नरेंद्र मोदी के बार-बार कर्नाटक जाने के सियासी संकेत क्या हैं?

मोदी और येदियुरप्पा

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इमेज कैप्शन, मोदी ने मंच से येदियुरप्पा का आभार व्यक्त किया और उन्हें जन्मदिन की बधाई भी दी
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 48 दिनों के भीतर सोमवार को अपनी पांचवीं कर्नाटक यात्रा पर पहुंचे. वहां प्रधानमंत्री ने एयरपोर्ट से लेकर मल्टी लेवल कार पार्किंग जैसे कई प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया.

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव सिर्फ़ दो महीने दूर हैं और राज्य चुनावों की तैयारी कर रहा है.

सोमवार को कर्नाटक में बीजेपी के सबसे बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का 80वां जन्मदिन भी था. प्रधानमंत्री की कर्नाटक यात्रा येदियुरप्पा को ख़ुश करने के लिए भी थी.

प्रधानमंत्री मोदी ने 12 जनवरी को हुबली की यात्रा के साथ कर्नाटक के दौरे शुरू किए थे. मोदी युवा उत्सव का उद्घाटन करने पहुंचे थे. तब से वो यहां बंजारा समुदाय के लोगों को ज़मीनों के अधिकार पत्र बांट चुके हैं और पीने के पानी की योजना की शुरुआत कर चुके हैं.

प्रधानमंत्री ने इस दौरान केंपेगौड़ा की मूर्ति का अनावरण, बेंगलुरू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-2 का उद्घाटन, वंदे भारत एक्सप्रेस की शुरुआत, ऐरो इंडिया शो का उद्घाटन किया है. इसके अलावा उन्होंने तुमकुर में एचएएल की फ़ैक्ट्री का उद्घाटन किया है.

इस सबसे आगे बढ़कर सोमवार को उन्होंने शिवमोगा शहर में एयरपोर्ट का उद्घाटन किया. ये येदियुरप्पा का गृह ज़िला भी है. येदियुरप्पा ने ही साल 2008 में अपने दम पर बीजेपी को कर्नाटक में सत्ता तक पहुंचाया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ येदियुरप्पा

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आगामी चुनाव के लिए बीजेपी की तैयारी

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प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से पहले हर बार पार्टी के रणनीतिकार और केंद्रीय मंत्री अमित शाह कर्नाटक पहुंचे हैं. अपनी पिछली यात्रा के दौरान अमित शाह ने संदूर में रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि कर्नाटक में लोगों को बीजेपी को वोट देना चाहिए और मोदी और येदियुरप्पा राज्य में लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देंगे.

अगर कम शब्दों में कहा जाए तो पार्टी के जिस केंद्रीय नेतृत्व ने बहुत आसानी से जुलाई 2021 में येदियुरप्पा को सत्ता से हटा दिया था वो अब फिर से राज्य में पार्टी को सत्ता में वापस लाने के लिए उन्हीं की तरफ़ देख रहा है.

लेकिन पार्टी का नेतृत्व हमेशा डबल इंजन सरकार की बात करता रहा है, पर पिछले चार सालों में राज्य में पार्टी की सरकार के प्रदर्शन के बारे में कम ही बात की गई है.

जागरण लेकसाइड यूनिवर्सिटी भोपाल के वाइस चांसलर और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रोफ़ेसर संदीप शास्त्री कहते हैं, "ये चुनाव केंद्रीय नेतृत्व की परीक्षा होंगे. पूरा चुनाव अभियान इस बारे में होगा कि केंद्र सरकार ने क्या किया है, केंद्रीय नेतृत्व का करिश्मा कैसा रहा है और केंद्रीय नेतृत्व अगले पांच साल में क्या करना चाहता है. लेकिन 'हमने' राज्य में पिछले चार साल में क्या किया है, इस बारे में कोई बात नहीं होगी."

