बेंगलुरु: क्या सांप्रदायिकता भारत की सिलिकॉन वैली को बांट रही है?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले हफ़्ते, भारत की सबसे अमीर महिलाओं में से एक किरण मजूमदार शॉ ने ट्विटर पर एक असामान्य सा आग्रह करते हुए ट्वीट किया.
बायो-टेक्नोलॉजी फर्म बायोकॉन की प्रमुख किरण मजूमदार शॉ ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह 6.4 करोड़ लोगों की आबादी वाले राज्य कर्नाटक में "बढ़ती धार्मिक ध्रुवीकरण की समस्या का हल निकाले."
किरण मजूमदार शॉ की कंपनी कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में स्थित है जिसे भारत के उभरते टेक्नोलॉजी हब के रूप में जाना जाता है.
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शॉ की ओर से ये बयान एक ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में कट्टरपंथी हिंदू संगठनों की ओर से मंदिर में लगने वाले मेलों में मुसलमान व्यापारियों को स्टॉल लगाने से रोकने की मांग की जा रही है.
ये संगठन हिंदू समाज के लोगों से मुस्लिम कसाइयों से मांस नहीं ख़रीदने की अपील कर रहे हैं क्योंकि मुसलमान कसाई अपनी धार्मिक मान्यताओं के तहत जानवरों को हलाल करते हैं.
इसके बाद अब संगठन मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाने पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं और आम बेचने वाले मुसलमानों का बहिष्कार करने की भी बात कर रहे हैं.
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लगातार होते तनाव और विवाद
मामला बस यहीं तक सीमित नहीं है. हाल ही में कर्नाटक सरकार द्वारा कॉलेजों में मुसलमान लड़कियों के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद तनाव देखा गया है. हाई कोर्ट ने सरकार के इस आदेश को जारी रखा है जिसके विरोध में कई छात्राएं परीक्षाओं और कक्षाओं में शामिल नहीं हुई है.
पिछले साल सरकार ने 13 फीसद मुसलमान आबादी वाले इस राज्य में गौ-हत्या और इससे जुड़े व्यापार को प्रतिबंधित किया है.
इसके साथ ही स्कूल पाठ्यक्रम में हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ भगवद् गीता को शामिल करने की योजनाएं हैं. और पाठ्यक्रम से 18वीं शताब्दी में मैसूर के शासक रहे टीपू सुल्तान से जुड़े एक अध्याय को भी हटाने का प्रस्ताव है क्योंकि वह उनका महिमामंडन करता है.
इन तमाम विवादों पर लोगों की राय बंटी हुई है. लेकिन आलोचकों की मानें तो ये कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रवादी सरकार द्वारा मुसलमानों को हाशिए पर धकेलने से जुड़ी कोशिशें हैं.
लेकिन कई लोग आशंका जता रहे हैं कि इससे नुकसान हो सकता है और भारत के अपेक्षाकृत रूप से समृद्ध प्रदेश की छवि को धक्का पहुंच सकता है.
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ध्रुवीकरण का इतिहास
किरण मजूमदार शॉ ने अपने ट्वीट में राज्य के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को टैग करते हुए कहा है कि "कर्नाटक ने हमेशा "समावेशी आर्थिक विकास को वरीयता दी है. अगर इन्फॉर्मेशन और बायोटेक्नोलॉजी का शहर 'सांप्रदायिक हो गया' तो इसका 'वैश्विक नेतृत्व ख़त्म' हो जाएगा."
शॉ की चिंताओं को समझा जा सकता है. कर्नाटक की आर्थिक सफ़लता की कुंजी बेंगलुरु है. राज्य के राजस्व का कुल 60 फीसद हिस्सा एक करोड़ लोगों की आबादी वाले बेंगलुरु शहर से निकलता है.
इस शहर में 13000 से ज़्यादा टेक्नोलॉजी स्टार्ट-अप कंपनियां हैं. यही नहीं, भारत की एक अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा वैल्युएशन वाली 100 में से चालीस फीसद कंपनियां यहां स्थित हैं जो कि लिस्टेड नहीं हैं. बेंगलुरु की वजह से ही कर्नाटक की भारत की इन्फो-टैक एक्सपोर्ट में से 41 फीसद हिस्सेदारी है.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नरेंद्र पाणि कहते हैं कि कर्नाटक और बेंगलुरु का इतिहास धार्मिक हिंसा और ध्रुवीकरण का साक्षी रहा है. ऐसे में इन्फो-टैक इंडस्ट्री ने बेंगलुरु के "आंतरिक संघर्षों" से बचते हुए शहर के बाहर अपना आधारभूत ढांचा खड़ा करके शहर की छवि को नियंत्रित किया.
इसके साथ ही कर्नाटक पीएम मोदी द्वारा दक्षिण भारत में बीजेपी की मौजूदगी बढ़ाने से जुड़ी कोशिशों के केंद्र में है.
दक्षिण भारत के पांच राज्यों में सिर्फ कर्नाटक एक ऐसा राज्य है जहां पर बीजेपी चुनाव जीतने में सफल हुई है.
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बीजेपी की नयी राजनीति
कर्नाटक एक ऐसा प्रदेश है जहां तमाम जातियां, भाषाई समूह और धार्मिक समुदाय हैं. और बीजेपी ने इस राज्य में चार आम चुनावों में लगातार ज़्यादातर संसदीय सीटों पर जीत हासिल की है.
