हेमलता लवनम: वो महिला जिन्होंने अपने गाँव के डकैतों को बदल डाला
आंध्र प्रदेश का स्टुअर्टपुरम गाँव एक समय में डकैतों या फिर बड़े अपराधियों के लिए कुख़्यात था. लेकिन अब यहाँ कोई डकैत नहीं है. यह गाँव एक मिसाल के तौर पर जाना जाता है.
आंध्र प्रदेश के बापटला में सब डिविज़ल पुलिस ऑफ़िसर ए. श्रीनिवाल राव ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "वर्तमान में गांव में कोई डकैत नहीं है. हालांकि कुछ छोटे-मोटे चोर हैं जो चोरी करके अपना घर चलाते हैं. अगर हम 80 के दशक से तुलना करें तो मैं हम कह सकते हैं कि इस गांव में कोई डकैत नहीं हैं.''
इस गांव को डकैत और डकैती से निजात दिलाने में हेमलता लवनम की अहम भूमिका रही है.
एक समाज सुधारक और लेखिका हेमलता ईसाई दलित परिवार से आती थीं. उन्होंने बचपन से सामाजिक भेदभाव को क़रीब से देखा था. हेमलता लवनम की एक समाज सुधारक के तौर पर सफ़र की शुरुआत शादी के बाद चंबल घाटी से हुई. उनके पति लवनम भी एक समाज सुधारक थे.
शादी के तुरंत बाद स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे ने दोनों को मध्यप्रदेश स्थित चंबल घाटी बुला लिया था. ये साल था 1960. इस साल यहां एक बड़ी घटना होने वाली थी और विनोबा भावे चाहते थे कि लवनम दंपति भी इस घटना के साक्षी बने.
ये बड़ी घटना थी चंबल के डकैतों का आत्मसमर्पण. विनोबा भावे चंबल घाटी में शांति अभियान चला रहे थे और इसी के तहत बड़ी संख्या में यहां डकैतों ने आत्मसमर्पण किया.

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हेमलता लवनम पर किताब लिखने वाले लेखक के. सुंदर ने बीबीसी को बताया कि साल 1960 में विनोबा भावे ने चंबल घाटी में एक मार्च का आयोजन किया था और वहां उन्होंने लवनम दंपति को बुलाया.
वे आगे बताते हैं, "हेमलता ने कहा था कि चंबल घाटी में उनका समाज सुधार हनीमून था. उन्होंने अपने पति के साथ चंबल घाटी के दो ज़िलों भिंड़ और मुरैना में दौरे किए. वहां हेमलता ने डाकू मान सिंह को राखी बांधी थी जिसके बाद हेमलता की डकैतों के प्रति छवि में भी बदलाव आया था. उन्हें लगा था कि डकैत भी आम मनुष्यों की तरह होते हैं और समाजिक परिस्थितियां उन्हें डकैत बनने पर मजबूर कर देती हैं. अपने जीवन की इसी घटना ने उन्हें आंध्रप्रदेश के स्टुअर्टपुरम में आपराधिक सुधार लाने के लिए प्रेरित किया."
चंबल घाटी में डकैतों के आत्मसमर्पण ने हेमलता लवनम के दिलोदिमाग पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि वे इसके बाद समाजिक सुधार के काम में जुट गईं. उन्होंने अपने पति के साथ वास्वया नाम से एक स्कूल खोला. उन्होंने इस स्कूल में ज़िंदगी जीने के तरीके और नास्तिक जीवन शैली अपनाने की सीख दी.

