मोहम्मद यूनुस: नोबेल जीतने वाले इस शख़्स से क्यों ख़फा हैं शेख़ हसीना

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- Author, अक़बर हुसैन और केली एनजी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, ढाका और सिंगापुर से
दुनिया के कई राजनेताओं और अलग-अलग क्षेत्रों की हस्तियों ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को पत्र लिखकर नोबेल विजेता अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस पर 'ज़ुल्म' बंद करने की अपील की है.
प्रोफे़सर यूनुस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'ग़रीबों के बैंकर' के तौर पर जाना जाता है.
उन पर कई क़ानूनी मामले हैं जिनमें से कई हाल के सप्ताहों में दर्ज किए गए हैं.
शेख़ हसीना को लिखी ख़ुली चिट्ठी में इस क़ानूनी कार्रवाई को लोकतंत्र पर प्रहार बताया गया है.
शेख़ हसीना ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए 83 वर्षीय मोहम्मद यूनुस पर अंतरराष्ट्रीय बयान जारी कराने के लिए 'भीख' मांगने का आरोप लगाया है.
हालांकि, बांग्लादेशी पीएम ने ये भी कहा कि वो प्रोफ़ेसर यूनुस के ख़िलाफ़ चल रही कानूनी कार्रवाई का अध्ययन करने के लिए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का देश में स्वागत करती हैं.
जहां, अधिकांश पश्चिमी देशों में प्रोफ़ेसर यूनुस को ग़रीबों के मसीहा के तौर पर सराहना मिलती है, वहीं पीएम शेख हसीना नोबेल विजेता को आम जनता के दुश्मन के तौर पर देखती हैं.

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वह कई बार प्रोफ़ेसर यूनुस को ग़रीबों का 'ख़ून चूसने वाला' शख़्स बता चुकी हैं.
पीएम मोहम्मद यूनुस की ओर से शुरू किए गए ग्रामीण बैंक पर अत्याधिक ब्याज़ दर वसूलने का भी आरोप लगाती हैं.
प्रोफ़ेसर यूनुस ने साल 1983 में जिस बैंक की स्थापना की थी वो गऱीबों को उनका अपना लघु उद्योग शुरू करने के लिए छोटे और लंबी समयावधि के लिए कर्ज़ देता था.
इसके बाद ये कॉन्सेप्ट दुनियाभर में फला-फूला. साल 2006 में प्रोफ़सर यूनुस और उनके बैंक को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया था.
चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वालों में अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, वर्जिन ग्रुप के फाउंडर रिचर्ड ब्रैंसन और U2 रॉक बैंड के मुख्य गायक बोनो शामिल हैं .
चिट्ठी में प्रोफ़ेसर यूनुस पर "लगातार हो रहे न्यायिक उत्पीड़न" को रोकने की मांग की गई है.
चिट्ठी में लिखा है, "हम ये चाहते हैं वह (प्रोफ़ेसर यूनुस) बिना किसी ज़ुल्म या उत्पीड़न के अपने इन्नोवेटिव काम जारी रख पाएं."
बहुत से लोगों का मानना है कि साल 2007 में सेना समर्थित केयरटेकर सरकार की मदद से प्रोफ़ेसर यूनुस की ओर से राजनीतिक पार्टी के गठन की कोशिश ने शेख हसीना को नाराज़ किया.
ख़ास तौर पर इसलिए क्योंकि उस समय वह जेल में थीं.
हालांकि, प्रोफ़ेसर यूनुस अपनी योजना पर आगे नहीं बढ़े और तब से ही वो ये कहते आए हैं कि "राजनीति उनके लिए नहीं है."
प्रोफ़ेसर यूनुस के ख़िलाफ़ कौन से मामले हैं?

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बीते सप्ताह प्रोफ़ेसर यूनुस की ओर से स्थापित कंपनी ग्रामीण टेलीकॉम के 18 पूर्व कर्मचारियों ने नोबेल विजेता के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराया था.
इन पूर्व कर्मियों ने प्रोफ़ेसर यूनुस पर नौकरी के लाभों से वंचित रखने का आरोप लगाया है.
इससे अलग 22 अगस्त को श्रम क़ानूनों का उल्लंघन करने के आरोप में प्रोफ़ेसर यूनुस के ख़िलाफ़ सुनवाई भी शुरू हो गई है.
ये मामले ऐसे समय में दर्ज किए जा रहे हैं जब चार महीनों के अंदर ही बांग्लादेश में आम चुनाव होने हैं और लगातार निष्पक्ष ढंग से चुनाव करवाने की मांग हो रही है.
प्रोफ़ेसर यूनुस पर पहले भी कई मामले दर्ज कराए जा चुके हैं.
साल 2011 में बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक ने प्रोफे़सर यूनुस को जबरन उनके ग्रामीण बैंक से ये कहते हुए निकाला था कि वो रिटायरमेंट के लिए तय 60 साल की उम्र के बाद भी वहां काम कर रहे हैं.
साल 2013 में प्रशासन ने प्रोफ़ेसर यूनुस पर विदेशों में हुई कमाई पर टैक्स चोरी करने का आरोप लगाया था.
इस कमाई में प्रोफे़सर यूनुस को नोबेल पुरस्कार के साथ मिली नक़द राशि और किताब से मिलने वाली रॉयल्टी भी शामिल थी.
प्रोफ़ेसर यूनुस के वकील अब्दुल्लाह अल-मामुन का कहना है कि ये मुक़दमे आधारहीन हैं और सरकार के दबाव में दर्ज किए गए हैं.
इलीनॉयस स्टेट यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंटिस्ट अली रियाज़ ने बीबीसी से कहा है कि दुनियाभर में प्रोफ़ेसर यूनुस की प्रतिष्ठा को लेकर शेख हसीना के मन में 'गहरी नाराज़गी' है, भले ही प्रोफ़ेसर यूनुस ने हाल के समय में कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा ज़ाहिर नहीं की हो.
कुछ लोगों का मानना है कि शेख़ हसीना को इस बात का भी डर है कि कहीं प्रोफ़ेसर यूनुस की प्रतिष्ठा उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीबुर्रहमान से भी ज़्यादा न बढ़ जाए. साल 1975 में उनकी हत्या कर दी गई थी.
प्रोफ़ेसर रियाज़ ये भी कहते हैं कि नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस पर लगातार हो रहे हमले से ये भी दिखता है कि बांग्लादेश में असहमति भरी आवाज़ के प्रति असहिष्णुता बढ़ रही है. ये उन लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए ख़तरा है जिनकी नींव पर बांग्लादेश बना था.
उन्होंने कहा, "मुक़दमे दर्ज करने में जल्दबाज़ी और तेज़ी से सुनवाई करना संकेत देता है कि निष्पक्षता और न्याय मक़सद नहीं है, बल्कि असली लक्ष्य इन सबके ज़रिए उदाहरण स्थापित करने का है. इस तरह का बर्ताव सरकार विरोधी एक्टिविस्ट और आलोचकों के साथ हर रोज़ देखने को मिल रहा है."
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