माँ का नाम बच्चों को क्यों नहीं देते सरकारी दस्तावेज़?

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

माँ शब्द का ज़िक्र आते ही अक्सर चारदीवारी में रहने वाली वो महिला जो चूल्हा-चौका संभालती है, सबकी देखभाल करती है- जैसी बातें ज़हन में आती हैं. वो चाहे आर्थिक रूप से सक्षम भी हों, लेकिन उनकी भूमिका में यही ज़िम्मेदारियाँ कर्तव्य के नाम पर जोड़ दी जाती हैं.

लेकिन जब माँ से बच्चों की पहचान की बात आती है, तो वो दस्तावेज़ों से नदारद मिलती है.

मद्रास हाई कोर्ट में हाल ही में एक जनहित याचिका डाली गई. इस याचिका में कोर्ट को सरकारी फ़ॉर्म, दस्तावेज़, शपथ-पत्र, सर्टिफिकेट, लाइसेंस और अर्ज़ियों में माँ का नाम शामिल किए जाने का निर्देश देने की अपील की गई है.

याचिकाकर्ता का कहना है कि लोगों की पहचान केवल पिता के नाम से ही नहीं, बल्कि माँ के नाम से भी होनी चाहिए, क्योंकि एक बच्चे की ज़िंदगी में दोनों की बराबर ज़िम्मेदारी होती है.

इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने संबंधित मंत्रालय/प्राधिकरणों को नोटिस जारी किया है. इस मामले की सुनवाई इसी साल के नवंबर महीने में होगी.

हरीश अपनी मां के साथ

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हरीश वासुदेवन श्रीदेवी केरल हाई कोर्ट में वकील हैं. इनके नाम के अंत में श्रीदेवी इनकी माँ का नाम है, जो इन्होंने अपनी मर्ज़ी से जोड़ा है.

माँ की पिता से ज़्यादा भूमिका

पर्यावरण मुद्दों पर विशेषज्ञ के तौर पर पहचाने जाने वाले हरीश वी. श्रीदेवी फ़ोन पर बीबीसी से कहते हैं, "एक बच्चे को पैदा करने में माँ की भूमिका 99 फ़ीसदी होती है और उसकी तुलना में पिता की भूमिका देखेंगे तो वो काफ़ी सीमित है. लेकिन क्या बच्चे की पहचान कभी भी माँ से की जाती है. नहीं. बल्कि माँ को भी ऐसे ही ट्रेन कर दिया जाता है कि बच्चा पिता के नाम से ही जाना जाए और वो उसमें फ़ख़्र महसूस करे."

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वे आगे बताते हैं कि वे पासपोर्ट और बार काउंसिल एसोसिएशन में नाम नहीं बदलवा पाए, क्योंकि सर्टिफ़िकेट में उनका पुराना नाम लिखा हुआ है लेकिन वो अब हर जगह माँ से जुड़े हुए नाम का ही इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन जब माँ को इस बारे में बताया तो उनकी प्रतिक्रिया क्या थी?

इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, ''मैंने साल 2011 में माँ का नाम जोड़ा था. वो ये जानकर काफ़ी ख़ुश हुई थीं. उनका कहना था तुम्हारी पीढ़ी ही इन ज़ंजीरों को तोड़ने में सक्षम है. हमारे लिए ये मुद्दे गौण रहे और हम शायद कर भी नहीं पाते. मेरे पिता ने भी इसकी प्रशंसा की, हालाँकि इस पर बातचीत एक साल बाद ही हो पाई थी.''

माँ का नाम शामिल करने की लड़ाई

ये पहचान और बराबरी के लिए संघर्ष का हिस्सा है. बेटा और वंश ये शब्द अभी भी भारतीय समाज में रचे बसे हुए हैं. यह एक पितृसत्तात्मक सोच है, जो बरसों से चली आ रही है.

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हरीश कहते हैं कि बच्चे को पिता के नाम से जाना जाता है जैसे बच्चे से सवाल पूछा जाता है कि आप किसके बच्चे हैं या पिता का नाम क्या है? किसी भी फ़ॉर्म में सबसे पहले पिता का नाम और पेशा पूछा जाता है, फिर माँ की बारी आती है.

