‘भगवा शॉल विरोध नहीं, हिजाब का रिऐक्शन है’: उडुपि से ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, उडुपि से
मुँह पर काला मास्क, गले में भगवा शॉल और नारा, "जय श्री राम". आठ फरवरी को आकांक्षा एस हंचिनामठ उन सैकड़ों छात्र-छात्राओं में शामिल थीं जो हिजाब की मांग कर रहीं मुस्लिम छात्रों के सामने खड़े थे.
कर्नाटक के तटीय शहर उडुपि के महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) कॉलेज के कैम्पस में अगली क्लास के लिए घंटी बजी ही थी कि ये छात्र आमने-सामने हो गए.
उस दिन एमजीएम कॉलेज समेत कर्नाटक के कई कॉलेजों में भगवा शॉल और पगड़ी पहने छात्र-छात्राएँ हिजाब पहनने वालों का विरोध कर रहे थे.
आकांक्षा के घर में जब हमारी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने अपनी भगवा शॉल दिखाई और बताया कि वो उस दिन पूरी तैयारी के साथ कॉलेज गईं थीं.
वो बोलीं, "हम सबने साथ मिलकर ये तय किया था. मैंने बैग में अपना भगवा शॉल रख लिया था. हम ये दिखाना चाहते थे कि धर्म को बीच में लाने का नतीजा क्या होगा."
पिछले दिन कई हिंदू छात्रों ने प्रिंसिपल से कहा था कि अगर मुस्लिम लड़कियाँ हिजाब पहनती रहीं तो वो भी भगवा शॉल पहनेंगे. इसके बाद प्रिंसिपल ने मुस्लिम छात्राओं से मिलकर 'विनती की' कि वो अब से क्लासरूम में हिजाब न पहनें.
इससे एक दिन पहले तक एमजीएम कॉलेज के क्लासरूम में हिजाब पहनने की अनुमति थी.
कुछ मुस्लिम लड़कियों ने पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर हमसे प्रिंसिपल के साथ हुई इस बातचीत की पुष्टि की और कहा कि वो प्रिंसिपल की इस दरख्वास्त से "हैरान रह गईं".

एक मुस्लिम छात्रा ने कहा, "उन्होंने एडमिशन के टाइम बोला था कि हिजाब पहन सकते हैं. सिर्फ इसी वजह से मैंने दूसरे कॉलेज में दाखिला नहीं लिया. अब कोर्स के बीच में ये नए नियम बनाना गलत है. ये हमारी अस्मिता और संवैधानिक अधिकार की बात है. अल्लाह का फरमान है."
आकांक्षा की क्लास में भी तीन लड़कियां हिजाब पहनती रही हैं.
आकांक्षा के मुताबिक़ उन्हें उन लड़कियों के साथ कभी असहज महसूस नहीं हुआ, "मैंने अपने दोस्तों को कभी धर्म के आधार पर नहीं बांटा. पसंद के हिसाब से दोस्त बनाए. हिंदू-मुसलमान कोई मुद्दा नहीं था."
तो फिर अचानक ये मुद्दा कैसे बन गया?

विवाद की शुरुआत
उडुपि के कॉलेजों में हिजाब पहनने पर कोई एक नीति नहीं है.
एमजीएम कॉलेज की ही तरह कई निजी कॉलेज अपने नियमों में हिजाब की अनुमति या पाबंदी का साफ ज़िक्र करते हैं. वहीं सरकारी कॉलेजों में ये नियम हर साल तय होता है.
हिजाब की मांग दिसंबर में उडुपि के जिस कॉलेज से शुरू हुई वहाँ पिछले साल से हिजाब पर पाबंदी लगा दी गई थी.
कोविड लॉकडाउन के बाद जब सरकारी पीयू कॉलेज फॉर गर्ल्स खुला और ग्यारहवीं क्लास (या प्री-युनीवर्सिटी) में भर्ती हुई छात्राओं को पता चला कि उनकी सीनियर छात्राएँ हिजाब पहनती रही हैं तो उन्होंने भी इसकी अनुमति मांगी.
सभी सरकारी प्री-युनीवर्सिटी कॉलेजों में यूनिफ़ॉर्म पर फ़ैसला इलाक़े के विधायक की अध्यक्षता वाली कॉलेज डेवलपमेंट कमेटी लेती है.
उडुपि के बीजेपी विधायक रघुवीर भट्ट ने छात्राओं की बात नहीं मानी. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि ये "अनुशासन का मामला है और सबको एक ही यूनिफ़ॉर्म पहननी होगी."
उनका फ़ैसला उनकी पार्टी की विचारधारा से प्रभावित है, वे ऐसा नहीं मानते. भट्ट ने कहा, "राजनीति करने के लिए दूसरे मुद्दे हैं, ये तो शिक्षा का मामला है".
हालाँकि उन्होंने माना कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और हिंदू जागरण वेदिके जैसे हिंदूवादी संगठनों ने हिंदू छात्रों के धार्मिक चिन्हों के साथ प्रदर्शन करने का समर्थन किया था.
सोशल मीडिया पर पोस्ट हुए कई वीडियो में देखा जा सकता है कि भगवा पगड़ियों को नए पैकेट से निकालकर बाँटा जा रहा है.
भट्ट ने कहा, "मैडम, ऐक्शन का रिएक्शन तो रहता है. जब कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया जैसा साम्प्रदायिक संगठन माहौल खराब कर रहा है, लड़कियों से नियम तोड़ने को कह रहा है,तो हमारे संगठन, हमारी हिंदू लड़कियाँ क्या बैठकर देखेंगे?"
एक कॉलेज से शुरू हुए विवाद को पूरे प्रदेश में फ़ैलाने की ज़िम्मेदारी उन्होंने 'कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया' पर डाली.