वहीं अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रोफ़ेसर ए नारायण कहते हैं, "अगर राज्य में सरकार के कामकाज के बारे में बात की जाए तो कोई एक कारण भी ऐसा नहीं है जो बीजेपी के पक्ष में जा रहा हो. वो अब मोदी के करिश्मे और हिंदुत्व के एजेंडे पर निर्भर होने के लिए मजबूर हो गए हैं.

वो हिंदुत्व के एजेंडे को बहुत अधिक बढ़ावा दिए जाने को लेकर भी कुछ चिंतित हैं. इन दोनों में से सुरक्षित ये है कि मोदी को एक ऐसे महान नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया जाए जो भारत और कर्नाटक की रक्षा कर रहे हैं."

नारायण का हिंदुत्व के एजेंडे को बहुत अधिक बढ़ावा ना दिया जाने का तर्क येदियुरप्पा के बयानों से भी मेल खाता है जो उन्होंने राज्य में पार्टी के प्रमुख नवीन कुमार कतील के बारे में दिए हैं.

कतील पिछले कुछ सप्ताह से सिर्फ़ एक एजेंडे को लेकर ही अभियान चला रहे हैं. कतील ये कह रहे हैं कि ये चुनाव इस बात से तय होगा कि आप टीपू सुल्तान का समर्थन करते हैं या वीर सावरकर का. उनका कहना है कि चुनाव विकास के मुद्दे से तय नहीं होगा.

येदियुरप्पा और मोदी

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लिंगायत वोट पर नज़र

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लेकिन येदियुरप्पा ने साफ़ कह दिया है कि वो कतील की राय से सहमत नहीं हैं. वास्तव में, वो पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद राज्य में लौटे और उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने उनसे ख़ास तौर पर ये कहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय का समर्थन जुटाया जाए.

नारायण कहते हैं, "ऐसा लगता है पार्टी नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष के रूप में प्रोजेक्ट करने और उसके साथ-साथ पार्टी के प्रसिद्ध सोशल इंजीनियरिंग फ़ॉर्मूले पर काम करने की रणनीति पर काम कर रही है. यही वजह है कि केंद्रीय नेतृत्व अब येदियुरप्पा के साथ चीज़ें ठीक कर रहा है. लिंगायत समुदाय को ये संदेश दिया जा रहा है कि हमने येदियुरप्पा को नाराज़ नहीं किया है."

येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से हैं और ये कर्नाटक का प्रभावशाली जाति समूह है. उत्तर और मध्य कर्नाटक की विधानसभा सीटों पर लिंगायत समुदाय का दबदबा है. अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान भी यहीं केंद्रित है. इस बार केंद्रीय नेतृत्व कर्नाटक के दक्षिणी ज़िलों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है ताकि कांग्रेस और जनता दल (सेक्यूलर) के इस मज़बूत गढ़ को तोड़ा जा सके.

येदियुरप्पा को किनारे करने के प्रयासों और उनके बेटे बीवाई विजेंद्रा को ख़ासतौर पर सरकार में महत्व न दिये जाने के बाद कांग्रेस ने भी लिंगायत समुदाय को अपनी तरफ़ आकर्षित करने के लिए अभियान शुरू किया है. कांग्रेस लिंगायत समुदाय में ये अभियान चला रही है कि उनके नेता को बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने नज़रअंदाज़ किया. राज्य में कई सीटों पर इस समुदाय का वोट अहम है. यही वजह है कि लिंगायत वोट बीजेपी की जीत के लिए भी महत्वपूर्ण है.

मोदी ने कर्नाटक में रैली भी की

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'प्रधानमंत्री मोदी ही हैं चेहरा'

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प्रोफ़ेसर शास्त्री कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही बीजेपी का चेहरा हैं और 2014 के बाद से हर चुनाव में उन्हें ही आज़माया गया है.

