कैंपेगौड़ा कौन थे जिनकी प्रतिमा का पीएम मोदी ने किया अनावरण

बेंगलुरू
इमेज कैप्शन, कैंपेगौड़ा की 108 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेंगलुरू के संस्थापक कैंपेगोड़ा की एक कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया.

108 फ़ीट ऊंची कैंपेगौड़ा की इस प्रतिमा का वजन 220 टन है. कैंपेगोड़ा की तलवार ही 4000 किलो की बनाई गई है. विजयनगर साम्राज्य से जुड़े 16वीं सदी के इस सामंत ने बेंगलुरू शहर को बसाया था.

ये मूर्ति मशहूर मूर्तिकार राम वी सुतार ने बनाई है, जिन्होंने गुजरात में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के रूप में सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनाई है.

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सरदार पटेल की मूर्ति के निर्माण के पीछे बीजेपी की सधी हुई रणनीति थी. अपने इस कदम से वो इस दिग्गज कांग्रेस नेता की विरासत को समाहित कर लेना चाहती थी.

खुद बीजेपी की अंदर भी कैंपेगौड़ा की इस मूर्ति के निर्माण को उनकी विरासत को अपनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

कहा जा रहा है कि उनकी इस विरासत का इस्तेमाल कर्नाटक के वोक्कालिगा बेल्ट में बीजेपी की किस्मत चमकाने के लिए किया जा रहा है. कर्नाटक में अगले छह महीनों में चुनाव होने हैं.

कैंपेगौड़ा

कैंपेगौड़ा और बीजेपी का रिश्ता

बीबीसी हिंदी

कैंपेगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय की अगड़ी जाति के सामंत थे. पुराने मैसूर या दक्षिणी कर्नाटक इलाके में इस समुदाय का वर्चस्व रहा है. दक्षिणी कर्नाटक में बेंगलुरू, मांड्या, मैसुरू, चामराजनगर, हासन, चिकमेंगलुरू, तुमकुरू और कोलार जिले आते हैं.

वोक्कालिगा लिंगायत समुदाय की दूसरी अगड़ी जातियों के उलट हैं. उत्तरी कर्नाटक में लिंगायतों का वर्चस्व है लेकिन ये पूरे राज्य में फैले हैं.

मैसुरू का पुराने इलाके में आमतौर पर कांग्रेस और जनता दल (सेक्यूलर) के ताकतवर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की बीच टकराव होता रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को भले ही यहां जीत मिली हो लेकिन विधानसभा चुनाव में वो अपने दो प्रतिद्वंद्वियों को काबू करने में नाकाम रही है.

2019 में बीएस येदियुरप्पा की सरकार बनने के पहले ही साल उन्होंने 23 एकड़ की थीम पार्क के साथ कैंपेगोड़ा की प्रतिमा बनाने के लिए 100 करोड़ रुपये जारी करने का ऐलान किया था.

जिस तरह से राम मंदिर के निर्माण के लिए देश के हर जिले से ईंटें लाई गईं थीं उसी तरह कैंपेगौड़ा की मूर्ति के लिए राज्य के 31 जिलों से मिट्टी लाई गई थी. 21 अक्टूबर से यहां मिट्टी जमा करने की शुरुआत हो गई थी.

आखिर कैंपेगौड़ा कौन हैं और उनकी विरासत बीजेपी के लिए इतनी अहम क्यों है कि खुद प्रधानमंत्री उनकी प्रतिमा का अनावरण करने आ रहे हैं. ये प्रतिमा कैंपेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल-2 से लगी है.

बेंगलुरू

इमेज स्रोत, @HD_KUMARASWAMY

इमेज कैप्शन, मैसूरू के पुराने इलाके में जद एस नेता देवगौड़ा ( बीच में ) का वर्चस्व

कौन थे कैंपेगौड़ा ?

बीबीसी हिंदी

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज स्टडीज (एनआईएएस) के प्रोफेसर नरेंद्र पाणि ने बीबीसी हिंदी को बताया, '' कैंपेगौड़ा का जन्म येलहांका में हुआ था और वे दूसरे सामंतों से काफी अलग थे. ''

वो बताते हैं, '' विजयनगर साम्राज्य पत्थर के किले नहीं बनवाना चाहता था. विजयनगर साम्राज्य का मानना था कि इन किलों में सेंध लगाई जा सकती है. कैंपेगौड़ा ने साम्राज्य की इस जरूरत को ध्यान में रखते हुए किलों को ऊंचाई पर बनवाना शुरू किया ताकि दुश्मनों पर दूर से नजर रखी जा सके. उन्होंने दुश्मनों की किसी भी पहलकदमी से चेतावनी देने का सिस्टम तैयार किया था.''

उन्होंने शहर में निगरानी के लिए कई बुर्ज बनवाए थे. इतिहासकारों का मानना है कि वे शहर के परिसीमन के प्रतीक थे. ये चार बुर्ज लालबाग, गवी गंगाधरेश्वर मंदिर, एमईजी सेंटर और येलहांका गेट पर हैं.

