बेंगलुरु: कॉन्वेंट स्कूल में छात्रों पर 'बाइबल पढ़ने का दबाव', जांच के आदेश

क्लेरेंस हाई स्कूल
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बेंगलुरु में ज़िला मजिस्ट्रेट को एक शिकायत की जांच करने के लिए एक निर्देश जारी किया है जिसमें कहा गया है कि एक ईसाई स्कूल अपने छात्रों को बाइबल पढ़ाने पर जोर दे रहा था.

ये शिकायत हिंदू जनजागृति समिति (एचजेएस) ने की है.

हिंदू जनजागृति समिति ने आरोप लगाया कि क्लैरेंस हाई स्कूल में प्रवेश लेने से पहले माता-पिता के लिए बाइबल की शिक्षा पर एक अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर करना, हिम्स (ईसाई धार्मिक गाना) गाना और स्क्रीप्चर (बाइबल का पाठ) की कक्षाओं में भाग लेना अनिवार्य कर दिया गया था.

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने जिलाधिकारी को जांच और रिपोर्ट सौंपने के लिए सात दिन का समय दिया है.

एनसीपीसीआर ने कहा है कि शिकायत के आधार पर यह पाया गया है कि ये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 (3) और किशोर न्याय अधिनियम 2015 के प्रावधानों का प्रथम दृष्टया उल्लंघन है.

बेंगलुरु के ज़िला मजिस्ट्रेट जे मंजूनाथ ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हम जांच करवाएंगे और रिपोर्ट भेजेंगे."

हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता मोहन गौड़ा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "इस स्कूल में बहुत सारे हिंदू और मुस्लिम छात्र पढ़ते हैं. वे दूसरे छात्रों पर अपना धर्म थोप रहे हैं, यह बच्चों का ब्रेनवॉश करने का एक प्रयास है और इससे उनके धर्म में परिवर्तन होना तय है."

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स्कूल में बाइबल बीते 100साल से पढ़ाई जा रही है

हालांकि स्कूल के प्रिंसिपल जॉर्ज मैथ्यू ने संवाददाताओं से कहा है कि स्कूल में 100 साल से बाइबल पढ़ाई जा रही है.

"हम जानते हैं कि कुछ लोग हमारे स्कूल की नीतियों में से एक नीति को लेकर परेशान हैं. हम एक शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाले स्कूल हैं. हमने इस मामले में अपने वकीलों से सलाह ली है और हम उनकी सलाह पर अमल करेंगे. हम देश का कानून नहीं तोड़ेंगे."

मैथ्यू ने बीबीसी हिंदी से कहा, "अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर करने के बाद भी आज तक किसी अभिभावक ने आपत्ति नहीं की. इन झूठे आरोपों से कैसे निपटा जाए, इस पर कानूनी राय ली जा रही है."

बेंगलुरु पूर्व के इस मशहूर स्कूल में लगभग 75 प्रतिशत छात्र ईसाई हैं.

हिंदू जनजागृति समिति ने स्कूल की नीतियों की एक प्रति जारी की जिसमें माता-पिता को अंडरटेकिंग देना होता है. स्कूल की नीतियों में लिखा गया है, "आप पुष्टि करते हैं कि आपका बच्चा अपने नैतिक और आध्यात्मिक कल्याण के लिए मॉर्निंग असेंबली, स्क्रिप्चर क्लास और क्लब सहित सभी कक्षाओं में भाग लेगा और क्लेरेंस हाई स्कूल में अपने प्रवास के दौरान बाइबल और हिम बुक ले जाने पर आपत्ति नहीं करेगा."

हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता मोहन गौड़ा कहते हैं, "वे ईसाई छात्रों को बाइबल शिक्षा दें. हमने शिक्षा विभाग से भी कार्रवाई शुरू करने का अनुरोध किया है. स्कूल ग़ैर-ईसाई छात्रों पर उनकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत बाइबल शिक्षा लागू कर रहा है. कई माता-पिता इससे नाराज़ हैं लेकिन वे अपने बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए आपत्ति नहीं कर सकते हैं."

क्लेरेंस हाई स्कूल

पुराने छात्रों ने कहा हम अभी भी हिंदू हैं

एक पूर्व छात्र केशव राजन्ना ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मैं स्कूल में एक बाइबल और एक हिम्स की किताब लेकर जाता था. मेरे बच्चे भी इसी स्कूल में पढ़ रहे हैं. मेरे भाई-बहन और उनके बच्चे भी वहां पढ़ रहे हैं. लेकिन, हम सब अभी भी हिंदू हैं. हमने तो धर्म नहीं बदला.''

एक अन्य पूर्व छात्र अर्चना प्रकाश ने कहा, "मैं क्लैरेंस में पढ़ने वाली अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हूं. मेरा बड़ा बेटा पास आउट हो गया है और मेरा दूसरा बेटा हाई स्कूल में है. हम हिंदू धर्म ही मानते हैं. मुझे स्कूल के दिनों के यादगार लम्हों को याद करते हुए कभी-कभी हिम्स गाना अच्छा लगता है. हम स्कूल के दिनों में अच्छा इंसान बनने के जोश के साथ ऐसा गाते थे."

