिकार्जुन खड़गे के 'मातहत काम करना पसंद' करेंगे, जो उनसे कई साल सीनियर हैं.
जब एक प्रेस कांफ्रेंस में शिवकुमार से पूछा गया था कि क्या वो खड़गे के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी का बलिदान देने को तैयार हैं, तो शिवकुमार ने मीडिया से कहा था कि, 'वो मेरे नेता और कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. मैं उनके नेतृत्व में काम करना पसंद करता हूं. अपने राज्य के लिए और अपने देश के लिए वो एक मूल्यवान नेता हैं. वो मुझसे कोई बीस बरस सीनियर हैं. मैं 1985 में विधानसभा में आया और खड़गे 1972 में ही विधानसभा सदस्य बन गए थे.'
शिवकुमार ने कहा, "आलाकमान के कहने पर खड़गे ने आधी रात को कांग्रेस विधायक दल के नेता पद से इस्तीफ़ा दे दिया था."
साल 2009 में जब सिद्धारमैया कांग्रेस विधायक दल के नेता बनने वाले थे, तो खड़गे इस्तीफ़ा देकर राष्ट्रीय राजनीति में चले गए थे.
उन्होंने कहा, "उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर काम शुरू किया और आज वो कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर हैं, जो किसी और पार्टी में मुमकिन नहीं है. ये केवल कांग्रेस में ही संभव है."
"खड़गे के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस की राज्य इकाई को वो ताक़त मिली है, जिसकी उसको सख़्त दरकार थी. तो, मैं उनकी इच्छा के ख़िलाफ़ कोई काम नहीं करूंगा."
शिवकुमार ने ये बात सिद्धारमैया के उस बयान के बाद कही थी, जब सिद्धारमैया ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि विधायक दल के नेतृत्व का फ़ैसला इस बात पर होगा कि विधायकों की राय क्या है और आलाकमान विधायकों की राय पर ही चलेगा.
मल्लिकार्जुन खड़गे तीन बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनते बनते चूक गए थे. पहली बार 1999 में, जब पार्टी हाईकमान ने एस एम कृष्णा को मुख्यमंत्री बनाया था.
दूसरी बार वो तब चूके जब किंगमेकर और जेडीएस के अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा ने कांग्रेस और जेडीएस की साझा सरकार के नेतृत्व के लिए खड़गे के ऊपर धरम सिंह को तरज़ीह दी थी.
खड़गे के हाथ से मुख्यमंत्री बनने का तीसरा मौक़ा 2013 में उस वक़्त निकल गया था, जब सिद्धारमैया ने विधायकों को अपने पक्ष में करते हुए उन्हें शिकस्त दे दी थी.

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एकजुट रखने की मशक़्क़त
कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के लिए ये मुक़ाबला पिछले कई वर्षों से चला आ रहा है. तब से ही सिद्धारमैया और शिवकुमार के समर्थक इस बात को लेकर एक दूसरे से भिड़ते रहे हैं.
इससे कांग्रेस को काफ़ी शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी है. एक विधायक ने तो सिद्धारमैया के चुनाव लड़ने के लिए बैंगलुरू शहर में अपनी सीट छोड़ने तक का प्रस्ताव दिया था.
कुछ पार्टी विधायकों को पार्टी नेतृत्व और आलाकमान के प्रतिनिधियों की तरफ़ से फटकार भी लगाई गई थी. और, उन्हें कहा गया था कि वो सार्वजनिक रूप से बयान देकर भारतीय जनता पार्टी को इसका फ़ायदा उठाने का मौक़ा न दें.
एक वक़्त ऐसा भी आया था जब मुख्यमंत्री पद के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम काफ़ी चर्चा में रहा था.
शिवकुमार और सिद्धारमैया के समर्थकों की इस बयानबाज़ी ने कुछ कार्यकर्ताओं को राहुल गांधी के उस बयान की याद दिला दी, जो उन्होंने 2012 में दावणगेरे में पार्टी के एक सम्मेलन में दिया था.
तब राहुल गांधी ने कहा था कि, 'मुझे पूरा यक़ीन है कि कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी को कोई नहीं हरा सकता है. सिर्फ़ कांग्रेस ही कांग्रेस पार्टी को सरकार बनाने से रोक सकती है.'
कोलार की जनसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि, 'मैं आप सबसे हाथ जोड़कर अपील करता हूं कि एकजुट रहें. सीटें जीतने का टारगेट हासिल करना कोई मुश्किल काम नहीं है. हम पहले भी 130 या उससे भी ज़्यादा सीटें जीत चुके हैं.'
कर्नाटक में कांग्रेस ने सबसे ज़्यादा 177 सीटें 1989 में जीती थीं.

