कर्नाटक में चर्च-मिशनरियों का होगा सर्वे, ईसाइयों में नाराज़गी

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरू से

कर्नाटक में एक विधायी समिति ने सरकार को चर्चों के कामकाज और मिशनरियों की गतिविधियों पर एक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है.

इससे वहां ईसाई समुदाय के बीच नाराज़गी है. एक धार्मिक गुरु का कहना है कि बीजेपी सरकार इस समुदाय को निशाना बना रही है.

पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण संबंधी विधायी समिति ने विभाग को ज़िलों में अचानक पनप आए अनधिकृत चर्चों के कामकाज पर अगले एक महीने में सर्वे करने का निर्देश दिया है. सर्वे के नतीजे राज्य के सदन के समक्ष रखे जाएंगे.

विधायी समिति की बैठक की अध्यक्षता करने वाले गूलिहत्ती शेखर ने बीबीसी को बताया, "अधिकारियों के मांगने पर भी चर्च प्रशासन की ओर से जानकारी नहीं दिए जाने के कुछ मामले सामने आए हैं. जो लोग स्वेच्छा से ईसाई धर्म अपना रहे हैं तो यह एक अलग मुद्दा है. लेकिन ये (नए चर्च) कई लाभ का वादा करके लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कर रहे हैं."

शेखर ने बताया कि अधिकारियों ने समिति को राज्य में 1,790 चर्चों की मौजूदगी की जानकारी दी है. लेकिन चित्रदुर्ग ज़िले के होसदुर्गा स्थित उनके तालुका के नौ में से तीन चर्चों ने अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के साथ ब्यौरा नहीं साझा किया है.

हालांकि, बेंगलुरु के आर्कबिशप रेव पीटर मचाडो ने राज्य में जबरन धर्म परिवर्तन के दावे को ख़ारिज करते हुए बीबीसी हिंदी को बताया, "ईसाई आसान लक्ष्य हैं. लोगों को ईसाइयों और दूसरे मज़हबों के बीच भेद नहीं करना चाहिए. आगे वो हमारे पास आएंगे और कहेंगे कि यहां अपना क्रॉस मत रखो."

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समिति के निर्णय पर उठे सवाल

विधायी समिति के फ़ैसले पर ग़ैर-बीजेपी सदस्यों, कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) के सदस्यों ने सवाल उठाए.

कांग्रेस एमएलसी पीआर रमेश ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमने फ़ैसले का पुरज़ोर विरोध किया. हमने कहा कि अगर इतना ही बड़ा मुद्दा है तो धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने के लिए संविधान संशोधन क्यों नहीं करते. धर्म परिवर्तन इसलिए होता है क्योंकि आप विभिन्न जातियों के साथ ठीक व्यवहार नहीं कर रहे हैं."

उन्होंने कहा, "चूंकि हम आठ सदस्यीय समिति में से केवल तीन या चार सदस्य थे तो उन्होंने अधिकारियों को सर्वे कराने के निर्देश जारी कर दिए. इन विभागों से विकास कार्यों की बजाय चर्चों की गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करने को कहा गया है."

हालांकि विधायी समिति के अध्यक्ष शेखर ने समिति के फ़ैसले का बचाव करते हुए कहा कि "अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के कामकाज की समीक्षा के दौरान यह फ़ैसला एक रुटीन मामले के रूप में लिया गया था, ठीक वैसे ही जैसा हम मुजराई और वक़्फ़ विभागों के साथ करते हैं."

शेखर ने कहा कि सर्वे का मुख्य कारण यह था कि चर्च बिना अनुमति रातों-रात खुल जाते हैं. हम उन चर्चों और संस्थाओं के बारे में जानते हैं जो दशकों से मौजूद हैं. हम उनकी साख पर सवाल नहीं उठाते हैं. और जब उनसे सूचना मांगी गई तो उन सभी ने उसका अनुपालन किया था. लेकिन सर्वे की ज़रूरत इसलिए भी पड़ी कि कुछ ने अधिकारियों को मांगी गई सूचना देने से इनकार कर दिया था.

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग विभिन्न चर्चों को फंड देता है.

शेखर बताते हैं, "जो चर्च 75 से 100 वर्षों से अस्तित्व में हैं, हम उन्हें एक बार 50 लाख रुपये का अनुदान देते हैं, वहीं जो 50-75 सालों से हैं उन्हें 40 लाख रुपये अनुदान दिया जाता है."

