कर्नाटक: अब मुसलमान फल कारोबारियों के ख़िलाफ़ अभियान, बहिष्कार की अपील

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
हिंदूवादी संगठन श्री राम सेना ने अब मुसलमान फल व्यापारियों के बहिष्कार का आह्वान किया है. इससे पहले कर्नाटक में मस्जिदों के लाउडस्पीकर से अज़ान और हलाल गोश्त को लेकर विवाद हो चुका है.
श्री राम सेना का आरोप है कि 'आमों के थोक बाज़ार पर मुसलमान कारोबारियों का वर्चस्व है जो हिंदू किसानों से फल ख़रीदने के लिए इंतज़ार कराते हैं और फिर सस्ती दर निर्धारित करके आधी रात में आम ख़रीदते हैं.'
श्री राम सेना के सिद्धालिंगास्वामी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "ये सिर्फ़ कोलार ज़िले में आम बाज़ार (जो राज्य का सबसे बड़ा आम बाज़ार भी है) तक सीमित नहीं है बल्कि प्रांत के सब्ज़ी बाज़ारों में भी ऐसा ही है. उदाहरण के तौर पर आलंद, बीदर ज़िलों में 50 प्रतिशत कारोबारी मुसलमान हैं और 50 प्रतिशत हिंदू हैं. मुसलमान कारोबारी ग़रीब हिंदू महिला सब्ज़ी विक्रेताओं को बाज़ार से बाहर धकेलने की धमकी देते हैं."
श्री राम सेना जनवरी 2009 में तब चर्चा में आई थी जब उसके कार्यकर्ताओं ने मैंगलुरू के एक पब में अपने परिवार के साथ आई महिलाओं पर हमला किया था. तब से ये संगठन कई मुद्दों पर प्रदर्शन करता रहा है. वेलेंटाइन डे के जश्न के ख़िलाफ़ भी श्री राम सेना प्रदर्शन करती रहती है.
हाल ही में श्री राम सेना ने मस्जिदों से अज़ान दिए जाने पर रोक लगाने की मांग की है. इसके अलावा ये संगठन फल और सब्ज़ी बाज़ारों में 'हिंदुओं को घुसाने' का अभियान भी चला रहा है. संगठन का कहना है कि इन बाज़ारों में मुसलमान कारोबारियों की संख्या अधिक है.
श्री राम सेना के नेता प्रमोद मुत्तालिक ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा कि हलाल मीट को लेकर अभियान इसलिए शुरू किया गया क्योंकि ये सब मुसलमानों ने हिजाब विवाद से शुरू किया है. उन्होंने कहा, "वो हिजाब विवाद को लेकर अदालत गए और जब फैसला आया तो वो संविधान के विरोध में ही क़दम उठाने लगे. उन्होंने हाई कोर्ट के फ़ैसले का विरोध किया. हम सिर्फ़ उनका विरोध कर रहे हैं."

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'क्यों हो रही है तकलीफ़?'
मस्जिद से लाउडस्पीकर से अज़ान दिए जाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि श्री राम सेना लंबे समय से इस विषय पर अभियान चला रही है. मुत्तालिक ने कहा, "हमने डिस्ट्रिक डिप्टी कमिश्नरों को कई शिकायतें दी हैं और मस्जिदों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की है और अज़ान पर रोक लगाने को कहा है."
वहीं सेना की इस मांग पर मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई ने कहा है कि डेसिबल स्तर को लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों को लागू किया जाना चाहिए. बोम्मई ने कहा कि अदालत ने अपने आदेश के पालन पर रिपोर्ट भी तलब की है.
लेकिन फल बाज़ार में मुसमलानों की मौजूदगी को लेकर चलाया गए इस ताज़ा अभियान को लेकर कोलार डिस्ट्रिक्ट मैंगो ग्रोअर एसोसिएशन असहज है. कोलार क्षेत्र में सभी तरह के आम उगाए जाते हैं. इनमें तोतापरी, मलिगा, नीलम, केसर, मालगोवा, रसपुरी, सिंदूरी, बदामी और अल्फोंसो आदि शामिल हैं. ये आम यहां से ट्रेन की विशेष बोगियों के ज़रिए दिल्ली और देश के बाक़ी हिस्सों में पहुंचते हैं.
एसोसिएशन के अध्यक्ष नीलातुर चिनप्पा रेड्डी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "अगर इस इलाक़े में मुसलमान कारोबारी अधिक हैं तो क्या हुआ? ये उनका धर्म है, ये उनका पारंपरिक कारोबार है, इसलिए ही वो यहां हैं. इससे किसी को कोई तकलीफ़ क्यों होनी चाहिए? तुम भी आओ और कारोबार करो, तुम्हें कौन रोक रहा है. क्या किसी मुसलमान ने तुम्हें रोका है. कोलार ज़िले में हम सब एक हैं. हिंदू और मुसलमान कारोबारी यहां भाई-भाई की तरह हैं. हम बिना किसी विवाद के साथ में रहते हैं और साथ में ही कारोबार करते हैं."