अगर माँ कोई काम नहीं कर रही होती है, तो लिख दिया जाता है हाउस वाइफ़. लेकिन, क्या उनकी घर से शादी हुई है, जो वो हाउस वाइफ़ कहलाई जाती है? हालाँकि घर में रहने वाली माँ को होममेकर कहने का चलन भी है, लेकिन उनकी पहचान अभी भी खोई हुई है.

बीबीसी से बातचीत में इसी बात को आगे बढ़ाते हुए समरिता शंकर कहती हैं कि जब उन्होंने कॉलेज सर्टिफ़िकेट में अपनी माँ का नाम जुड़वाने में कामयाबी हासिल की, तो उन्हें सोशल मीडिया पर काफ़ी ट्रोल किया गया.

वीडियो कैप्शन, ततहीर ऐसी पाकिस्तानी लड़की हैं जो पिता का नाम इस्तेमाल नहीं करना चाहतीं.

हालाँकि उन्हें इससे कोई मायूसी नहीं हुई, क्योंकि वो कहीं भी एक बच्चे के जीवन में पिता की छवि या उनकी अहमियत को कम नहीं बताना चाह रही थीं, बल्कि वो ये कोशिश कर रही थीं कि पिता की तरह माँ भी उतनी ही अहमयित रखती हैं और उन्हें ये हक़ मिलना चाहिए.

समरिता शंकर

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समरिता ने पिछले साल ही एक निजी कॉलेज से लॉ की पढ़ाई पूरी की है और फ़िलहाल वाइल्ड लाइफ़ कंज़र्वेशन सोसाइटी-इंडिया में बतौर लॉ ऑफ़िसर काम कर रही हैं.

वे बताती है कि जब उन्हें लॉ की डिग्री मिली, तो उन्होंने उसमें केवल पिता का नाम लिखा पाया, जबकि उनकी शिक्षा में माता-पिता दोनों का बराबर योगदान था.

वो कहती हैं, ''मैं चाहती थी कि मेरी माँ का नाम भी डिग्री में लिखा जाए. मैंने काफ़ी रिसर्च किया और पाया कि हर जगह पिता का नाम पहले पूछा जाता है. मैंने अपनी डिग्री में केवल पिता के नाम होने पर आवाज़ उठाई. पहले मुझे नाकामी हासिल हुई क्योंकि उनका कहना था कि पॉलिसी के अनुसार पिता का नाम ही डाला जा सकता है लेकिन फिर सर्टिफ़िकेट में माँ का नाम लिखवाने में कामयाब रही.''

हर क्षेत्र में महिलाएँ, तो नाम क्यों नहीं?

वे कहती हैं कि महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं और अब केवल पुरुष ही घर चलाने का काम नहीं कर रहे, ऐसे में उनके महत्व को क्यों नहीं समझा जाता.

भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी

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वर्ष 2016 में विशाखापत्तनम में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ पाँचवें और अंतिम वनडे के लिए जब भारतीय खिलाड़ी मैदान पर उतरे थे, तो उनकी नीली जर्सी के पीछे सरनेम की बजाय खिलाड़ी की माँ का नाम लिखा था.

जिसकी काफ़ी सराहना हुई थी. लेकिन ऐसी मुहिम अचानक दिखती है और फिर ग़ायब हो जाती है.

वे हर फ़ॉर्म में माँ का नाम शामिल किए जाने की वकालत करती हैं.

सुप्रीम कोर्ट में वकील प्रणय महेश्वरी कहते हैं किसी भी धर्म की बात कर लीजिए, वहाँ पिता के नाम को आगे बढ़ाने की बात होती है.

अपनी पहचान की चिंता

डेढ़ साल पहले उन्होंने अपने नाम में माँ का नाम जोड़ा था और ट्विटर पर वे प्रणय कोमल महेश्वरी नाम से जाने जाते हैं.

वे बताते हैं, ''मेरे पास लोगों के कई संदेश आते थे कि ये अच्छा नहीं लगेगा, क्या कर रहे हो? ये सोच बताती है कि जो भी चीज़ महिलाओं से संबंधित होगी, उस पर सवाल पूछो. जबकि कोई मर्द से सवाल नहीं पूछता.''