ऐक्शन और रिएक्शन
ऐक्शन-रिऐक्शन - उडुपि में ये शब्द बार-बार सुनाई दिए.
मंदिरों के शहर के नाम से जाने जाने वाले उडुपि में दस फीसदी मुसलमान और छह फीसदी ईसाई रहते हैं.
मुसलमान और गैर-मुसलमान अलग-अलग इलाक़ों में नहीं रहते. सभी धर्म के लोग एक ही मुहल्ले में मिल जाते हैं. कई व्यवसायों में साथ काम भी करते हैं और सड़क पर बुर्का या हिजाब पहने महिला का दिखना आम है.
लेकिन मौजूदा तनावग्रस्त माहौल में एक साथ मुसलमान और हिंदू छात्रों से बात करने की हमारी सारी कोशिशें नाकाम रहीं.
एमजीएम कॉलेज की एक मुस्लिम छात्रा ने कहा कि आठ फरवरी की याद उसके मन में एकदम ताज़ा है.
उन्होंने कहा, "वो सब हमारे कॉलेज से थे. ज़्यादातर मेरी क्लास से थे. जिससे मेरा मन बहुत दुखी हुआ, क्योंकि मेरे साथ पढ़नेवाले मेरे ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे."

आठ फरवरी को एमजीएम समेत कई जगह छात्रों के भगवा पटका पहनने, नारेबाज़ी करने के बाद कर्नाटक सरकार ने सभी कॉलेज बंद कर दिए और उनके खुलने का ख्याल भी मन में शंकाएं भर रहा है.
छात्रा ने कहा, "ज़ाहिर है कि इससे नफ़रत फैलेगी. हम सोचेंगे कि वो हिंदू हैं इसलिए हमारे ख़िलाफ़ हैं और वो सोचेंगे कि ये मुस्लिम हैं इसलिए उनके ख़िलाफ़ हैं, ऐसे में नफ़रत का माहौल बन जाएगा."
'कर्नाटक कम्युनल हार्मनी फोरम' पिछले 30 सालों से कर्नाटक में बढ़ रही साम्प्रदायिकता के विरोध में काम कर रहा है.
उसके वरिष्ठ सदस्य प्रोफ़ेसर फणिराज के. बताते हैं कि कर्नाटक के कई इलाकों में धीरे-धीरे साम्प्रदायिक ताकतें मज़बूत हुई हैं और मौजूदा विवाद में ऐक्शन-रिएक्शन को ऐतिहासिक नज़र से देखना ज़रूरी है.

साम्प्रदायिकता का इतिहास-वर्तमान
फणिराज के संगठन ने साल 2010 से दक्षिण कर्नाटक और उडुपि ज़िले में साम्प्रदायिक घटनाओं की जानकारी इकट्ठा की है.
हर साल के डेटा में 'मोरल पुलिसिंग', 'हेट स्पीच', 'शारीरिक हमले', 'धार्मिक स्थलों को क्षति', 'कैटल विजिलांटिज़म' सहित करीब 100 मामलों की जानकारी है.
प्रोफ़ेसर फणिराज कहते हैं, "1990 के बाद, राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद आप यहां एबीवीपी का तेज़ी से उदय देखते हैं और पहले एसएफआई फिर एनएसयूआई का पतन. ज़ाहिर है कि छात्रों में हिंदुत्व की उग्र विचारधारा बस गई है."
उनके मुताबिक़ इसका एक और रिऐक्शन है सिर्फ मुस्लिम छात्रों के अधिकारों के लिए बन रहे संगठन - जैसे, कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया.
रैडिकल इस्लामी संगठन 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया' की छात्र इकाई माने जाने वाले सीएफआई पर राजनीतिक फायदे के लिए इस मुद्दे को हवा देने और अदालत गईं मुसलमान लड़कियों को "बीच का रास्ता" अपनाने से रोकने का आरोप है.