बीजेपी ने कई सालों तक मुसलमानों की अच्छी-ख़ासी आबादी वाले कर्नाटक के तटवर्ती क्षेत्रों और गाँवों में हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति पर काम किया है. और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने यहां पर अपनी गहरी जड़ें जमा ली हैं.
इससे पहले हिंदू संगठन यहां बार और पब आदि में युवक-युवतियों पर हमला करके मॉरल पुलिसिंग करने की कोशिश कर चुके हैं. इसके साथ ही यहां 'लव जिहाद' नामक कैंपेन भी चलाया गया है. 'लव जिहाद' एक ऐसा टर्म है जिसके ज़रिए कट्टरपंथी हिंदू संगठन मुसलमान युवकों पर शादी के ज़रिए हिंदू महिलाओं को मुसलमान बनाने का आरोप लगाते हैं.
लेकिन कर्नाटक के चुनावी इतिहास की बात करें तो एक लंबे समय तक यहां की राजनीति जातिगत निष्ठाओं से तय होती रही है.
साल 2008 में बीजेपी को पहली बार राज्य की सत्ता में लाने वाले बीएस येदियुरप्पा ने लिंगायतों का एक सफल गठबंधन बनाया. लिंगायत कर्नाटक की मतदान करने वाली आबादी और अन्य वंचित समाज का छठवां हिस्सा है.
लिंगायत समाज का एक गुट चाहता है कि उसे हिंदू धर्म से अलग मान्यता दी जाए और वंचित जातियों में सकारात्मक कदम उठाने की मांग है.
पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवे गोड़ा की जीवनी लिखने वाले सुगात श्रीनिवासराजू कहते हैं, "बीजेपी दबाव की वजह से एक अलग तरह की राजनीति करने की कोशिश कर रही है. यह हिंदू राष्ट्रवाद और विकास के आधार पर एक नया मतदाता वर्ग तैयार करने की कोशिश कर रही है."
येदियुरप्पा से पिछले साल सत्ता की बागडोर लेने वाले बोम्मई 61 वर्षीय राजनेता हैं. आलोचकों का मानना है कि उनकी सरकार का प्रदर्शन बेहतर नहीं है. उनकी सरकार पर कोरोना महामारी के दौरान कुप्रबंधन के भी आरोप हैं.
एक प्रतिष्ठित स्थानीय न्यूज़ और इन्वेस्टिगेशन वेबसाइट द फाइल के मुताबिक़, एक आंतरिक समीक्षा में सामने आया है कि सरकार के आधे विभागों का प्रदर्शन ख़राब है.
इसके साथ ही भ्रष्टाचार भी विकास की राह में एक रोड़ा बना हुआ है. पिछले साल नवंबर में कर्नाटक के निजी कॉन्ट्रेक्टरों ने पीएम मोदी को एक पत्र लिखकर शिकायत की थी कि उन्हें परियोजना की कुल राशि का लगभग 40 फीसद पैसा रिश्वत के रूप में अधिकारियों और मंत्रियों को देना पड़ता है.
कुछ ख़बरों के मुताबिक़, विकास के लिए आवंटित किया गया धन ख़र्च नहीं किया गया है, परिवहन विभाग के कर्मचारियों की तनख़्वाह नहीं दी गयी है और वंचितों को वजीफे नहीं दिए गए हैं. और राज्य में अगले साल चुनाव होने हैं.

बीजेपी पर दबाव
बेंगलुरु स्थित इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज में समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष चंदन गौड़ा कहते हैं, "सरकार के पास अब विकल्प के रूप में हिंदू राष्ट्रवाद का मुद्दा ही बचा है. उनके पास बड़ी उपलब्धियों के रूप में दिखाने के लिए बहुत कम चीजें हैं."
किरण मजूमदार शॉ की टिप्पणी के एक दिन बाद मुख्यमंत्री बोम्मई ने लोगों से अपील की है कि "वे कानून व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें, कर्नाटक को शांति और प्रगति के लिए जाना जाता है और सभी लोगों को संयम से काम लेना चाहिए."
बोम्मई को अपनी पार्टी में ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है. कम से कम दो बीजेपी विधायकों ने बेबाकी से अपनी बात रखी है.
एएच विश्वनाथ ने बीबीसी हिंदी को बताया है कि "हिंदू मंदिर में होने वाले समारोहों से मुसलमान व्यापारियों को प्रतिबंधित करना कुछ और नहीं बल्कि छुआछूत है, ये अमानवीय काम है."
वहीं, अनिल बेनाके ने कहा है कि "हम मुसलमानों को मंदिर समारोह में व्यापार करने से नहीं रोकेंगे."
हिंदू समाज के कई लोग एकजुटता दिखाते हुए मुसलमानों कसाइयों की दुकान से मांस ख़रीदने के लिए लाइन में खड़े हुए हैं.
इससे उम्मीद की एक किरण जगती है लेकिन काफ़ी कुछ और किये जाने की ज़रूरत है.
श्रीनिवासराजु कहते हैं, "कर्नाटक की राजनीति में धार्मिकता घोलने के प्रयास बीस सालों से जारी हैं. सालों तक विपक्षी दलों और ज़्यादातर बुद्धिजीवी और व्यापारी चुप रहे या सोच-समझ कर प्रतिक्रिया दी. उन्हें अपनी राय को ग़लत तरीके से संतुलित करने की कोशिश किए बग़ैर खुलकर बोलने की ज़रूरत है."
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