कर्नाटक में स्वास्थ्य मंत्री के महिलाओं पर विवादित बोल, अब दिया स्पष्टीकरण

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कर्नाटक के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री के सुधाकर ने महिलाओं पर दिए गए विवादास्पद बयान पर स्पष्टीकरण दिया है.
मंत्री के सुधाकर ने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एवं न्यूरोलॉजिकल साइंसेज (निमहन्स) में कहा था कि आधुनिक भारतीय महिलाएँ सिंगल रहना चाहती हैं, वे शादी के बाद बच्चे नहीं पैदा करना चाहतीं.
लेकिन जब इस मामले पर विवाद बढ़ा, तो अब उन्होंने बयान जारी करके कहा है कि उनके कहने का मतलब ये था कि आजकल जो मेन्टल हेल्थ की समस्याएँ झेल रहे हैं, उससे निकलने में भारतीय परिवार के मूल्य कैसे मदद कर सकते हैं.
उन्होंने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनके भाषण के एक छोटे से हिस्से को लेकर विवाद किया जा रहा है, जबकि पूरा भाषण साढ़े 19 मिनट का था.
उनका कहना था, "मैं एक बेटी का पिता हूँ और एक डॉक्टर भी हूँ इसलिए महिला मुद्दों की संवेदनशीलता और मेन्टल हेल्थ के मुद्दों को समझता हूँ."

मंत्री की तरफ़ से ज़ारी बयान में लिखा गया है, "जहाँ पश्चिमी समाज व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है वहीं भारतीय समाज सामूहिकता की बात करता है जिसमें एक दूसरे के साथ सहयोग शामिल है और परिवार, समाजिक संरचना का मुख्य बिंदु होता है. इसलिए भारतीय और एशियाई परिवार पश्चिमी परिवारों की तुलना में अपने परिवार के सदस्यों का ज़्यादा ध्यान रखते हैं." साथ ही उनका कहना था कि उनके भाषण में 'युवाओं के शादी करने और बच्चे पैदा करने से बचने' की बात सर्वे पर आधारित थी. यूगोव-मिंट सीपीआर मिलेनियल सर्वे में ये बात निकलकर आई थी कि 30 साल से छोटे उम्र या मिलेनियल्स में 19 फ़ीसदी ऐसे हैं, जो शादी और बच्चे पैदा करने में रुचि नहीं रखते और आठ फ़ीसदी ऐसे हैं जो बच्चे तो चाहते हैं लेकिन शादी नहीं करना चाहते.
समारोह में क्या कहा था?
इससे पहले उन्होंने रविवार को कहा था कि आधुनिक भारतीय महिलाएँ सिंगल रहना चाहती हैं, वे शादी के बाद बच्चे नहीं पैदा करना चाहतीं और सरोगेसी (किराए की कोख) के ज़रिए बच्चे पैदा करना चाहती हैं.
उनके इस बयान पर अच्छी ख़ासी चर्चा हो रही थी. मंत्री के सुधाकर ने ये बयान निमहन्स में वर्ल्ड मेन्टल हेल्थ डे के मौक़े पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए दिया था.
लेडीज़ फिंगर्स वेबसाइट की संपादक रह चुकी निशा सुज़न महिला से जुड़े मुद्दों पर कॉलम लिखती हैं.
बेंगलुरु में रह रही निशा सुज़न कहती हैं कि आज छपे वहाँ के अख़बारों में स्वास्थ्य मंत्री डॉ के सुधाकर का बयान पहले पन्ने पर छाया हुआ है, जो एक तरह से 'शॉकिंग' लगता है.
उनके अनुसार मेन्टल हेल्थ डे के मौक़े पर उनका ये बयान दर्शाता है कि वो केवल पुरुषों के मेन्टल हेल्थ को देखते हुए उस समारोह को संबोधित कर रहे थे.