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सिंगल मदर

वे दिल्ली हाई कोर्ट में आए एक केस का हवाला देते हुए बताते हैं कि एक जोड़े का तलाक़ हो चुका था लेकिन पिता ने बच्ची के साथ अपना नाम जोड़ दिया. माँ ने इसे कोर्ट में चुनौती दी क्योंकि तलाक़ हो चुका था और वो नहीं चाहती थीं कि बच्ची के साथ पिता का नाम जोड़ा जाए. लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद अब वो बच्ची दोनों के उपनाम से जानी जाती है.

इस केस जैसे ही कितने मामले होंगे, जहाँ पिता अपनी पहचान को बच्चे के ज़रिए आगे बढ़ाना चाहते हैं. हालाँकि इसमें बदलाव भी आ रहे हैं.

सिंगल मदर्स को बच्चे के पिता का नाम देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. पासपोर्ट के बाद पैन कार्ड के नियमों में भी सिंगल मदर के लिए बदलाव किए गए हैं.

सिंगल मदर में वे महिलाएँ हैं, जो बिनब्याही माँ, सेक्स वर्कर, सरोगेट मदर्स, रेप सर्वाइवर, बच्चे जिन्हें पिता ने छोड़ दिया है और जिनके आइवीएफ़ तकनीक के ज़रिए पैदा हुए बच्चें हैं

आशिमा छिब्बर एक सिंगल मदर हैं. वे इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन यानी आईवीएफ़ तकनीक के ज़रिए माँ बनी हैं.

आशिमा छिब्बर

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वे पेशे से फ़िल्म निर्देशक हैं और उनका बच्चा किंडरगार्टन में पढ़ता है.

वे बताती हैं, ''जब मेरा बच्चा 40 दिन का था तो मैं बच्चे का पासपोर्ट बनवाने गई. फ़ॉर्म में पिता का नाम पूछा गया. मैंने कहा कि वो मेरा बच्चा है और पिता नहीं हैं. तो उनका कहना था कि आप एडोप्टेड (गोद लिया) बेबी लिख दो. मैंने कहा बच्चा मैंने ख़ुद पैदा किया है तो मैं इस एडोप्टेड बच्चा क्यों लिखूँ. वो बड़ा होगा तो उसे लगेगा कि मैंने उसे गोद लिया है. एक नया डब्बा बनाइए और लिखिए सिंगल मदर.''

लेकिन जब उन्होंने ये बात अधिकारी को बताई, तो अधिकारी ने उनका सपोर्ट करते हुए कहा कि आपको पिता का नाम बताते की ज़रूरत नहीं है.

उनके अनुसार हमारा समाज ऐसे ही चला आ रहा है. एक बच्चे का सारा काम माँ ही करती है. लेकिन पिता के नाम से सारी पहचान जोड़ी जाती रही हैं और कोई सिस्टम बदलना नहीं चाहता है.

हरीश कहते हैं कि जब उनसे लोग सवाल पूछते हैं कि आपने अपनी माँ का नाम क्यों जोड़ा, तो वे उनसे सवाल पूछते हैं कि आपने क्यों नहीं अपनी माँ का नाम जोड़ा है. उनके कई जवाब होते हैं जो उन्हें तर्कसंगत नहीं लगते.

मद्रास हाई कोर्ट में माँ के नाम को लेकर डाली गई याचिका के सवाल पर वे कहते हैं इसमें मूलभूत बदलावों की ज़रूरत है.

उनके अनुसार, ''कोई भी हमारे स्टेच्यूटेरी फॉर्म या क़ानूनी ढाँचों को असंवैधानिक होने की चुनौती नहीं देता, जो पितृसत्तात्मक सरकार ने ही बनाए हैं. ये पूछा जाता है कि आपके पिता या पति का नाम क्या है? क्यों कोई मां का नाम नहीं पूछता. ये सीधे तौर पर मूलभूत अधिकार का उल्लघंन है.

वे कहते हैं कि हर फ़ॉर्म में माँ और पिता का नाम और पति और पत्नी दोनों के नाम होने चाहिए.

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