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विधानसभा के पिछले सत्र के दौरान शेखर ने यह आरोप लगाया था कि बड़ी संख्या में लोगों को जबरन ईसाई बनाया जा रहा है और सरकार को इसमें दख़ल देना चाहिए. उन्होंने विधानसभा को बताया था कि उनकी मां को भी ईसाई बना दिया गया था और वे होसदुर्गा के उनके घर पर पूजा करने की इजाज़त नहीं दे रही थीं.

हालांकि, बीते हफ़्ते उनकी मां और कई अन्य लोगों का हिंदू धर्म में वापस स्वागत किया गया.

शेखर को कर्नाटक विधानसभा में बतौर सदस्य 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के ख़िलाफ़ बग़ावत करने के बाद विधानसभा में हंगामें के बीच अपनी शर्ट फाड़ने के लिए याद किया जाता है. हालांकि, एक दशक के बाद, वे येदियुरप्पा की उपस्थिति में ही बीजेपी में शामिल हो गए थे.

2008 में जब दक्षिण भारत के किसी भी राज्य में पहली बार बीजेपी की सरकार कर्नाटक की सत्ता में आई और जब बजरंग दल के सदस्यों ने तटीय ज़िले मंगलुरू में चर्चों पर हमला किया तो येदियुरप्पा सरकार को आलोचना का समाना करना पड़ा था.

हमले से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश फैला था क्योंकि कैथोलिक चर्चों पर हमला किया गया था.

अजीब बात है कि जब एक निजी आवास पर प्रार्थना सभा पर हमला किया गया तब कोई शोर-शराबा या विरोध नहीं हुआ. प्रार्थना सभाओं का संचालन ईसाई धर्म प्रचारकों ने किया था.

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आर्कबिशप के सामने चुनौतियां

हालांकि, आर्कबिशप मचाडो ने इस पर आपत्ति जताते हुए अधिकारियों से सवाल पूछा कि, "वे समाज की सेवा करने वाले शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों की संख्या की गिनती क्यों नहीं करते. मैं ईसाई संस्थानों में मौजूद एक लाख छात्रों की लिस्ट दे सकता हूं और यह चुनौती देता हूं कि कोई भी ये साबित कर दे कि उनमें से किसी एक ने भी अपना धर्म बदला है तो मैं अपनी नाकामी स्वीकार कर लूंगा. अगर वो सभी धर्मांतरण से इतने ही डरे हुए हैं तो उन्हें हमारे संस्थानों से छात्रों को वापस निकालने दें."

उन्होंने कहा, "हमारे देश का संविधान स्पष्ट रूप एक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने, धर्म का प्रचार और यहां तक कि प्रसार करने की इजाज़त देता है."

आर्कबिशप इस बात से सहमति जताते हैं कि, "ऐसे फ्रिंज एलिमेंट हमेशा होते हैं जो धर्मांतरण को प्रोत्साहित करने की कोशिश करेंगे. लेकिन धर्मांतरण का आरोप निराधार था क्योंकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ईसाइयों की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक 2.1 फ़ीसद के आंकड़े को नहीं पार कर सकी है जबकि आज़ादी के समय यह 2.3 फ़ीसद थी."

वीडियो कैप्शन, कर्नाटक: जब गांव की गलियों में पहुंच गया मगरमच्छ

बेंगलुरू आर्चडायासिस के प्रवक्ता जेए कांताराज बीबीसी हिंदी से कहते हैं कि चर्चों के मरम्मत कार्य, उनकी चारदिवारी और क़ब्रिस्तान के लिए 200 करोड़ रुपये की घोषणा की गई थी, इनमें से अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने 2020-21 वित्त वर्ष में सिर्फ़ 56 करोड़ रुपये जारी किए.

उन्होंने कहा कि हासन ज़िले के शेट्टीहल्ली में हॉली रॉज़री चर्च उन चर्चों में से एक है जिसे फ़्रैंच मिशनरियों ने 1860 में स्थापित किया था, हर साल तीन महीनों के लिए यह हेमवती नदी के पानी में डूब जाता है, यह कई महीनों से जर्जर स्थिति में है लेकिन कोई आर्थिक सहायता जारी नहीं की गई है.

तो फिर ईसाई समुदाय पर फ़ोकस करने का क्या कारण हो सकता है?

कांग्रेस के नेता रमेश के मुताबिक, "यह पूरी तरह से राजनीतिक है. वे इसे चुनावी उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं (2023 के पहली छमाही के दौरान विधानसभा चुनाव होने हैं) क्योंकि बीजेपी ने राज्य में लोगों के लिए कोई अच्छा काम नहीं किया है."

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