राजन्ना और प्रकाश दोनों ने पुष्टि की कि उन्हें प्रवेश लेने के समय कहा गया था कि उन्हें बाइबल पढ़नी होगी और स्क्रिप्चर की कक्षा में भाग लेना होगा. प्रकाश ने कहा, "हमें इसके बारे में बताया गया और हमने स्कूल के नियमों का आनंद लिया."

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ईसाई संस्थानों पर हमला

बेंगलुरु के आर्कबिशप पीटर मचाडो ने एक बयान में कहा, ''ईसाई संस्थानों को फिर से 'धर्मांतरण के लिए' टारगेट किया जा रहा है. ये आरोप झूठे और भ्रामक हैं. स्कूल के इतिहास में ''कभी भी धर्मांतरण की कोई शिकायत नहीं मिली है''.

आर्कबिशप ने कहा, "पिछले कुछ दशकों में ईसाई प्रबंधन द्वारा चलाए जा रहे सैकड़ों स्कूलों में धर्मांतरण का एक भी उदाहरण सामने नहीं आया है''

उन्होंने यह भी कहा कि ये कहना गलत होगा कि सभी स्कूल धार्मिक पुस्तकों को लागू करने का पालन कर रहे हैं.

कर्नाटक के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री एमसी नागेश ने बीबीसी हिंदी को बताया मानदंड बहुत साफ थे, ''कोई भी स्कूलों में धार्मिक प्रथाओं और धार्मिक पुस्तकों को नहीं पढ़ा सकता है. जीसस क्राइस्ट, पैगंबर मोहम्मद या धर्म क्या सिखाते हैं उसके बारे में बात करने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन ये कहना है कि आप केवल ईसा मसीह का अनुसरण करने से ही जीवन में प्रगति करेंगे इसकी अनुमति नहीं है''

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कर्नाटक में जारी कैंपेन

पिछले कुछ महीने में हिंदू जनजागृति समिति और श्री राम सेना जैसे संगठनों ने मंदिर या हिंदू उत्सवों में मुस्लिम व्यापारियों पर प्रतिबंध लगाने, हिंदुओं को हलाल मांस नहीं खरीदने, मस्जिदों से लाउडस्पीकरों से अजान पर प्रतिबंध लगाने, आमों की खरीद मुस्लिम रेहड़ी वालों से नहीं करने, मुस्लिम ड्राइवरों वाली टैक्सियों में यात्रा नहीं करने जैसे कैंपेन चला रहे हैं.

यह अभियान तब शुरू हुआ जब कर्नाटक के अमीर-ए-शरीयत ने मुस्लिमों से हिजाब मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले पर अपनी दुकानें बंद करके 'विरोध और दुख व्यक्त' करने के लिए कहा था.

मामला तब शुरू हुआ जब उडुपी में महिलाओं के लिए एक गवर्नमेंट प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज की छह लड़कियों ने क्लास के अंदर हिजाब पहनने पर जोर दिया जिस पर प्रबंधन ने आपत्ति जताई थी.

इस विवाद के कारण कॉलेज के हिंदू लड़के-लड़कियां भगवा शॉल और पगड़ी पहन कर कॉलेज कैंपस आए.

मामला हाई कोर्ट में गया. कोर्ट ने सरकारी आदेश को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि सभी छात्र कॉलेज विकास समितियों द्वारा निर्धारित यूनिफॉर्म ही पहन कर शैक्षणिक संस्थाओं में आएंगे.

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इमेज स्रोत, UMESH MARPALLY

इसके बाद हलाल मांस को लेकर विवाद शुरू हुआ. हालांकि हलाल मांस के खिलाफ अभियान को कई हिंदुओं ने ख़ारिज भी किया. हिंदू हमेशा की तरह कन्नड़ नव वर्ष उगादी के एक दिन बाद हलाल मांस बेचने वाली मांस की दुकानों के सामने लाइन में लग गए. कर्नाटक में नए साल का पहला दिन मांस व्यंजन के उत्सव के रूप में मनाया जाता है.

लंबी कतारों में खड़े लोगों की सबसे आम वजह यह थी कि उन्हें इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं थी कि यह हलाल मांस है या झटका. उन्होंने कहा था कि "हमें ताजा मांस चाहिए और हम इसे दुकान से खरीद रहे हैं."

इसके अलावा आम उत्पादक संघ ने मुस्लिम व्यापारियों के साथ व्यापार न करने के अभियान को खारिज कर दिया. एसोसिएशन के नेता ने बीबीसी हिंदी को बताया था कि किसी भी हिंदू युवक को आम खरीदने से किसी ने नहीं रोका है. बात बस इतनी सी थी कि उगाने वाले और व्यापारी के बीच का रिश्ता सदियों से चल रहा है."

इसके अलावा टूरिस्ट टैक्सी ड्राइवर एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने कहा कि था कि वे 'कुशल रोजगार' में शामिल हैं और उद्योग बिना किसी धार्मिक भेदभाव के काम करता है.

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