कर्नाटक: दलित बच्चे के मंदिर जाने और पिता पर जुर्माना लगाने का क्या है पूरा मामला

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरु से

"एक दलित बच्चे के मंदिर जाने से मंदिर गंदा नहीं हो जाता है बल्कि गंदगी हमारे दिमाग में ही है."

कर्नाटक के कोप्पल ज़िले के डिप्टी कमिश्नर ने ये बात उन गांव वालों के लिए कही जिन्होंने मंदिर जाने वाले दो साल के दलित बच्चे के पिता पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया था.

उस पिता की 'ग़लती' यही थी कि जब वे अपने बेटे के जन्मदिन पर मंदिर के बाहर प्रार्थना कर रहे थे, उनका बेटा दौड़कर मंदिर के भीतर चला गया था. और उससे भी ज़्यादा बड़ी ग़लती उसका दलित होना था.

बच्चे के पिता चंद्रू ने पत्रकारों से कहा, "हम वहां प्रार्थना कर रहे थे, उस वक़्त हलकी बूंदा-बांदी हो रही थी. मैंने अपने बेटे को फौरन ही पकड़ लिया. लेकिन 11 सितंबर को एक सार्वजनिक बैठक में गांव के बड़े लोगों ने कहा कि मुझे मंदिर के अभिषेक और शुद्धिकरण के लिए पैसा देना चाहिए. मुझे अकेले में ले जाकर 25,000 से 30,000 रुपये देने के लिए कहा गया."

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चंद्रू को डर था...

चंद्रू इतनी बड़ी रक़म नहीं भर पाए. उन्होंने अपने समाज के लोगों से सलाह-मशविरा किया और कुश्तगी पुलिस स्टेशन से संपर्क किया.

हालांकि चंद्रू डरे हुए थे और इसी डर की वजह से उन्होंने औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज कराने से इनकार कर दिया.

चंद्रू को डर था कि ऐसी घटनाएं बाद में दोहराई जा सकती हैं.

कोप्पल के डिप्टी कमिश्नर विकास किशोर सुलरकर तक जब ये बात पहुंची तो उन्होंने कहा कि दलित बच्चे के मंदिर जाने से मंदिर गंदा नहीं हो जाता है बल्कि गंदगी हमारे दिमाग में ही है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "हां, मैंने गांववालों को लेकर ये बात कही थी. क्योंकि गांव जाने से पहले मैंने पढ़ा था कि चंद्रू पर मंदिर की साफ़-सफ़ाई के लिए जुर्माना लगाया गया है. यही कारण था कि मैंने उनसे कहा कि एक बच्चे के जाने से मंदिर गंदा नहीं होता है बल्कि हमारा दिमाग ही गंदा है."

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पांच लोगों की गिरफ़्तारी

डिप्टी कमिश्नर ने कहा, "पीड़ित परिवार ने शिकायत दर्ज कराने से इनकार कर दिया लेकिन इसके बावजूद तालुका के समाज कल्याण पदाधिकारी ने शिकायत दर्ज कराई. हमने पांच लोगों को इस मामले में गिरफ़्तार किया है. गिरफ़्तार किए गए लोग मंदिर समिति के सदस्य हैं."

कोप्पल के मियापुर गांव में 450 परिवार रहते हैं जिनमें 20 फ़ीसदी दलित परिवार हैं.

कोप्पल के पुलिस अधीक्षक टी श्रीधर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मियापुर के बाक़ी लोग अलग-अलग समुदायों से हैं. सभी खेतीबारी करते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी गांववालों की सोच ख़राब है. अगड़ी जाति के बहुत से लोगों ने दलितों के ख़िलाफ़ ऐसी कार्रवाई का विरोध किया है. लेकिन एक छोटा सा तबका है जिनकी सोच के साथ समस्या है."

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ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं?

कोप्पल ज़िले में चार महीने पहले ऐसी ही एक घटना में दलित नवयुवकों के साथ बदसलूकी की गई थी. ये युवक बाल कटाना चाहते थे और इस वजह से उन्हें गांव से बहिष्कृत कर दिया गया.

उन्हें कहा गया कि लिंगायत समुदाय के अगड़ी जाति के लोग ही केवल बाल कटा सकते हैं.

मियापुर में भी जिन लोगों ने चंद्रू पर जुर्माना लगाया है, वे लिंगायत ही हैं. लेकिन वे लिंगायतों के गनिगा शाखा से ताल्लुक रखते हैं. ये तरह की मंझोली जाति है.

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डिप्टी कमिश्नर विकास किशोर सुलरकर बताते हैं, "हमने जागरूकता अभियान चलाने के लिए कुछ गांवों को चुना है. हम इसे आईईसी कैम्पेन कहते हैं. ये सूचना, शिक्षा और संचार का कैम्पेन है. समाज के सभी वर्गों को उनके अधिकारों को लेकर जागरूक किया जाता है. उनसे कहा जाता है कि शिकायत दर्ज कराने से जल्द नतीजा आते हैं और अन्य लोगों से कहा जाता है कि जब हम 21वीं सदी में रह रहे हैं तो सोच में बदलाव लाना ज़रूरी है."

इस सिलसिले में ज़िला प्रशासन ने 38 गांवों की पहचान की लेकिन आईईसी कैम्पेन के लिए चुने गए गांवों में मियापुर शामिल नहीं है.

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