हिजाब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, हाई कोर्ट ने कहा था-अनिवार्य नहीं है इस्लाम में हिजाब

हिजाब विवाद

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    • Author, इमरान कुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक हाइकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि क्लासरूम में हिजाब पहनने की अनुमति देने से "मुसलमान महिलाओं की मुक्ति में बाधा पैदा होगी" और ऐसा करना संविधान की 'सकारात्मक सेकुलरिज्म' की भावना के भी प्रतिकूल होगा.

अब कर्नाटक हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए, छात्राओं की ओर से एक स्पेशल लीव पेटिशन दायर की गई है.

इससे पहले कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा था कि हिजाब इस्लाम के अनुसार अनिवार्य नहीं है.

हाइकोर्ट की फुल बेंच ने अपने 129 पन्ने के फ़ैसले में कुरआन की आयतों और कई इस्लामी ग्रंथों का हवाला दिया है.

इन उद्धरणों के आधार पर अदालत ने कहा है कि हिजाब इस्लाम के लिए अनिवार्य नहीं है. अदालत ने 11 दिन की सुनवाई के बाद यह फ़ैसला दिया है.

अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा, "इस्लामी धर्म ग्रंथों के आधार पर कहा जा सकता है कि हिजाब पहनना अधिक से अधिक एक सुझाव हो सकता है. जो चीज़ धार्मिक आधार पर अनिवार्य नहीं है, उसे विरोध प्रदर्शनों या अदालत में भावनात्मक दलीलों से धर्म का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता."

चीफ़ जस्टिस रितुराज अवस्थी, जस्टिस कृष्णा दीक्षित और जस्टिस जेबुनिसां काज़ी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई तब शुरू की जब यह महसूस किया गया कि फुल बेंच का ही इस मामले में सुनवाई करना ठीक होगा. पहले इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीक्षित अकेले कर रहे थे.

अदालत के फ़ैसले की आलोचना भी हो रही है. मसलन, पूर्व एडवोकेट जनरल रवि वर्मा कुमार ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "ऐसा लगता है यह सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त केस है. मैं अदालत का फ़ैसला पढ़ने के बाद विस्तार से अपनी दलीलें सामने रखूँगा."

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अदालत ने क्या कहा?

कर्नाटक हाइकोर्ट ने धार्मिक ग्रंथों के अलावा दूसरी अदालतों में हुए फ़ैसलों की नज़ीर भी दी है, इनमें फ़ातिमा हुसैन के मामले में मुंबई हाइकोर्ट का फ़ैसला भी शामिल है.

मुंबई हाइकोर्ट के डिविजन बेंच के फ़ैसले का हवाला देते हुए कर्नाटक हाइकोर्ट ने कहा है, "यह मानना ठीक नहीं होगा कि किसी को स्कूल में हिजाब पहनने से मना किया जाना इस्लाम की मान्यताओं में हस्तक्षेप करना है."

अदालत ने कहा, "इसके अलावा, यह दलील वाजिब नहीं है कि हिजाब पहनना एक पोशाक पहनने का मामला है. इसे इस्लामी मत के बुनियादी विश्वास में शामिल नहीं माना जा सकता. यह नहीं कहा जा सकता कि हिजाब पहनने के चलन को न मानने पर व्यक्ति पाप का भागी होगा. याचिका दायर करने वाले इस कानूनी ज़रूरत को पूरा करने में बुरी तरह नाकाम रहे कि हिजाब पहनना इस्लामी धर्म के लिहाज से अनिवार्य काम है."

एक याचिकाकर्ता की दलील थी कि केंद्रीय विद्यालय में हिजाब पहनने की अनुमति है तो फिर इस मामले में क्यों नहीं. इस पर अदालत ने कहा, "अगर इस दलील को मान लिया जाए तो स्कूली यूनिफ़ॉर्म, यूनिफॉर्म ही नहीं रह जाएगा. छात्राओं की दो श्रेणियाँ बन जाएँगी, एक वह श्रेणी जिसकी लड़कियाँ हिजाब के साथ यूनिफॉर्म पहनेंगी, और दूसरी वो जो बिना हिजाब के. इससे सामाजिक अलगाव का माहौल तैयार होगा, जो हम नहीं चाहते हैं. इसके अलावा ऐसा करना यूनिफॉर्म की मूल भावना के खिलाफ़ होगा जिसका उद्देश्य एकरूपता स्थापित करना है, ऐसी एकरूपता छात्र के धर्म की कोई भूमिका न हो. "