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हेमलता की साथ काम कर चुकी और उनकी ननद डॉ मारू ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "हेमलता ने अपनी ननद मैत्रयी के साथ मिलकर वास्वया स्कूल की शुरुआत की. इस स्कूल में किसी प्रकार की ढांचागत सुविधाएं नहीं थी जैसे न क्लास रूम थे न ही बच्चों के बैठने के लिए बेंच. इस स्कूल में बच्चे पेड़ के नीचे बोरे पर बैठकर पढ़ते थे. इस स्कूल में शिक्षक और छात्र यूनिफॉर्म पहनते थे. यहां के आत्म-अनुशासन से प्रेरित होकर कई लोगों ने अपने बच्चे प्राइवेट स्कूल से निकालकर इस स्कूल में डाल दिए.''
के. सुदंर बताते हैं कि स्कूल के अलावा हेमलता दंपति ने अपने समाज सुधार आंदोलन में दलितों और आदिवासियों को भी जोड़ा साथ ही साथ उन्होंने आपराधियों में सुधार लाने की दिशा में भी काम किया और इस काम की शुरुआत उन्होंने स्टुअर्ट पुरम से की. ये गांव बड़ी आपराधिक घटनाओं और अपराधियों के लिए कुख्यात था.
इस गांव के निवासी प्रभाकर ने बीबीसी को बताया, "मेरे पिता एक अपराधी थे और मैं भी अपराधी था. लेकिन मेरे बच्चे अपराध के रास्ते पर नहीं हैं. उन्होंने पढ़ाई की और अब वे नौकरी कर रहे हैं. अम्मागारू हमारे गांव आईं थीं. उन्होंने कहा तुम जवान आदमी हो. जो तुम कर रहे हो वो सही नहीं है. उन्होंने कहा कि वे हमें पूरा सहयोग करेंगी. उनसे मुलाकात के बाद हमें अपनी ग़लतियों का एहसास हुआ."
"हमने उन्हें कहा कि हम पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करेंगे. दो दिन बाद वे हमारे गांव से चली गईं. हमें ऐसा लगा जैसे वो हमारी मां हैं. उनके शब्दों ने मुझ पर बहुत असर किया. वो जेल में भी मुझ से मिलने आती थी. मैं जेल से 1985 में रिहा हुआ और इन कारणों से मुझ में बदलाव आए."

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वहीं समाज में पिछड़ी महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए भी हेमलता लवनम निरंतर काम करती रहीं. इस दिशा में उन्होंने महिलाओं को जोगिनी प्रथा से मुक्ति दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई. जोगिनी प्रथा में लड़कियों को भगवान की शरण में दे दिया जाता है.

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के. सुंदर उनके इस योगदान के बारे में बताते हुए कहते हैं, "भगवान से शादी के नाम पर ज़्यादातर दलित महिलाओं को मंदिर में बेच दिया जाता था. लवनम कहती थीं कि एक महिला को जोगिनी बनाकर उसके मानवीय अधिकार, आत्मसक्षम बनने के मौके, उसका अपने शरीर पर और मां बनने का अधिकार, सब उससे ले लिए जाते हैं."
हेमलता लवनम जो लोगों के बीच अम्मा के नाम से जानी जाती थीं उन्होंने लगभग 30 से ज़्यादा जोगिनियों की शादी करवाई और जीवन की नई राह दिखाई. उन्होंने अपराधियों को आत्मसमर्पण के लिए मनाया और मुख्यधारा से जोड़ा. भगवान में विश्वास न करने वाली हेमलता लवनम मानती थी कि अगर सुधार लाना है तो आपको एक परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ काम करना होगा और सरकार को इस दिशा में काम करना चाहिए.
रिपोर्ट- पद्मा मीनाक्षी, सिरीज़ प्रोड्यूसर- सुशीला सिंह
(बीबीसी लाई है हमारी पुरखिन की दूसरी सिरीज़ जिसमें हम आपको बता रहे हैं आठ ऐसी दमदार महिलाओं की कहानियाँ जिन्हें हाशिए पर रहना मंज़ूर नहीं था. हमारी पुरखिन-2 की छठी कड़ी में देखेगें मेघालय की खासी जाति से आने वाली महिला की कहानी जिन्होंने समाज को नई चेतना देने का काम किया.)
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