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'60 प्रतिशत कारोबारी हैं मुसलमान'
रेड्डी ने कहा, "हमारे किसानों के और भी बड़े मुद्दे हैं, क़र्ज़ एक बड़ा मुद्दा है. कारोबारी फ़ायदा कमाते हैं, ये सच है. इस बारे में कोई दूसरी राय नहीं है, और यहां ये कारोबारी मुसलमान हो सकते हैं, हिंदू और ईसाई भी हो सकते हैं. लेकिन हमारा कहना ये है कि हिंदू युवा आएँ और कारोबार करें. हमारे किसानों को अच्छे दाम दें और बाज़ार में प्रतिद्वंदिता पैदा करें. क्या उन्होंने कभी किसानों के फ़ायदे के लिए कोई अभियान चलाया है?"
रेड्डी कहते हैं, "मूल बात ये है कि किसी के ख़िलाफ़ भेदभाव करने की कोई आवश्यक्ता नहीं है. बाज़ार मुक्त है, बड़ा है और खुला है. यहां हर कोई कारोबार करने के लिए स्वतंत्र है. चाहें फिर वो कोई किसान हो, हिंदू नौजवान हो या फिर हमारे दूसरे मित्र हों."
कर्नाटक के कोलार ज़िले में हर साल आठ से 10 हजार टन आम पैदा होते हैं. आम कारोबारी मुस्तफ़ा शरीफ़ कहते हैं, "यहां क़रीब 60 प्रतिशत कारोबारी मुसलमान हैं और 40 प्रतिशत कारोबारी हिंदू हैं. हमारे बीच कभी कोई मतभेद नहीं रहा है. ज़ाहिर है दोनों ही समुदायों में ऐसे तत्व हमेशा रहेंगे जो हर चीज़ को सांप्रदायिक नज़रिए से देखेंगे. लेकिन आमतौर पर हम लोगों के बीच कभी मतभेद नहीं रहे हैं. ये ऐसे है जैसे भाइयों के दो घर. हम ऐसे ही पास-पास रहते आए हैं.
शरीफ़ के मुताबिक आम ख़रीदने वाले कारोबारी फल आने के समय बाग़ों में जाते हैं और उत्पाद का 50 से 100 प्रतिशत तक एडवांस दे देते हैं. एक बार फसल आ जाती है तो किसान पूरी फसल कारोबारी को सौंप देते हैं.
हलाल मीट के ख़िलाफ़ चले अभियान को भी झटका लगा है क्योंकि अधिकतर हिंदुओं ने इस आह्वान को नज़रअंदाज़ किया है. वो पहले की ही तरह हलाल गोश्त बेचने वाली दुकानों के बाहर खड़े नजर आए.
कर्नाटक में नव वर्ष उगाडी के पहले दिन लोग मांस खाकर जश्न मनाते हैं. प्रांत भर में लोग मांस की दुकानों के बाहर लाइनें लगाए खड़े थे जिनमें हलाल दुकानें भी शामिल थीं.

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अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए हलाल मीट की दुकान के बाहर खड़े एक व्यक्ति ने बीबीसी हिंदी को बताया था, "हम हमेशा से ही यहां से मीट ख़रीदते रहे हैं. ना ही हमने कभी उनका धर्म पूछा और ना ही ये कि मीट हलाल है या झटका. हमारे लिए ज़रूरी ये है कि मांस ताज़ा हो और हमें यहां हमेशा ताज़ा मांस मिलता है."
जब मुत्तालिक से कहा गया कि हलाल मांस के ख़िलाफ़ चलाया गया अभियान नाकाम हो गया है तो उन्होंने जवाब दिया, "कम से कम हम जागरुकता पैदा करने में कामयाब रहे हैं. हमसे सौ प्रतिशत कामयाब होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है. हम मांस खाने वालों में ये जागरुकता फैलाना चाहते हैं कि हलाल मांस में जानवर को अल्लाह के नाम पर काटा जाता है और इस तरह के मांस को हिंदुओं को नहीं खाना चाहिए."