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महिलाओं का फ़ैसला लेना
वे फ़ोन पर हँसते हुए आगे कहती हैं कि स्वास्थ्य मंत्री का ये बयान कि आजकल मेन्टल हेल्थ की दिक्क़तें और स्ट्रेस ज़्यादा हो रहा हैं और पुरुषों को ये समस्याएँ ज़्यादा हो रही है, लेकिन ऐसी बातें इसलिए हो रही हैं क्योंकि लड़कियाँ खुद अपने फ़ैसले ले रही हैं. अगर एक महिला अपनी सुविधा के अनुसार कुछ फ़ैसला लेती है, तो वो समाज और पुरुषों को गँवारा नहीं होता.
वो एक उदाहरण देकर समझाती हैं, "एक रेस्तरां में मेरी बगल वाली मेज पर कुछ युवक बैठे थे. वो सी-सेक्शन डिलीवरी की बात कर रहे थे और उनका कहना था कि आजकल लड़कियाँ सी-सेक्शन से बच्चा इसलिए करवाती हैं क्योंकि वो उनके लिए आसान है."

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वे सवाल करके मुझसे पूछती हैं, "बताइए क्या सी-सेक्शन जिसमें आपके पेट को काटकर बच्चा निकाला जाता है, वो प्रक्रिया आसान है? क्या वो एक ऑपरेशन नहीं है जिससे महिला धीरे-धीरे उबरती है. ये कब से आसान हो गया. ऐसे में धारणा ऐसी बना दी गई है कि महिलाओं के लिए जो सुविधाजनक हो और आसान है वो सही नहीं है."
राज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री के सुधाकर का कहना था, "आज मुझे ये कहते हुए दुख होता है कि भारत में बहुत सी आधुनिक महिलाएँ सिंगल रहना चाहती हैं. अगर वो शादी भी कर लेती हैं , वो बच्चा पैदा नहीं करना चाहती. वो सरोगेसी से बच्चा चाहती हैं. तो ये हमारी सोच में बड़ा बदलाव है जो अच्छा नहीं है."
सोशल मीडिया पर चर्चा
सोशल मीडिया साइट ट्वविटर पर डॉ सुधाकर के नाम के उनके अकाउंट पर प्रत्याक्षा सिंह लिखती हैं, "सर आपका महिलाओं को लेकर दिया गया बयान सही नहीं है. कोई भी महिलाओं की पवित्रता को लेकर मानक परिभाषित नहीं कर सकता. अगर वो अकेली रहना चाहती हैं तो रह सकती है. आपकी जानकारी के लिए भारत पहले ही जनसंख्या की समस्या से जूझ रहा है. यहाँ सिंगल पुरुष सब बर्दाशत कर लेते हैं, लेकिन सिंगल महिला बर्दाश्त नहीं होती."
ट्वविटर पर निहारिका लिखती हैं, "आख़िरकार महिलाओं ने शादी और माँ के आगे भी सोचना शुरू कर दिया है."
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2011 की जनगणना के मुताबिक़, महिलाओं की कुल आबादी में पढ़ी-लिखी महिलाओं की तादाद, पिछली जनगणना के मुक़ाबले 11.79 प्रतिशत बढ़ कर 65.46 प्रतिशत तक पहुँच गई थी.
इनके बीच अकेली महिला यानी-तलाक़शुदा, पति से अलग रहने वाली या कभी शादी न करने वाली महिलाओं की संख्या 27 प्रतिशत बढ़ गई है. और ऐसी अकेली महिलाओं में 35 से 44 साल उम्र की महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ कर 68 प्रतिशत पहुँच गई है.

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बयान का विरोध
बिहार से आने वाली डॉ उषा किरण ख़ान का कहना है कि के सुधाकर एक ज़िम्मेदार नागरिक हैं और वो राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के इस बयान का प्रतिरोध करती हैं.
पद्मश्री से सम्मानित हिंदी और मैथिली साहित्य की सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ उषा किरण ख़ान बीबीसी से फ़ोन पर बातचीत में कहती हैं, "पता नहीं ये कौन सी आधुनिक महिलाओं के बारे में बात कर रहे हैं, जो माँ नहीं बनना चाहती हैं."
उनके अनुसार, "महिला चाहे गाँव या शहर में रहे, पढ़ी-लिखी या अनपढ़ हो, ग़रीब हो या अमीर हो प्राय: वे माँ बनना चाहती हैं. उन महिलाओं की भी संख्या है जो शादी नहीं करना चाहती लेकिन उनके अपने-अपने कारण हो सकते हैं. लेकिन अब तो कितनी सिंगल महिलाएँ भी माँ बन रही हैं. ऐसे में आप सभी औरतों को एक खाके में नहीं डाल सकते."
वो आगे बताती हैं, "आमतौर पर ये देखा गया कि अगर महिला शादी करती है तो उससे संतान की उम्मीद रहेगी और एक बच्चे को वो कब पैदा करना चाहती है यानी शादी के कितने साल बाद माँ बनना चाहती है, ये फ़ैसला लेने का अधिकार उसे होना चाहिए. ऐसे में अगर आप कहें कि भारतीय नारी को शादी करना ज़रूरी है तो ये बात ग़लत है. ऐसे में ये एक महिला का अपना अधिकार है और उनकी ख़्वाहिश है."