अदालत ने कहा कि इस बात में कोई बुराई नहीं है कि चुने हुए प्रतिनिधि स्कूलों की कमेटियों का नेतृत्व करें. अदालत का कहना है कि स्कूली विकास समिति के ऐसे सुझाव (यूनिफॉर्म के बारे में) देने को लेकर कोई कानूनी रोक-टोक नहीं है. हालांकि ऐसा होने की आशंका हो सकती है कि कैम्पस में 'पार्टी-पॉलिटिक्स' को कहीं बढ़ावा न मिले,

इन सवालों के आधार पर किया गया फैसला

अदालत ने चार सवालों का जवाब देते हुए अपना निर्णय दिया है. पहला सवाल, हिजाब या सिर ढकना इस्लाम की दृष्टि से अनिवार्य है या नहीं, और इसे आर्टिकल 25 के तहत संविधान की सुरक्षा मिली हुई है या नहीं. अदालत ने माना है कि हिजाब इस्लाम के मुताबिक अनिवार्य नहीं है.

दूसरा सवाल, क्या यूनिफॉर्म का नियम याचिकाकर्ताओं के उस मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है जो उन्हें संविधान के आर्टिकल 19 और आर्टिकल 21 से मिलता है.

अदालत ने कहा कि स्कूल यूनिफॉर्म लोगों की स्वतंत्रता की वाजिब सीमा तय करता है जो संविधान के तहत मान्य है और छात्रों को इस पर एतराज़ नहीं करना चाहिए.

तीसरा सवाल था कि क्या राज्य सरकार का 5 फ़रवरी का फ़ैसला मनमाना था, क्या इस फ़ैसले से संविधान के आर्टिकल 14 और 15 का उल्लंघन हुआ है, बेंच ने माना कि सरकार का निर्णय उचित था.

चौथा सवाल था कि क्या उन टीचरों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने छात्राओं को कॉलेज में हिजाब पहनने से रोका था, अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने ऐसी कोई माँग नहीं की थी.

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फैसले पर किसने क्या कहा?

हाइकोर्ट के इस फ़ैसले का राज्य के मुख्यमंत्री वसवराज बोम्मई ने स्वागत किया है.

बेंगलुरू के जामा मस्जिद के मौलाना मक़सूद इमरान रशीदी ने मुसलमानों से हर हाल में शांति बनाए रखने की अपील की है. उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में उनके पक्ष में फ़ैसला देगा.

कई इस्लामिक विद्वानों ने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि मुसलमान छात्राओं का सिर पर दुपट्टा रखना इस्लाम की दृष्टि से काफ़ी होगा, ऐसा कहने वालों में मौलाना रशीदी भी शामिल हैं.

हिंदूवादी छात्रों ने भगवा गमछा पहनकर हिजाब का विरोध किया

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इमेज कैप्शन, हिंदूवादी छात्रों ने भगवा गमछा पहनकर हिजाब का विरोध किया

कैसे हुई थी विवाद की शुरुआत?

इस विवाद की शुरुआत उडुपि से हुई थी जहाँ एक कॉलेज में कुछ मुसलमान लड़कियों के हिजाब पहनने पर हंगामा हुआ था, और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए थे जिनमें केसरिया पटका पहनकर हिजाब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले लोगों को दिखाया गया था.

इसके बाद हिंदू और मुसलमान, दोनों तरफ़ से छात्रों के बीच सोशल मीडिया पर अपने धार्मिक चिन्हों को दिखाने की होड़ लग गई थी, इसकी वजह से तनाव पैदा हुआ और कुछ स्थानों पर हिंसा की घटनाएँ भी हुईं.

हिजाब पहनने से रोके जाने पर छात्राओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. उनका कहना है कि हिजाब पहनना उनका संवैधानिक अधिकार है. लिहाज़ा उन्हें इससे रोका नहीं जा सकता.

पहले इस मामले की हाईकोर्ट की सिंगल बेंच सुनवाई कर रही थी लेकिन फिर इसे तीन सदस्यीय बेंच के पास भेज दिया गया.

इस बीच हिजाब विवाद का मामला उडुपी से निकलकर दूसरे स्कूलों तक भी पहुंच गया. यहां भी छात्राएं हिजाब पहनकर कॉलेज आने लगीं.

देश में कई जगहों पर स्कूल-कॉलेज में हिजाब पहनने के समर्थन और विरोध में प्रदर्शन होने लगे. कर्नाटक में पथराव और तोड़फोड़ की घटनाएं भी हुईं.

विवाद बढ़ता देख सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई और स्कूल-कॉलेज बंद करने के आदेश दे दिए.

वहीं, सुनवाई के दौरान कर्नाटक हाई कोर्ट ने हिजाब पहनने वाली छात्राओं की याचिकाओं पर अंतिम फैसला ना होने तक स्कूल-कॉलेज में धार्मिक पोशाक पहनने पर रोक लगा दी थी.

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