सीएफ़आई के राष्ट्रीय महासचिव, अशवान सादिक इससे इनकार करते हुए दावा करते हैं कि उनकी तरफ से इस मामले में कोई भड़काऊ बयानबाज़ी नहीं हुई है.
सादिक कहते हैं, "जब केसरी शॉल सामने आए, एबीवीपी ने दखलंदाज़ी की, बीजेपी एमपी और एमएलए ने राजनीतिक स्टेटमेंट देनी शुरू की, तब मामला फैलता चला गया."
अशवान माहौल बिगड़ने के लिए दो बयानों को वजह बताते हैं, पहला, मंत्री सुनील कुमार का बयान - "हम कर्नाटक को तालिबान नहीं बनने देंगे" - और दूसरा, बीजेपी नेता वासनगौड़ा पाटिल के बयान - "हिजाब चाहिए तो पाकिस्तान चले जाएँ".
कन्नड़ न्यूज़ चैनलों पर बहस गरम है और सोशल मीडिया पर मीम्स भी ऐसी भावनाएं और भड़का रहे हैं.
पहले भी उठे हैं हिजाब पर सवाल
उडुपि में जो हुआ वो पहला ऐसा मामला नहीं है. तटीय कर्नाटक में मुसलमान लड़कियों के कॉलेज में हिजाब पहनने पर सवाल साल 2005 से उठते चले आ रहे हैं.
अब तक ये मामले प्रिंसिपल, कॉलेज की कमेटी और छात्र नेताओं में बातचीत के ज़रिए ये सुलझा लिए गए. मीडिया ने भी उन मामलों को ज़्यादा तूल नहीं दिया.
इस बार मामला इतना उलझा कि अदालत तक पहुंच गया और धर्म की आज़ादी के संवैधानिक अधिकार का सवाल बन गया.
एक मूल सवाल ये भी है कि हिजाब और भगवा शॉल पहनने की ये 'पसंद' कितनी आज़ाद है, यानी ये फ़ैसले छात्राओं के कितने अपने हैं और कितने परंपराओं, समाज, परिवार और धार्मिक नेताओं के.
महिला मुन्नाडे नाम के महिला अधिकार संगठन की मालिगे श्रीमाने के मुताबिक धार्मिक चिन्हों का इस्तेमाल तब बढ़ता है जब समुदाय को लगता है कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.
मालिगे कहती हैं, "कर्नाटक में बुर्का की प्रथा नहीं थी, सिर्फ सर पर दुपट्टा लिया जाता था, लेकिन बाबरी मस्जिद के बाद ये बदल गया और वही युवा वर्ग सीख रहा है."
कर्नाटक में अंतरधार्मिक प्रेम, बीफ़ खाने, गाय ले जाने जैसे मुद्दों पर बार-बार हमलों की रिपोर्ट आती रही हैं.
मालिगे के मुताबिक, हिजाब और बुर्का, जैसी धार्मिक प्रैक्टिस पर सवाल उठाना ज़रूरी है लेकिन साथ ही ज़रूरी है इसे अल्पसंख्यक समुदाय पर लगातार हो रहे हमलों के चश्मे से देखना.
एमजीएम कॉलेज की आकांक्षा से जब हमने पूछा कि जब हिजाब ने उसे कभी परेशान नहीं किया तो भगवा शॉल पहनने की नौबत क्यों आ गई? तो वो बोलीं कि "शॉल विरोध नहीं, रिऐक्शन है".
वे जिस "रिएक्शन" की बात कर रही हैं, वह उन्हें और उन जैसी छात्राओं को देखकर समझ आया.
अब वो बराबरी चाहती हैं, जो उनकी नज़र में एक जैसी यूनिफ़ॉर्म से सुनिश्चित होगी.
मुस्लिम छात्राओं के लिए बराबरी दिखाती यूनिफॉर्म, धार्मिक भेदभाव का प्रतीक है. उन्होंने कहा, "हमें इंतज़ार है, कैम्पस में शांति लौटने का, सब कुछ पहले जैसा होने का".
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)



