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सेंटर फ़ॉर सोशल रिसर्च की निदेशक और महिलावादी रंजना कुमारी मंत्री के बयान को सेक्सिट बताते हुए कहती हैं कि औरतों का शरीर उनका अपना है और वो तय करेंगी कि क्या करना है.
वे कहती हैं, ''मातृत्व को रोमांटिक ढंग से ग्लोरिफ़ाई किया जाता है, लेकिन वास्तव में वो बहुत मेहनत का काम होता है. साथ ही एक माँ पर सारी ज़िम्मेदारी डाल दी जाती है क्योंकि भारतीय समाज में ज्वाइट पैरेंटिंग या माता-पिता बच्चे को एक साथ पाले जैसी संकल्पना ही नहीं है."
वे कहती हैं कि आज मंत्री सरोगेसी की बात कर रहे हैं लेकिन ना जाने उनकी जैसी संस्थाओं ने कितनी ही बार सरोगेट माँ की मदद करने की अपील की है और ऐसी चीज़ों को कॉमर्शिअल ना होने देने की बातें कहीं हैं, लेकिन तब कोई मंत्री क्यों नहीं आकर बात करते थे.
पश्चिम की राह
मंत्री के सुधाकर ने भारतीय समाज पर पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव की बात करते हुए कहा था, "ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम पश्चिम की राह पर चल रहे हैं. हम नहीं चाहते कि हमारे अभिभावक हमारे साथ रहें."
निशा सुज़न कहती हैं कि एक परिवार में बहू से ही अपेक्षा की जाती है कि वो सास, ससुर या पति के परिवार का ख़्याल रखे, लेकिन उसे ये कभी नहीं कहा जाता कि तुम्हें अपने पैरेंट्स का ध्यान रखना चाहिए.
भारतीय समाज में जहाँ लड़की पैदा होते ही उसे पराए घर, संस्कार और ससुराल की देखरेख का पाठ पढ़ाया जाता है, वहाँ सदियों से चली आ रही परिवार की सरंचना से अलग कोई महिला अगर फ़ैसला लेती है, तो उस पर उंगलियाँ उठने लग जाती हैं.

ज़िम्मेदारी किसकी
पंजाब यूनिवर्सिटी में वीमेन स्टडीज़ विभाग की डॉ अमीर सुल्ताना कहती है कि औरतों के अधिकार की जब भी बात आती है, तो औरतों को ही ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है.
साथ ही वो सवाल उठाते हुए कहती हैं, ''हम क्यों ये सोचे कि हर औरत शादी करना चाहती है और माँ बनना चाहती है, ऐसे वक्तव्य कभी मर्दों के बारे में तो नहीं दिए जाते.''
वे कहती हैं, "ये महिला बनाम पुरुष की लड़ाई नहीं है लेकिन अगर कोई पुरुष सिंगल रहना चाहता है या शादी के बाद पिता नहीं बनना चाहता तो समाज को कोई दिक्क़त नहीं होती लेकिन अगर यही बात महिला कहे तो उंगलियां उठने लगती हैं ऐसा क्यों? और उसे पश्चिमीकरण का ज़ामा पहना दिया जाता है."
उनके अनुसार हमारा समाज इतना कमज़ोर नहीं है और मंत्री ने जो बयान दिया ऐसे बयानों से बचा जाना चाहिए.
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