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मुख्यमंत्री पद का मुद्दा
मौजूदा चुनाव में बीजेपी ने अपने मुख्यमंत्री पद के चेहरे का एलान नहीं किया है. हालांकि, मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने दावा किया है कि जब उनकी पार्टी फिर से सत्ता में आएगी तो वो ही मुख्यमंत्री बनेंगे. कांग्रेस ने भी अपना मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं किया.
सिद्धारमैया और शिवकुमार दोनों ही साथ मिलकर पूरे राज्य में प्रचार का एक दौर पूरा कर चुके हैं. और, जैसे जैसे पर्चा भरने का काम ज़ोर पकड़ रहा है, तो उनके फिर से एक साथ प्रचार करने की योजना है.
सिद्धारमैया, उत्तर मध्य और तटीय क्षेत्रों में प्रचार करने जाएंगे. वहीं, पार्टी अध्यक्ष शिवकुमार दक्षिणी ज़िलों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जहा वोक्कालिगा समुदाय का दबदबा है. शिवकुमार इसी समुदाय से आते हैं.
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने नाम न छापने की शर्त के साथ कहा कि, सिद्धारमैया और शिवकुमार पहले भी 224 सीटों पर प्रत्याशियों के चुनाव को लेकर आपस में टकरा चुके हैं.
लेकिन, केंद्रीय नेतृत्व ने सुनिश्चित किया कि ज़्यादातर सीटों के उम्मीदवारों को लेकर दोनों नेताओं के बीच सहमति बन जाए. कांग्रेस ने अभी भी 15 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम का एलान नहीं किया है.
इनमें से कई सीटें, तो कांग्रेस ने जान-बूझकर छोड़ी हुई हैं. क्योंकि, पार्टी को ये जानकारी मिली है कि बीजेपी से कई नेता कांग्रेस में आ सकते हैं. और, उस सूरत में इन सीटों पर उसे बीजेपी से टूटकर आने वाले नेताओं को टिकट देना पड़ सकता है.
कांग्रेस ने पार्टी महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला को कर्नाटक का प्रभारी बनाया है. वो बैंगलुरू में रहकर पार्टी के काम पर बारीक़ी से नज़र बनाए हुए हैं.
सुरजेवाला ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि पार्टी के नेताओं में टकराव न हो और काम-काज ठीक से चलता रहे.

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क्या खड़गे भी हैं मुख्यमंत्री की दौड़ में?
राजनीतिक विश्लेषक और सियासी जानकार खड़गे की भविष्य की योजनाओं को लेकर अलग अलग कारण बताते हैं.
सियासी जानकार डी. उमापति ने बीबीसी हिंदी को बताया, "इसमें कोई शक नहीं कि वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं. लेकिन अब कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर वो मुख्यमंत्री पद से ऊपर उठ चुके हैं."
"वो उससे नीचे नहीं उतरना चाहेंगे. उनका आत्मसम्मान इसकी इजाज़त नहीं देगा. एक वक़्त वो था जब खड़गे को ग़ुलाम नबी आज़ाद और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल से मिलने के लिए इंतज़ार करना पड़ता था. आज बहुत से नेता उनसे मिलने का इंतज़ार करते रहते हैं."
लेकिन, एक और कांग्रेस नेता, एक और पार्टी अध्यक्ष के राज्य का मुख्यमंत्री बनने के उदारहण की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.
नीलम संजीव रेड्डी 1960 में पहली बार एकजुट आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. उसके बाद वो कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1962 तक इस पद पर रहे.
1962 में नीलम संजीव रेड्डी दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लौटे और 1964 तक इस पद पर रहे. इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ा और केंद्रीय मंत्री बन गए. इसके बाद वो लोकसभा के अध्यक्ष और फिर देश के राष्ट्रपति भी बने.
मैसूर यूनिवर्सिटी में कला विभाग के अध्यक्ष और राजनीति वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र असादी ने बीबीसी हिंदी से कहा कि, "आज के संदर्भ में देखें, तो अगर खड़गे दोबारा राज्य की राजनीति में लौटते हैं, तो इससे विपक्षी एकता को नुक़सान पहुंचेगा."
"वो अब राष्ट्रीय स्तर पर एक नेता और बीजेपी को जवाब दे सकने वाली आवाज़ के रूप में उभर रहे हैं. जैसे ही वो कर्नाटक की राजनीति में लौटने का फ़ैसला करते हैं, तो इससे एक ग़लत संदेश जाएगा."
"हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आज राष्ट्रीय राजनीति में खड़गे इकलौते कद्दावर दलित नेता हैं, जिनके करिश्मे का इस्तेमाल दलित वोट हासिल करने के लिए किया जा सकता है."
प्रोफ़ेसर असादी ने कहा कि एक और सवाल भी है: 'अगर खड़गे कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ते हैं, तो फिर उनकी जगह कौन लेगा?'
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