प्रोफ़ेसर शास्त्री कहते हैं, "2018 में कर्नाटक में जब दो चरणों में चुनाव था तब प्रधानमंत्री मोदी ने दूसरे चरण पर अधिक ध्यान दिया, दूसरे चरण पर ध्यान देकर उन्होंने यहां अधिक सीटें प्राप्त कीं. मोदी ने तो यहां तक कह दिया था कि पार्टी उन पर कुछ ज़्यादा ही निर्भर हो रही है."

लेकिन प्रोफ़ेसर शास्त्री एक सवाल भी उठाते हैं, "मतदाता मोदी के प्रशंसक हो सकते हैं, लेकिन क्या ये प्रसंशा चुनाव में वोट में तब्लीद होगी? 2018 में बीजेपी राज्य में सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनकर उभरी थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के लिए यहां बड़ा समर्थन था. पार्टी ने यहां 28 में से 26 सीटें जीती थीं.

इसी तरह 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया और सरकार बनाई. लेकिन अगले ही साल 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बहुमत हासिल हुआ."

प्रोफ़ेसर शास्त्री सीएसडीएस लोकनीति चुनावी सर्वे का हिस्सा भी हैं. वो ध्यान दिलाते हैं कि जब लोगों से सिद्धारमैया की सरकार के प्रदर्शन के बारे में पूछा गया तो 90 प्रतिशत लोगों का कहना था कि उनकी सरकार अच्छा काम कर रही थी.

वो कहते हैं, "कर्नाटक में राज्य के चुनाव में और संसदीय चुनाव में फ़र्क़ होता है. ये देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी की रणनीति कैसे काम करती है, वो भी तब जब राज्य की सरकार के प्रदर्शन के बारे में बहुत कुछ नहीं बोला जा रहा हो.

दूसरे राज्यों की तरह, यहां भी लोग यही राय रखते हैं कि मोदी एक अच्छे प्रधानमंत्री हैं. लेकिन विधानसभा चुनाव में कर्नाटक के लोग राज्य के लिए मुख्यमंत्री चुनने जा रहे हैं. ये चुनाव में अहम कारण साबित हो सकता है."

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई की सरकार पर भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठते रहे हैं

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'कर्नाटक का वोटर समझदार है'

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नारायण एक और वजह की ओर ध्यान दिलाते हैं जो इस चुनाव में अहम मुद्दा बन सकता है. विश्वेस्वरैया स्टील लिमिटेड के कर्मचारी इस फ़ैक्ट्री के बंद होने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या एक नया एयरपोर्ट अधिक महत्वपूर्ण है या एक स्टील फ़ैक्ट्री का बंद होना."

शास्त्री कहते हैं कि कर्नाटक में वोटर पिछले चुनावों में नए विकास कार्यों से बहुत प्रभावित नहीं होते रहे हैं.

वो कहते हैं, "वो इस बात पर पार्टी को परखेंगे कि पहले की सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा है. बीजेपी के सामने ये एक बड़ी चुनौती है."

वो 1989 के चुनाव की याद दिलाते हैं. उस चुनाव के बाद से कर्नाटक में मतदाताओं ने किसी पार्टी को वापस सत्ता नहीं सौंपी है.

वो कहते हैं, "अब ये देखना होगा कि मतदाता कर्नाटक में बीजेपी सरकार के काम को कैसे देखते हैं."

राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने धड़ाधड़ हो रहे उद्घाटनों की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए हैं.

पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका खड़गे ने बीबीसी से कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन योजनाओं और प्रोजेक्ट का उद्घाटन कर रहे हैं वो अभी चालू क्यों नहीं हैं? बेंगलुरू एयरपोर्ट का टर्मिनल-2 अभी तक पूरा नहीं हुआ है. कैंपेगौड़ा की प्रतिमा पर अभी काम चल ही रहा है और अमित शाह कह रहे हैं कि उनकी पार्टी चुनावों के बाद भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देगी तो क्या इसका मतलब ये है कि मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई की कोई विश्ववस्नीयता नहीं है?"

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