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इस दौर में मस्जिद से अज़ान
आम लोगों के इन मुद्दों को पीछे धकेलने के बावजूद एक विषय है जिस पर राजनीतिक और मुस्लिम जगत में ख़ूब चर्चा हो रही है. ये है मस्जिद से अज़ान दिए जाने का मुद्दा जिसमें अदालत ने आदेश दिया है कि आवाज़ 60 डेसिबल से अधिक नहीं होनी चाहिए. यही नहीं रात के समय दस बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक अदालत ने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है.
अदालत के आदेश का पालन कराने के लिए बैंगलुरू पुलिस ने फ़रवरी में 310 संस्थानों को नोटिस दिया था. इनमें 125 मस्जिदें, 83 मंदिर, 22 चर्च और 59 पब और बार जैसे व्यावसायिक केंद्र शामिल थे. 12 उद्योगों को भी नोटिस दिया गया था.
राजनीतिक विश्लेषक और मैसूर यूनिवर्सिटी के डीन ऑफ़ आर्ट्स प्रोफ़ेसर मुसाफिर अस्सादी कहते हैं कि, "मुसलमानों को अलग-थलग करने को नाकाम करने के लिए ये जरूरी है कि हाई कोर्ट के आदेश का सख़्ती से पालन किया जाए."

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पढ़े-लिखे मुसलमान वर्ग में इसके एक दूसरे पहलू पर भी ख़ूब चर्चा हो रही है. अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए एक मुसलमान अधिकारी कहते हैं, "ये सवाल उठाया जा रहा है कि क्या मस्जिद में लाउडस्पीकर से अज़ान दिया जाना ज़रूरी है, वो भी तब जब हर किसी के पास मोबाइल फ़ोन है. अज़ान का मक़सद नमाज़ पढ़ने वाले लोगों को नमाज़ के वक़्त की याद दिलाना होता है."
एक रिटायर्ड मुसलमान शिक्षक कहते हैं, "मस्जिद में लाउडस्पीकर से अज़ान दिए जाने का मतलब ये नहीं है कि हमारे पास दूसरों को परेशान करने का अधिकार है. हमारे लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए."
ये तर्क दिया जा रहा है कि मस्जिद से नमाज़ पढ़ने वाले सभी लोगों के मोबाइल पर नमाज़ के वक़्त का अलर्ट भेजा जा सकता है और अज़ान सिर्फ़ मस्जिद के प्रांगण में ही दी जा सकती है.
क्या हो सकते हैं प्रभाव?
हालांकि राजनीतिक पंडित इस समूचे विवाद को अलग ही नज़रिए से देखते हैं.
राजनीतिक विश्लेषक रविंद्र रेशमे कहते हैं, "ये साफ़ है कि यहां कट्टरवादी तत्व ही सरकार चला रहे हैं. वो हर दिन नया फ़तवा जारी कर रहे हैं. आपने ग़ौर किया होगा कि मुख्यमंत्री बोम्मई ने अपने बजट भाषण में सिल्क उद्योग से जुड़े लोगों को दस हज़ार रुपए सब्सिडी देने की घोषणा की थी. इस उद्योग से अधिकतर मुसलमान ही जुड़े हैं. लेकिन उन्होंने अपने बजट भाषण में मुसलमान शब्द का ज़िक्र नहीं किया, कोई भी और मुख्यमंत्री होता तो ऐसा करता, वो बहुत डरे हुए थे. "

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लेकिन प्रोफ़ेसर मुसाफिर असादी का मानना है कि हाल के अभियान कर्नाटक को एक हिंदूवादी राज्य में नहीं बदल पाएंगे. वो कहते हैं कि, "कर्नाटक अभी भी एक जाति आधारित प्रांत है और इसे एक हिंदूवादी प्रांत में बदलना आसान नहीं है क्योंकि यहां अलग-अलग जातियों के अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक जीवन हैं. 80 बनाम 20 का बाइनरी या विभाजन (जैसा की उत्तर प्रदेश में देखा गया) यहां पैदा करना आसान नहीं है."
इसके अतिरिक्त वो कहते हैं, "यहां ज़मीनी स्तर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फ़र्क पैदा करना बहुत आसान नहीं है क्योंकि यहां दोनों समुदायों के बीच मतभेद का इतिहास नहीं है. जैसे कि आम या फलों और सब्ज़ियों के कारोबार से मुसलमान कारोबारियों को हटाना या झटका मीट तुरंत उपलब्ध कराना भी आसान नहीं है."
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