बेंगलोर यूनिवर्सिटी में इतिहास के पूर्व चेयर डॉ. एम जमुना के मुताबिक, '' उस वक्त यहां कई पेडेज बनाए गए थे. दरअसल ये मध्यकालीन समय के शहरी इलाके थे. ये पेडेज कारोबार के बाद तैयार किए गए थे. अक्कीपेडे वो जगह होती थी जहां चावल का कारोबार होता था. अरालेयपेडे में हथकरघे पर कपड़े बुने जाते थे. कुंबारपेड में मिट्टी के बरतन बनाने में दक्ष कुम्हार शिल्पी होते थे. ''

बेंगलुरू

कैंपेगौड़ा की विरासत

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इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च के डिप्टी डायरेक्टर एसे के आरुणि बीबीसी हिंदी से कहते हैं, '' मध्यकाल में अलग-अलग जगहों से विचार आते थे और उन्हें लागू किया जाता था. उदाहरण के लिए राजधानी का अधिकतर हिस्से में खेती नहीं होती थी. यहां कारोबार होता था और इसके लिए जगह साफ तौर पर निर्धारित थी. वहां अग्रहारम होते थे. अग्रहारम वह जगह होती थी, जहां ब्राह्मण रहते थे. ''

आरुणि के मुताबिक,'' उस समय मंदिरों के निर्माण को भी बढ़ावा दिया गया. शहरों के बीचोंबीच ये मंदिर थे और बड़े आकर्षक थे. इसे आज ओल्ड सिटी कहा जाता. ज्यादातर मंदिर द्रविड़ वास्तुकला पर बने थे. आप पाएंगे कि बाहर दीवारों पर धर्म ग्रंथों के उद्धरण लिखे होते थे. विजयनगर के मंदिरों में ऐसा देखने को मिलता है. देवनहल्ली ( इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नजदीक) मंदिर की ड्योढ़ी विजयनगर मंदिरों की ड्योढ़ी से अलग है. ''

प्रोफेसर पाणि कहते हैं, '' कैंपेगौड़ा काफी व्यावहारिक थे. उन्हें यह पता था कि क्या करने से क्या होगा. वो विजयनगर साम्राज्य के नियमों का पालन तो करते ही थे लेकिन उन्हें अपनी स्वायत्तता का भी ध्यान था और उन्होंने अपने नाम से सिक्के भी ढलवाए. कृष्णदेव राय ने उन्हें गिरफ्तार भी करवाया लेकिन उन्होंने रिहा होने का रास्ता ढूंढ़ निकाला'' .

कैंपेगौड़ा ने शहरी इलाकों से बाहर कई पेडेज बनवाए. उन्होंने सिंचाई के लिए कई तालाब खुदवाए. इतिहासकारों के पास उनके बनाए तालाबों का कोई आंकड़ा नहीं है. इतिहासकार इस बारे में भी कमत नहीं हैं कि बेंगलुरू में उनका शासन कब रहा था.

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इमेज कैप्शन, बेंगलोर यूनिवर्सिटी की एक पुस्तिका में कैंपेगौड़ा का तस्वीर

कैंपेगौड़ा का शासन काल क्या था?

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डॉ. सूर्यनाथ कामत की ओर से दिए गए उनके शासन के विवरण को काफी प्रमुखता दी जाती है. उनके मुताबिक कैंपेगौड़ा का शासन 1513 से 1569 के बीच रहा था. लेकिन ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं कि वह 1608 तक जीवित थे.

डॉ. जमुना के मुताबिक, '' पुरालेखों की तुलना कैंपेगौड़ा के बारे में ज्यादा जानकारी लोककथाओं में मिलती है. ''

डॉ. जमुना ने बताया, ''हाल के दिनों में कैंपेगौड़ा की छवि एक योद्धा शासक के तौर पर बनाई गई है. तिरुमला मंदिर में मिले कृष्णदेव राय और कैंपेगौड़ा की मूर्ति के उलट ये बिल्कुल विपरीत छवी है. हमने विभाग के वार्षिक कार्यक्रम में कैंपेगौड़ा की तस्वीर प्रकाशित की थी. वे ऐसे योद्धा नहीं थे, जिनकी बड़ी-बड़ी मूंछें थी और जो तलवार और ढाल लिए रहते थे, जैसा कि आजकल उनकी मूर्तियां दिखाई जाती हैं. ''

वो कहते हैं, '' उन्होंने युद्ध नहीं लड़े. वह राजनयिक के तौर पर जाने जाते थे जो सामंतों के बीच शांति और एकता कायम करने की कोशिश में लगे रहते थे. ''

एक दूसरे इतिहासकार न नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, '' कैंपेगौड़ा को योद्धा की पोशाक पहनाई गई है, बृहद बेंगलुरू महानगर पालिका के सामने लगी मूर्ति को चूड़ीदार पहनाया गया है. जबकि चूड़ीदार सिर्फ 300 साल पहले अस्तित्व में आया. मुगल शासन के अंतिम दिनों में. ''

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